संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
१०४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ३१ ]
[संस्कृत श्लोक]
सुरुचिरुवाच दौर्भागेय किमारोढुमिच्छेरङ्के महीपतेः। बाल बालिशबुद्धित्वादभाग्याजाठरोद्भवः॥ ७ अस्मिन् सिंहासने स्थातुं सुकृतं किं त्वया कृतम्॥ ८ यदि स्यात् सुकृतं तत्किं दुर्भाग्योदरगोऽभवः। अनेनैवानुमानेन बुध्यस्व स्वल्पपुण्यताम्॥ ९ भूत्वा राजकुमारोऽपि नालंकुर्या ममोदरम्। सुकुक्षिजममूं पश्य त्वमुत्तममनुत्तमम्॥ १० अधिजानु धरापान्वोर्मानेन परिबृंहितम्।
सूत उवाच मध्येराजसभां बालस्तयेति परिभर्त्सितः॥ ११ निपतन्नेत्रबाष्पाम्बुधैर्यात् किंचिन्न चोक्तवान्। उचितं नोचितं किंचिन्नोचिवान् सोऽपि पार्थिवः॥ १२ नियन्त्रितो महिष्याश्च तस्याः सौभाग्यगौरवात्। विसर्जितसभालोकं शोकं संहृत्य चेष्टितैः॥ १३ शैशवैः स शिशुर्नत्वा नृपं स्वसदनं ययौ। सुनीतिर्नीतिनिलयमवलोक्याथ बालकम्॥ १४ मुखलक्ष्म्यैव चाज्ञासीद् ध्रुवं राज्ञापमानितम्। अथ दृष्ट्वा सुनीतिं तु रहोऽन्तःपुरवासिनीम्॥ १५ आलिङ्ग्य दीर्घं निःश्वस्य मुक्तकण्ठं रुरोद ह। सान्त्वयित्वा सुनीतिस्तं वदनं परिमार्ज्य च॥ १६ दुकूलाञ्चलसम्पर्कैर्वीज्य तं मृदुपाणिना। पप्रच्छ तनयं माता वद रोदनकारणम्॥ १७ विद्यमाने नरपतौ शिशो केनापमानितः।
ध्रुव उवाच सम्पृच्छे जननि त्वाहं सम्यक् शंस ममाग्रतः॥ १८ भार्यात्वेऽपि च सामान्ये कथं सा सुरुचिः प्रिया। कथं न भवती माततः प्रिया क्षितिपतेरसि॥ १९
[हिन्दी अनुवाद]
सुरुचि बोली— अभागिनीके बच्चे! क्या तू भी महाराजकी गोदमें चढ़ना चाहता है? बालक! मूर्खतावश ही ऐसी चेष्टा कर रहा है। तू इसके योग्य कदापि नहीं है; क्योंकि तू एक भाग्यहीना स्त्रीके गर्भसे पैदा हुआ है। बता तो सही, तूने इस सिंहासनपर बैठनेके लिये कौन-सा पुण्यकर्म किया है? यदि पुण्य ही किया होता तो क्या अभागिनीके गर्भसे जन्म लेता? राजकुमार होनेपर भी तू मेरे उदरकी शोभा नहीं बढ़ा सका है। इसी बातसे जान ले कि तेरा पुण्य बहुत कम है। उत्तम कोखसे पैदा हुआ है—कुमार 'उत्तम' जो सर्वश्रेष्ठ है; देखो, वह कितने सम्मानके साथ पृथ्वीनाथ महाराजके दोनों घुटनोंपर बैठा है॥ ७—१० १/२॥
सूतजी कहते हैं— राजसभाके बीच सुरुचिके द्वारा इस प्रकार झिड़के जानेपर बालक ध्रुवकी आँखोंसे अश्रुबिन्दु झरने लगे; किंतु वह धैर्यपूर्वक कुछ भी न बोला। इधर राजा भी रानीके सौभाग्य-गौरवसे आबद्ध हो, उसका कार्य उचित था या अनुचित, कुछ भी न कह सके। जब सभासद्गण बिदा हुए, तब अपनी शैशवोचित चेष्टाओंसे शोकको दबाकर वह बालक राजाको प्रणाम करके अपने घरको गया॥ ११—१३ १/२॥
सुनीतिने अपने नीतिके खजाने बालकको देखकर उसके मुखकी कान्तिसे ही जान लिया कि ध्रुवका राजाके द्वारा अपमान किया गया है। माता सुनीतिको अन्तःपुरके एकान्त स्थानमें देखकर ध्रुव अपने दुःखके आवेगको न रोक सका। वह माताके गलेसे लगकर लम्बी साँस खींचता हुआ फूट-फूटकर रोने लगा। सुनीतिने उसे सान्त्वना देकर कोमल हाथसे उसका मुख पोंछा और साड़ीके अञ्चलसे हवा करती हुई माता अपने लालसे पूछने लगी—'बेटा! अपने रोनेका कारण बताओ। राजाके रहते हुए किसने तुम्हारा अपमान किया है?'॥ १४—१७ १/२॥
ध्रुव बोला— माँ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, मेरे आगे तुम ठीक-ठीक बताओ। जैसे सुरुचि राजाकी धर्मपत्नी है, वैसे ही तुम भी हो; फिर उन्हें सुरुचि ही क्यों प्यारी है? माता, तुम उन नरेशको क्यों प्रिय नहीं [हो?]