संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१०४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ३१ ]
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१०४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ३१ ]
[संस्कृत श्लोक]
सुरुचिरुवाच दौर्भागेय किमारोढुमिच्छेरङ्के महीपतेः। बाल बालिशबुद्धित्वादभाग्याजाठरोद्भवः॥ ७ अस्मिन् सिंहासने स्थातुं सुकृतं किं त्वया कृतम्॥ ८ यदि स्यात् सुकृतं तत्किं दुर्भाग्योदरगोऽभवः। अनेनैवानुमानेन बुध्यस्व स्वल्पपुण्यताम्॥ ९ भूत्वा राजकुमारोऽपि नालंकुर्या ममोदरम्। सुकुक्षिजममूं पश्य त्वमुत्तममनुत्तमम्॥ १० अधिजानु धरापान्वोर्मानेन परिबृंहितम्।
सूत उवाच मध्येराजसभां बालस्तयेति परिभर्त्सितः॥ ११ निपतन्नेत्रबाष्पाम्बुधैर्यात् किंचिन्न चोक्तवान्। उचितं नोचितं किंचिन्नोचिवान् सोऽपि पार्थिवः॥ १२ नियन्त्रितो महिष्याश्च तस्याः सौभाग्यगौरवात्। विसर्जितसभालोकं शोकं संहृत्य चेष्टितैः॥ १३ शैशवैः स शिशुर्नत्वा नृपं स्वसदनं ययौ। सुनीतिर्नीतिनिलयमवलोक्याथ बालकम्॥ १४ मुखलक्ष्म्यैव चाज्ञासीद् ध्रुवं राज्ञापमानितम्। अथ दृष्ट्वा सुनीतिं तु रहोऽन्तःपुरवासिनीम्॥ १५ आलिङ्ग्य दीर्घं निःश्वस्य मुक्तकण्ठं रुरोद ह। सान्त्वयित्वा सुनीतिस्तं वदनं परिमार्ज्य च॥ १६ दुकूलाञ्चलसम्पर्कैर्वीज्य तं मृदुपाणिना। पप्रच्छ तनयं माता वद रोदनकारणम्॥ १७ विद्यमाने नरपतौ शिशो केनापमानितः।
ध्रुव उवाच सम्पृच्छे जननि त्वाहं सम्यक् शंस ममाग्रतः॥ १८ भार्यात्वेऽपि च सामान्ये कथं सा सुरुचिः प्रिया। कथं न भवती माततः प्रिया क्षितिपतेरसि॥ १९
[हिन्दी अनुवाद]
सुरुचि बोली— अभागिनीके बच्चे! क्या तू भी महाराजकी गोदमें चढ़ना चाहता है? बालक! मूर्खतावश ही ऐसी चेष्टा कर रहा है। तू इसके योग्य कदापि नहीं है; क्योंकि तू एक भाग्यहीना स्त्रीके गर्भसे पैदा हुआ है। बता तो सही, तूने इस सिंहासनपर बैठनेके लिये कौन-सा पुण्यकर्म किया है? यदि पुण्य ही किया होता तो क्या अभागिनीके गर्भसे जन्म लेता? राजकुमार होनेपर भी तू मेरे उदरकी शोभा नहीं बढ़ा सका है। इसी बातसे जान ले कि तेरा पुण्य बहुत कम है। उत्तम कोखसे पैदा हुआ है—कुमार 'उत्तम' जो सर्वश्रेष्ठ है; देखो, वह कितने सम्मानके साथ पृथ्वीनाथ महाराजके दोनों घुटनोंपर बैठा है॥ ७—१० १/२॥
सूतजी कहते हैं— राजसभाके बीच सुरुचिके द्वारा इस प्रकार झिड़के जानेपर बालक ध्रुवकी आँखोंसे अश्रुबिन्दु झरने लगे; किंतु वह धैर्यपूर्वक कुछ भी न बोला। इधर राजा भी रानीके सौभाग्य-गौरवसे आबद्ध हो, उसका कार्य उचित था या अनुचित, कुछ भी न कह सके। जब सभासद्गण बिदा हुए, तब अपनी शैशवोचित चेष्टाओंसे शोकको दबाकर वह बालक राजाको प्रणाम करके अपने घरको गया॥ ११—१३ १/२॥
सुनीतिने अपने नीतिके खजाने बालकको देखकर उसके मुखकी कान्तिसे ही जान लिया कि ध्रुवका राजाके द्वारा अपमान किया गया है। माता सुनीतिको अन्तःपुरके एकान्त स्थानमें देखकर ध्रुव अपने दुःखके आवेगको न रोक सका। वह माताके गलेसे लगकर लम्बी साँस खींचता हुआ फूट-फूटकर रोने लगा। सुनीतिने उसे सान्त्वना देकर कोमल हाथसे उसका मुख पोंछा और साड़ीके अञ्चलसे हवा करती हुई माता अपने लालसे पूछने लगी—'बेटा! अपने रोनेका कारण बताओ। राजाके रहते हुए किसने तुम्हारा अपमान किया है?'॥ १४—१७ १/२॥
ध्रुव बोला— माँ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, मेरे आगे तुम ठीक-ठीक बताओ। जैसे सुरुचि राजाकी धर्मपत्नी है, वैसे ही तुम भी हो; फिर उन्हें सुरुचि ही क्यों प्यारी है? माता, तुम उन नरेशको क्यों प्रिय नहीं [हो?]
