संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०५ कथमुत्तमतां प्राप्त उत्तमः सुरुचेः सुतः। हो ? सुरुचिका पुत्र उत्तम क्यों श्रेष्ठ है ? राजकुमार होनेमें कुमारत्वेऽपि सामान्ये कथं चाहमनुत्तमः ॥ २० तो हम दोनों एक समान हैं। फिर क्या कारण है कि कथं त्वं मन्दभाग्यासि सुकुक्षिः सुरुचिः कथम्। मैं उत्तम नहीं हूँ ? तुम क्यों मन्दभागिनी हो और सुरुचि कथं नृपासनं योग्यमुत्तमस्य कथं न मे ॥ २१ क्यों उत्तम कोखवाली है ? राजसिंहासन क्यों उत्तमके कथं मे सुकृतं तुच्छमुत्तमस्योत्तमं कथम्। ही योग्य है ? मेरे योग्य क्यों नहीं है ? मेरा पुण्य तुच्छ इति श्रुत्वा वचस्तस्य सुनीतिर्नीतिमच्छिशोः ॥ २२ और उत्तमका पुण्य उत्तम कैसे है ? ॥ १८-२११/२ ॥ किंचिदुच्छ्वस्य शनकैः शिशुशोकोपशान्तये। सुनीति अपने पुत्रके इस नीतियुक्त वचनको स्वभावमधुरां वाणीं वक्तुं समुपचक्रमे ॥ २३ सुनकर धीरेसे थोड़ी लम्बी साँस खींच बालकका दुःख शान्त करनेके लिये स्वभावतः मधुर वाणीमें बोलने सुनीतिरुवाच लगी ॥ २२-२३ ॥ अयि तात महाबुद्धे विशुद्धेनान्तरात्मना । सुनीति बोली-तात! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। निवेदयामि ते सर्वं मावमाने मतिं कृथाः ॥ २४ तुमने जो कुछ पूछा है, वह सब शुद्ध हृदयसे मैं निवेदन तया यदुक्तं तत्सर्वं तथ्यमेव न चान्यथा। करती हूँ; तुम अपमानकी बात मनमें न लाओ। सुरुचिने यदि सा महिषी राज्ञो राज्ञीनामतिवल्लभा ॥ २५ जो कुछ कहा है, वह सब ठीक ही है, अन्यथा नहीं महासुकृतसम्भारैरुत्तमश्चोत्तमोदरे । है। यदि वह पटरानी है तो सभी रानियोंसे बढ़कर उवास तस्याः पुण्याया नृपसिंहासनोचितः ॥ २६ राजाकी प्यारी है ही। राजकुमार उत्तमने बहुत बड़े आतपत्रं च चन्द्राभं शुभे चापि हि चामरे। पुण्योंका संग्रह करके उस पुण्यवती रानीके उत्तम गर्भमें भद्रासनं तथोच्चं च सिन्धुराश्च मदोत्कटाः ॥ २७ निवास किया था, अतः वही राजसिंहासनपर बैठनेके तुरंगमाश्च तुरगा अनाधिव्याधि जीवितम् । योग्य है। चन्द्रमाके समान निर्मल श्वेत छत्र, सुन्दर निःसपत्नं शुभं राज्यं प्राप्यं विष्णुप्रसादतः ॥ २८ युगल चँवर, उच्च सिंहासन, मदमत्त गजराज, शीघ्रगामी तुरग, आधि-व्याधियोंसे रहित जीवन, शत्रुरहित सुन्दर सूत उवाच राज्य-ये वस्तुएँ भगवान् विष्णुकी कृपासे प्राप्त होती इत्याकर्ण्य सुनीत्यास्तन्मातुर्वाक्यमनिन्दितम्। हैं ॥ २४-२८ ॥ सौनीतेयो ध्रुवो वाचमाददे वक्तुमुत्तरम् ॥ २९ सूतजी बोले-माता सुनीतिके इस उत्तम वचनको सुनकर सुनीतिकुमार ध्रुवने उन्हें उत्तर देनेके लिये ध्रुव उवाच बोलना आरम्भ किया ॥ २९ ॥ जनयित्रि सुनीते मे शृणु वाक्यमनाकुलम्। ध्रुव बोला-जन्मदायिनी माता सुनीते ! आज मेरे उत्तानचरणादन्यन्नास्तीति मे मतिः शुभे ॥ ३० शान्तिपूर्वक कहे हुए वचन सुनो। शुभे ! आजतक मैं यही सिद्धार्थोऽस्यम्ब यद्यस्ति कश्चिदाश्रितकामधुक्। समझता था कि पिता उत्तानपादसे बढ़कर और कुछ नहीं अद्यैव सकलाराध्यं तमाराध्य जगत्पतिम् ॥ ३१ है। परंतु अम्ब! यदि अपने आश्रितजनोंकी कामना पूर्ण तत्तदासादितं विद्धि पदमन्यैर्दुरासदम्। करनेवाला कोई और भी है तो यह जानकर आज मैं कृतार्थ एकमेव हि साहाय्यं मातर्मे कर्तुमर्हसि ॥ ३२ हो गया। माँ ! तुम ऐसा समझो कि उन सर्वाराध्य जगदीश्वरकी आराधना करके जो-जो स्थान दूसरोंके लिये दुर्लभ है, वह अनुज्ञां देहि मे विष्णुं यथा चाराधयाम्यहम्। सब मैंने आज ही प्राप्त कर लिया। माता ! तुम्हें मेरी एक ही सहायता करनी चाहिये। केवल आज्ञा दे दो, जिससे मैं भगवान् विष्णुकी आराधना करूँ ॥ ३०-३२१/२ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth