भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

अध्याय ३० ] भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन ९९ नववर्षाः विभज्य पुत्रेभ्यः पित्रा दत्ता वनं राजा अग्नीध्र जब (घर त्यागकर) वनमें जाने लगे प्रविशता। अग्नीध्रीयं हिमाह्वयम्। यस्याधिपतिर्नाभः तब उन्होंने जम्बूद्वीपको उसके नौ खण्ड करके अपने ऋषभः पुत्रो बभूव ॥ ६ ॥ पुत्रोंको बाँट दिया। हिमालय पर्वतसे मिला हुआ वर्ष अग्नीध्र (नाभि)-को मिला था। इसके अधिपति राजा नाभिसे 'ऋषभ' नामक पुत्र हुआ ॥ ६ ॥ ऋषभाद् भरतो भरतेन चिरकालं धर्मेण पालितत्वादिदं भारतं वर्षमभूत् । इलावृतस्य मध्ये ऋषभसे भरतका जन्म हुआ, जिनके द्वारा चिरकालतक मेरुः सुवर्णमयश्चतुरशीतिसहस्राणि योजनानि धर्मपूर्वक पालित होनेके कारण इस देशका नाम 'भारतवर्ष' तस्योच्छ्रायः। षोडशसहस्रमप्यधस्तादवगाढः। पड़ा। इलावृत वर्षके बीचमें मेरु नामक सुवर्णमय पर्वत तद्विगुणो मूर्ध्नि विस्तारः ॥ ७ ॥ तन्मध्ये ब्रह्मणः है। उसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। वह सोलह पुरी। ऐन्द्रयामिन्द्रस्य चामरावती। आग्नेय्या- हजार योजनतक नीचे जमीनमें गड़ा है और इससे दूनी मग्नेस्तेजोवती। याम्यां यमस्य संयमनी। नैर्ऋत्यां (बत्तीस हजार योजन) इसकी चोटीकी चौड़ाई है। निर्ऋतेर्भयंकरी। वारुण्यां वरुणस्य विश्वावती। इसीके मध्यभागमें ब्रह्माजीकी पुरी है, पूर्वभागमें इन्द्रकी वायव्यां वायborder... वायोगन्धवती। उदीच्यां सोमस्य 'अमरावती' है, अग्निकोणमें अग्निकी 'तेजोवती' पुरी है, विभावरीति। नववर्षान्वितं जम्बूद्वीपं पुण्यपर्वतैः दक्षिणमें यमराजकी 'संयमनी' है, नैर्ऋत्यकोणमें निर्ऋतिकी पुण्यनदीभिरन्वितम् ॥ ८ ॥ किम्पुरुषादीन्यष्टवर्षाणि 'भयंकारी' नामक पुरी है, पश्चिममें वरुणकी 'विश्वावती' पुण्यवतां भोगस्थानानि साक्षाद् भारतवर्षमेकं है, वायव्यकोणमें वायुकी 'गन्धवती' नगरी है और कर्मभूमिश्चातुर्वर्ण्ययुतम् ॥ ९ ॥ उत्तरमें चन्द्रमाकी 'विभावरी' पुरी है। नौ खण्डोंसे युक्त यह जम्बूद्वीप पुण्य पर्वतों तथा पुण्य नदियोंसे युक्त है। तत्रैव कर्मभिः स्वर्गं कृतैः प्राप्स्यन्ति मानवाः। किम्पुरुष आदि आठ वर्ष पुण्यवानोंके भोगस्थान हैं; मुक्तिश्चात्रैव निष्कामैः प्राप्यते ज्ञानकर्मभिः। केवल एक भारतवर्ष ही चारों वर्णोंसे युक्त कर्मक्षेत्र है। अधोगतिमितो विप्र यान्ति वै पापकारिणः ॥ १० ॥ भारतवर्षमें ही कर्म करनेसे मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करेंगे और वहाँ ही ज्ञान-साधकको निष्काम कर्मोंसे मुक्ति भी प्राप्त ये पापकारिणस्तान् विद्धि पातालतले नरके होती है। विप्रवर ! पाप करनेवाले पुरुष यहाँसे अधोगतिको कोटिसमन्वितान् ॥ ११ ॥ प्राप्त होते हैं। जो पापी हैं, उन करोड़ों मनुष्योंको पातालस्थ नरकमें पड़े हुए समझिये ॥ ७-११॥ अथ सप्त कुलपर्वताः कथ्यन्ते । महेन्द्रो मलयः अब सात कुलपर्वतोंका वर्णन किया जाता है— शुक्तिमान् ऋष्यमूकः सह्यपर्वतो विन्ध्यः पारियात्रः महेन्द्र, मलय, शुक्तिमान्, ऋष्यमूक, सह्य, विन्ध्य और इत्येते भारते कुलपर्वताः ॥ १२ ॥ नर्मदा सुरसा पारियात्र। ये ही भारतवर्षमें कुलपर्वत हैं। नर्मदा, सुरसा, ऋषिकुल्या भीमरथी कृष्णा वेणी चन्द्रभागा ऋषिकुल्या, भीमरथी, कृष्णावेणी, चन्द्रभागा तथा ताम्रपर्णी इत्येताः सप्त नद्यः । गङ्गा यमुना गोदावरी ताम्रपर्णी—ये सात नदियाँ हैं तथा गङ्गा, यमुना, गोदावरी, तुङ्गभद्रा कावेरी सरयूरित्येता महानद्यः तुङ्गभद्रा, कावेरी और सरयू—ये छः महानदियाँ सब पापघ्न्यः ॥ १३ ॥ पापोंको नष्ट करनेवाली हैं ॥ १२-१३ ॥ यह सुन्दर जम्बूद्वीप जम्बू (जामुन)-के नामसे जम्बुनाम्ना च विख्यातं जम्बूद्वीपमिदं शुभम्। विख्यात है। इसका विस्तार एक लाख योजन है। लक्षयोजनविस्तीर्णमिदं श्रेष्ठं तु भारतम् ॥ १४ ॥ इस द्वीपमें यह भारतवर्ष ही सबसे श्रेष्ठ स्थान है ॥ १४ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_5_2_Front