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०५ कथमुत्तमतां प्राप्त उत्तमः सुरुचेः सुतः। हो ? सुरुचिका पुत्र उत्तम क्यों श्रेष्ठ है ? राजकुमार होनेमें कुमारत्वेऽपि सामान्ये कथं चाहमनुत्तमः ॥ २० तो हम दोनों एक समान हैं। फिर क्या कारण है कि कथं त्वं मन्दभाग्यासि सुकुक्षिः सुरुचिः कथम्। मैं उत्तम नहीं हूँ ? तुम क्यों मन्दभागिनी हो और सुरुचि कथं नृपासनं योग्यमुत्तमस्य कथं न मे ॥ २१ क्यों उत्तम कोखवाली है ? राजसिंहासन क्यों उत्तमके कथं मे सुकृतं तुच्छमुत्तमस्योत्तमं कथम्। ही योग्य है ? मेरे योग्य क्यों नहीं है ? मेरा पुण्य तुच्छ इति श्रुत्वा वचस्तस्य सुनीतिर्नीतिमच्छिशोः ॥ २२ और उत्तमका पुण्य उत्तम कैसे है ? ॥ १८-२११/२ ॥ किंचिदुच्छ्वस्य शनकैः शिशुशोकोपशान्तये। सुनीति अपने पुत्रके इस नीतियुक्त वचनको स्वभावमधुरां वाणीं वक्तुं समुपचक्रमे ॥ २३ सुनकर धीरेसे थोड़ी लम्बी साँस खींच बालकका दुःख शान्त करनेके लिये स्वभावतः मधुर वाणीमें बोलने सुनीतिरुवाच लगी ॥ २२-२३ ॥ अयि तात महाबुद्धे विशुद्धेनान्तरात्मना । सुनीति बोली-तात! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। निवेदयामि ते सर्वं मावमाने मतिं कृथाः ॥ २४ तुमने जो कुछ पूछा है, वह सब शुद्ध हृदयसे मैं निवेदन तया यदुक्तं तत्सर्वं तथ्यमेव न चान्यथा। करती हूँ; तुम अपमानकी बात मनमें न लाओ। सुरुचिने यदि सा महिषी राज्ञो राज्ञीनामतिवल्लभा ॥ २५ जो कुछ कहा है, वह सब ठीक ही है, अन्यथा नहीं महासुकृतसम्भारैरुत्तमश्चोत्तमोदरे । है। यदि वह पटरानी है तो सभी रानियोंसे बढ़कर उवास तस्याः पुण्याया नृपसिंहासनोचितः ॥ २६ राजाकी प्यारी है ही। राजकुमार उत्तमने बहुत बड़े आतपत्रं च चन्द्राभं शुभे चापि हि चामरे। पुण्योंका संग्रह करके उस पुण्यवती रानीके उत्तम गर्भमें भद्रासनं तथोच्चं च सिन्धुराश्च मदोत्कटाः ॥ २७ निवास किया था, अतः वही राजसिंहासनपर बैठनेके तुरंगमाश्च तुरगा अनाधिव्याधि जीवितम् । योग्य है। चन्द्रमाके समान निर्मल श्वेत छत्र, सुन्दर निःसपत्नं शुभं राज्यं प्राप्यं विष्णुप्रसादतः ॥ २८ युगल चँवर, उच्च सिंहासन, मदमत्त गजराज, शीघ्रगामी तुरग, आधि-व्याधियोंसे रहित जीवन, शत्रुरहित सुन्दर सूत उवाच राज्य-ये वस्तुएँ भगवान् विष्णुकी कृपासे प्राप्त होती इत्याकर्ण्य सुनीत्यास्तन्मातुर्वाक्यमनिन्दितम्। हैं ॥ २४-२८ ॥ सौनीतेयो ध्रुवो वाचमाददे वक्तुमुत्तरम् ॥ २९ सूतजी बोले-माता सुनीतिके इस उत्तम वचनको सुनकर सुनीतिकुमार ध्रुवने उन्हें उत्तर देनेके लिये ध्रुव उवाच बोलना आरम्भ किया ॥ २९ ॥ जनयित्रि सुनीते मे शृणु वाक्यमनाकुलम्। ध्रुव बोला-जन्मदायिनी माता सुनीते ! आज मेरे उत्तानचरणादन्यन्नास्तीति मे मतिः शुभे ॥ ३० शान्तिपूर्वक कहे हुए वचन सुनो। शुभे ! आजतक मैं यही सिद्धार्थोऽस्यम्ब यद्यस्ति कश्चिदाश्रितकामधुक्। समझता था कि पिता उत्तानपादसे बढ़कर और कुछ नहीं अद्यैव सकलाराध्यं तमाराध्य जगत्पतिम् ॥ ३१ है। परंतु अम्ब! यदि अपने आश्रितजनोंकी कामना पूर्ण तत्तदासादितं विद्धि पदमन्यैर्दुरासदम्। करनेवाला कोई और भी है तो यह जानकर आज मैं कृतार्थ एकमेव हि साहाय्यं मातर्मे कर्तुमर्हसि ॥ ३२ हो गया। माँ ! तुम ऐसा समझो कि उन सर्वाराध्य जगदीश्वरकी आराधना करके जो-जो स्थान दूसरोंके लिये दुर्लभ है, वह अनुज्ञां देहि मे विष्णुं यथा चाराधयाम्यहम्। सब मैंने आज ही प्राप्त कर लिया। माता ! तुम्हें मेरी एक ही सहायता करनी चाहिये। केवल आज्ञा दे दो, जिससे मैं भगवान् विष्णुकी आराधना करूँ ॥ ३०-३२१/२ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१०६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
१०६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
सुनीतिरुवाच
अनुज्ञातुं न शक्नोमि त्वामुत्तानशयाङ्ग-ज ॥ ३३ सप्ताष्टवर्षदेशीयः क्रीडायोग्योऽसि पुत्रक । त्वदेकतनया तात त्वदाधारैकजीविता ॥ ३४ लब्धोऽसि कतिभिः कष्टैरिष्टाः सम्प्रार्थ्य देवताः । यदा यदा बहिर्यासि रन्तुं त्रिचतुरं पदम् । तदा तदा मम प्राणस्तात त्वामुपगच्छति ॥ ३५
सुनीति बोली—बेटा! उत्तानपादनन्दन! मैं तुम्हें आज्ञा नहीं दे सकती। मेरे बच्चे! इस समय तुम्हारी सात-आठ वर्षकी अवस्था है। अभी तो तुम खेलने-कूदनेके योग्य हो। तात! एकमात्र तुम्हीं मेरी संतान हो; मेरा जीवन एक तुम्हारे ही आधारपर टिका हुआ है। कितने ही कष्ट उठाकर, अनेक इष्ट देवी-देवताओंकी प्रार्थना करके मैंने तुम्हें पाया है। तात! तुम जब-जब खेलनेके लिये भी तीन-चार कदम बाहर जाते हो, तब-तब मेरे प्राण तुम्हारे पीछे-ही-पीछे लगे रहते हैं॥ ३३—३५॥
ध्रुव उवाच
अद्य यावत् पिता माता त्वं चोत्तानपदो विभुः । अद्य प्रभृति मे माता पिता विष्णुर्न संशयः ॥ ३६
ध्रुव बोला—माँ! अबतक तो तुम और राजा उत्तानपाद ही मेरे माता-पिता थे; परंतु आजसे मेरे माता और पिता दोनों भगवान् विष्णु ही हैं, इसमें संदेह नहीं है॥ ३६॥
सुनीतिरुवाच
विष्णोराराधने नाहं वारये त्वां सुपुत्रक । जिह्वा मे शतधा यातु यदि त्वां वारयामि भोः ॥ ३७
सुनीति बोली—मेरे सुयोग्य पुत्र! मैं भगवान् विष्णुकी आराधना करनेसे तुम्हें रोकती नहीं। यदि रोकूँ तो मेरी जिह्वाके सैकड़ों टुकड़े हो जायँ ॥ ३७॥
इत्यनुज्ञामिव प्राप्य जननीचरणाम्बुजौ । परिक्रम्य प्रणम्याथ तपसे च ध्रुवो ययौ ॥ ३८ तयापि धैर्यसूत्रेण सुनीत्या परिगुम्प्य च। तत्रेन्दीवरजा माला ध्रुवस्योपायनीकृता ॥ ३९ मात्रा तन्मार्गरक्षार्थं तदा तदनुगीकृताः । परैरवार्यप्रसराः स्वाशीर्वादाः परैश्शताः ॥ ४०
इस प्रकार आज्ञा-सी पाकर ध्रुव माताके चरणकमलोंकी परिक्रमा और उन्हें प्रणाम करके तपस्याके लिये प्रस्थित हुआ। सुनीतिने धैर्यपूर्वक सूत्रमें नील कमलकी माला गूँथकर पुत्रको उपहार दिया। मार्गमें पुत्रकी रक्षाके लिये माताने अपने शत-शत आशीर्वाद, जिनका प्रभाव शत्रु भी नहीं रोक सकते थे, उसके पीछे लगा दिये ॥ ३८—४०॥
सर्वत्रावतु ते पुत्र शङ्खचक्रगदाधरः । नारायणो जगद्व्यापी प्रभुः कारुण्यवारिधिः ॥ ४१
[वह बोली—] ‘पुत्र! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले दयासागर जगद्व्यापी भगवान् नारायण सर्वत्र तुम्हारी रक्षा करें'॥ ४१॥
सूत उवाच
स्वसौधात् स विनिर्गत्य बालो बालपराक्रमः । अनुकूलेन मरुता दर्शिताध्वाविशद्वनम् ॥ ४२ स मातृदैवतोऽभिज्ञः केवलं राजवर्त्मनि । न वेद काननाध्वानं क्षणं दध्यौ नृपात्मजः ॥ ४३
सूतजी बोले—बालोचित पराक्रम करनेवाले बालक ध्रुवने अपने महलसे निकलकर अनुकूल वायुके द्वारा दिखायी हुई राह पकड़कर उपवनमें प्रवेश किया। माताको ही देवता माननेवाला और केवल राजमार्गको ही जाननेवाला वह राजकुमार वनके मार्गको नहीं जानता था, अतः एक क्षणतक आँखें बंद करके कुछ सोचने लगा॥ ४२-४३॥
पुरोपवनमासाद्य चिन्तयामास सोऽर्भकः । किं करोमि क्व गच्छामि को मे साहाय्यदो भवेत् ॥ ४४ एवमुन्मील्य नयने यावत् पश्यति स ध्रुवः । तावद्ददर्श सप्तर्षीन् अतर्कितगतीन् वने ॥ ४५ अथ दृष्ट्वा स सप्तर्षीन् समसप्ततितेजसः । भाग्यसूत्रैरिवाकृष्योपनीतान् प्रमुमोद ह ॥ ४६
नगरके उपवनमें आकर बालक ध्रुव इस प्रकार चिन्ता करने लगा—'क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कौन मुझे सहायता देनेवाला होगा?' ऐसा विचार करते हुए उसने ज्यों ही आँखें खोलकर देखा, त्यों ही उस उपवनमें अप्रत्याशित गतिवाले सप्तर्षि उसे दिखायी दिये। उन सूर्यतुल्य तेजस्वी सप्तर्षियोंको, जो मानो भाग्यसूत्रसे ही खिंचकर ले आये गये थे, देखकर ध्रुव बहुत प्रसन्न
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०७ तिलकाङ्कितसद्भालान् कुशोपग्रहिताङ्गुलीन् । हुआ। उनके सुन्दर ललाटमें तिलक लगे थे। उन्होंने कृष्णाजिनोपविष्टांश्च ब्रह्मसूत्रैरलंकृतान् ॥ ४७ अँगुुलियोंमें कुशकी पवित्री पहन रखी थी तथा यज्ञोपवीतोंसे विभूषित होकर वे काले मृगचर्मपर बैठे उपगम्य विनम्रांसः प्रबद्धकरसम्पुटः । हुए थे। उनके पास जाकर ध्रुवने गर्दन झुका दी, दोनों ध्रुवो विज्ञापयांचक्रे प्रणम्य ललितं वचः ॥ ४८ हाथ जोड़ लिये और प्रणाम करके मधुर वाणीमें उन्हें अपना अभिप्राय निवेदित किया॥ ४४-४८॥ ध्रुव उवाच ध्रुव बोला—मुनिवरो ! आप मुझे सुनीतिके गर्भसे अवैत मां मुनिवराः सुनीत्युदरसम्भवम्। उत्पन्न राजा उत्तानपादका पुत्र ध्रुव जानें। इस समय मेरा उत्तानपादतनयं ध्रुवं निर्विण्णमानसम् ॥ ४९ चित्त जगत्की ओरसे विरक्त है॥ ४९॥ सूत उवाच सूतजी कहते हैं—अमूल्य नीति ही जिसका भूषण तं दृष्ट्वौजस्वलं बालं स्वभावमधुराकृतिम्। है—ऐसे मधुर और गम्भीर भाषण करनेवाले एवं स्वभावतः अनर्घ्यनयनेपथ्यं मृदुगम्भीरभाषिणम् ॥ ५० मनोहर आकृतिवाले उस तेजस्वी बालकको देखकर ऋषियोंने अत्यन्त विस्मित हो उसे अपने पास बिठाया उपोपवेश्य शिशुकं प्रोचुस्ते विस्मिता भृशम् । और कहा—'वत्स ! अभीतक तुम्हारे वैराग्य या निर्वेदका तवाद्यापि न जानीमो वत्स निर्वेदकारणम् ॥ ५१ कारण हम नहीं जान सके। वैराग्य तो उन मनुष्योंको होता है, जिनकी मनःकामनाएँ पूर्ण नहीं हो पातीं। तुम अनवाप्ताभिलाषाणां वैराग्यं जायते नृणाम्। तो सातों द्वीपोंके अधीश्वर सम्राट्के पुत्र हो; तुम अपूर्णमनोरथ सप्तद्वीपपते राज्ञः कुमारस्त्वं तथा कथम् ॥ ५२ कैसे हो सकते हो? हमसे तुम्हें क्या काम है ? तुम्हारी किमस्माभिरहो कार्यं कस्तवास्ति मनोरथः। मनोवाञ्छा क्या है'॥ ५०-५२ १/२ ॥ ध्रुव उवाच ध्रुव बोला—'मुनिगण ! मेरे जो उत्तमोत्तम बन्धु मुनयो मम यो बन्धुरुत्तमश्चोत्तमोत्तमः ॥ ५३ उत्तमकुमार हैं—उनके ही लिये पिताका दिया हुआ शुभ सिंहासन रहे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वरो ! पित्रा प्रदत्तं तस्यास्तु तद्भद्रासनमुत्तमम्। मैं आपलोगोंसे इतनी ही सहायता चाहता हूँ कि जिस भवत्कृतं हि साहाय्यं एतदिच्छामि सुव्रताः ॥ ५४ स्थानका किसी दूसरे राजाने उपभोग न किया हो, जो अन्य सभी स्थानोंसे उत्कृष्ट हो और इन्द्रादि देवताओंके अनन्यनृपभुक्तं यद् यदन्येभ्यः समुच्छ्रितम्। लिये भी दुर्लभ हो, वह स्थान मुझे किस उपायसे प्राप्त इन्द्रादिदुरवापं यत् कथं लभ्येत तत्पदम् ॥ ५५ हो सकता है, यह बता दें।' उस समय उस बालककी इति श्रुत्वा वचस्तस्य मुनयो बालकस्य तु। ये बातें सुनकर मरीचि आदि ऋषियोंने उसे यथार्थ ही यथार्थमेव प्रत्यूचुर्मरीच्याद्यास्तदा ध्रुवम् ॥ ५६ उत्तर दिया ॥ ५३–५६ ॥ मरीचिरुवाच मरीचि बोले—जिसने गोविन्द-चरणारविन्दोंके परागके रसका आस्वादन नहीं किया, वह मनोरथ- अनास्वादितगोविन्दपदाम्बुजरजोरसः । पथसे अतीत (ध्यानमें भी न आ सकनेवाले) पर्मोज्ज्वल मनोरथपथातीतं स्फीतं नाकलयोत् फलम् ॥ ५७ फलको नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ५७॥
१०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
१०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१ अत्रिरुवाच | अत्रि बोले—जिसने अच्युतके चरणोंकी अर्चना अनर्चिताच्युतपदः पदमासादयेत् कथम्। | नहीं की है, वह पुरुष उस पदको, जो इन्द्रादि देवताओंके इन्द्रादिदुरवापं यन्मानवैः सुदुरासदम्॥ ५८ | लिये भी दुर्लभ और मनुष्योंके लिये तो अत्यन्त | दुष्प्राप्य है, कैसे पा सकता है ? ॥ ५८ ॥ अङ्गिरा उवाच | अङ्गिरा बोले—जो भगवान् कमलाकान्तके कमनीय न हि दूरे पदं तस्य सर्वासां सम्पद्दामिह । | चरणकमलोंका अनुशीलन (चिन्तन) करता है, उसके कमलाकान्तकान्ताङ्घ्रिकमलं यः सुशीलयेत्॥ ५९ | लिये त्रिभुवनकी सारी सम्पदाओंका स्थान दूर (दुर्लभ) | नहीं है ॥ ५९ ॥ पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्य बोले—ध्रुव ! जिनके स्मरणमात्रसे यस्य स्मरणमात्रेण महापातकसंततिः। | महापातकोंकी परम्परा अत्यन्त नाशको प्राप्त हो जाती परमान्तकमाप्नोति स विष्णुः सर्वदो ध्रुव ॥ ६० | है, वे भगवान् विष्णु ही सब कुछ देनेवाले हैं ॥ ६० ॥ पुलह उवाच | पुलह बोले—जिन्हें प्रधान (प्रकृति) और पुरुष यदाहुः परमं ब्रह्म प्रधानपुरुषात् परम्। | (जीव)—से विलक्षण परब्रह्म कहते हैं, जिनकी मायासे यन्मायया कृतं सर्वं स विष्णुः कीर्तितोऽर्थदः ॥ ६१ | समस्त प्रपञ्च रचा गया है, उन भगवान् विष्णुका यदि | कीर्तन किया जाय तो वे अपने भक्तके अभीष्ट मनोरथको क्रतुरुवाच | पूर्ण कर देते हैं ॥ ६१ ॥ यो यज्ञपुरुषो विष्णुर्वेदवेद्यो जनार्दनः । | क्रतु बोले—जो यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु वेदोंके अन्तरात्मास्य जगतः संतुष्टः किं न यच्छति ॥ ६२ | द्वारा जाननेयोग्य हैं तथा जो जनार्दन इस समस्त जगत्के | अन्तरात्मा हैं, वे प्रसन्न हों तो क्या नहीं दे सकते ? ॥ ६२ ॥ वसिष्ठ उवाच | वसिष्ठ बोले—राजकुमार ! जिनकी भौंहोंके नर्तनमात्रमें यद्भ्रूनर्तनवर्तिन्यः सिद्धयोऽष्टौ नृपात्मज। | आठों सिद्धियाँ वर्तमान हैं, उन भगवान् हृषीकेशकी तमाराध्य हृषीकेशं चतुर्वर्गो न दूरतः ॥ ६३ | आराधना करनेसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों | पुरुषार्थ दूर नहीं रहते ॥ ६३ ॥ ध्रुव उवाच | ध्रुव बोले—द्विजवरो ! भगवान् विष्णुकी आराधनाके सत्यमुक्तं द्विजेन्द्रा वो विष्णोराराधनं प्रति। | सम्बन्धमें आपलोगोंने जो विचार प्रकट किया, वह कथं स भगवानिज्यः स विधिश्चोपदिश्यताम् ॥ ६४ | सत्य है। अब मुझे यह बताइये कि उन भगवान्की पूजा | कैसे करनी चाहिये ? उसकी विधिका मुझे उपदेश प्रभूतदो भवेद्यो वै दुराराध्यतमो भवेत्। | कीजिये। जो बहुत कुछ दे सकते हैं, उनकी आराधना बालोऽहं राजपुत्रोऽहं दुःखं नैव मया क्षमम्॥ ६५ | भी कठिन ही होगी। मैं राजकुमार हूँ और बालक हूँ; | मुझसे विशेष कष्ट नहीं सहा जा सकता ॥ ६४-६५ ॥ मुनय ऊचुः | मुनिगण बोले—खड़े होते, चलते, सोते-जागते, तिष्ठता गच्छता वापि स्वपता जाग्रता तथा। | लेटते और बैठते हुए प्रतिक्षण भगवान् नारायणका स्मरण शयानेनोपविष्टेन वेद्यो नारायणः सदा ॥ ६६ | करना चाहिये। भगवान् वासुदेवके नामका जप करनेवाला पुत्रान् कलत्रं मित्राणि राज्यं स्वर्गापवर्गकम्। | मनुष्य पुत्र, स्त्री, मित्र, राज्य, स्वर्ग तथा मोक्ष—सब कुछ वासुदेवं जपन् मर्त्यः सर्वं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ ६७ |
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०९ द्वादशाक्षरमन्त्रेण वासुदेवात्मकेन च। पा लेता है—इसमें संशय नहीं है। वासुदेवस्वरूप द्वादशाक्षर ध्यायंश्चतुर्भुजं विष्णुं जप्त्वा सिद्धिं न को गतः ॥ ६८ मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) -के द्वारा चार पितामहेन चाप्येष महामन्त्र उपासितः। भुजाधारी भगवान् विष्णुका ध्यान और जप करके किसने मनुना राज्यकामेन वैष्णवेन नृपात्मज ॥ ६९ सिद्धि नहीं प्राप्त कर ली ? राजकुमार ! पितामह (ब्रह्माजी) - त्वमप्येतेन मन्त्रेण वासुदेवपरो भव। ने भी इस महामन्त्रकी उपासना की थी। विष्णुभक्त मनुने यथाभिलषितामृद्धिं क्षिप्रं प्राप्स्यसि सत्तम ॥ ७० भी राज्यकी कामनासे इस मन्त्रद्वारा भगवान्की आराधना की थी। सत्पुरुषशिरोमणे ! तुम भी इस मन्त्रद्वारा भगवान् वासुदेवकी आराधनामें लग जाओ। इससे बहुत शीघ्र ही सूत उवाच अपनी मनोवाञ्छित समृद्धि प्राप्त कर लोगे ॥ ६६–७० ॥ इत्युक्त्वान्तर्हिताः सर्वे महात्मानो मुनीश्वराः। सूतजी कहते हैं—यों कहकर वे सभी महात्मा वासुदेवमना भूत्वा ध्रुवोऽपि तपसे ययौ ॥ ७१ मुनीश्वर वहीं अन्तर्हित हो गये और ध्रुव भी भगवान् ध्रुवः सर्वार्थदं मन्त्रं जपन् मधुवने तपः। वासुदेवमें मन लगाकर तपस्याके लिये चला गया। स चक्रे यमुनातीरे मुनिदिष्टेन वर्त्मना ॥ ७२ द्वादशाक्षर मन्त्र सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है। ध्रुव श्रद्धान्वितेन जपता च तपःप्रभावात् मधुवनमें यमुनाके तटपर मुनियोंकी बतायी हुई पद्धतिसे साक्षाद्दिवाब्जनयनं ददृशे हृदीशम्। उस मन्त्रका जप करने लगा। श्रद्धापूर्वक उस मन्त्रका दिव्याकृतिं सपदि तेन ततः स एव जप करते हुए राजकुमार ध्रुवने तपके प्रभावसे तत्काल हर्षात् पुनः स प्रजजाप नृपात्मभूतः ॥ ७३ ही हृदयमें भगवान् कमलनयनको प्रकट प्रत्यक्षवत् देखा। क्षुत्तर्षवर्षघनवातमहोष्णतादि- उनकी आकृति बड़ी दिव्य थी। भगवान्के दर्शनसे उसका शारीरदुःखकुलमस्य न किंचनाभूत्। हर्ष बढ़ गया। अब तो वह राजपुत्र पुनः बड़े उत्साहसे मग्ने मनस्यनुपमेयसुखाम्बुराशौ उस मन्त्रका जप करने लगा। उस समय भूख, प्यास, राज्ञः शिशोर्न च विवेद शरीरवार्ताम् ॥ ७४ वर्षा, आँधी और अधिक गर्मी आदि दैहिक दुःखोंमेंसे विघ्नाश्च तस्य किल शङ्कितदेवसृष्टा कोई भी उसे नहीं व्यापा। उस राजकुमारका मन अनुपम बालस्य तीव्रतपसो विफला बभूवुः। आनन्द-महासागरमें गोता लगा रहा था। अतः उस समय शीतातपादिरिव विष्णुमयं मुनिं हि उसे अपने शरीरकी भी सुध नहीं रह गयी थी। कहते प्रादेशिका न खलु धर्षयितुं क्षमन्ते ॥ ७५ हैं, उसकी तपस्यासे शङ्कित हुए देवताओंने कितने ही विघ्न खड़े किये; परंतु उस तीव्र तपस्वी बालकके लिये अथ भक्तजनप्रियः प्रभुः वे सभी निष्फल ही सिद्ध हुए। शीत और धूप आदिकी शिशुना ध्यानबलेन तोषितः। ही तरह ये एकदेशीय विघ्न भी उस विष्णुस्वरूप मुनिको वरदः पतगेन्द्रवाहनो व्यथित नहीं कर पाते थे ॥ ७१–७५ ॥ हरिरागात् स्वजनं समीक्षितुम् ॥ ७६ कुछ समयके बाद भक्तजनोंके प्रियतम वरदाता मणिपिण्डकमौलिरोजितो भगवान् विष्णु बालक ध्रुवके ध्यान-बलसे संतुष्ट होकर विलसद्रत्नमहाघनच्छविः । पक्षिराज गरुडपर सवार हो, अपने उस भक्तको देखनेके स बभावुदयाद्रिमत्सरा- लिये आये। मणिसमूहद्वारा निर्मित मुकुटसे मण्डित और द्धृतबालार्क इवासिताचलः ॥ ७७ शोभाशाली कौस्तुभरत्नसे समलंकृत, महामेघके समान श्यामकन्तिवाले वे भगवान् श्रीहरि ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो उदयाचलके प्रति डाह रखनेके कारण अपने शृङ्गपर बालरविकों धारण किये साक्षात् कज्जलगिरि प्रकाशित हो In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
११० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
मूल संस्कृत श्लोक
स राजसूनुं तपसि स्थितं तं ध्रुवं ध्रुवस्निग्धदृगित्युवाच। दन्तांशुसङ्गैरमितप्रवाहैः प्रक्षालयन् रेणुमिवास्य गात्रे ॥ ७८
वरं वरं वत्स वृणीष्व यस्ते मनोगतस्त्वत्तपसास्मि तुष्टः। ध्यानेन ते चेन्द्रियनिग्रहेण मनोनिरोधेन च दुष्करेण ॥ ७९
शृण्वन् वचस्तत्सकलं गभीर- मुन्मीलिताक्षः सहसा ददर्श। स्वे चिन्त्यमानं त्विदमेव मूर्तं पुरःस्थितं ब्रह्म चतुर्भुजं सः ॥ ८०
दृष्ट्वा क्षणं राजसुतः सुपूज्यं पुरस्त्रयीशं किमिह ब्रवीमि। किं वा करोमीति ससम्भ्रमः स तु न चाब्रवीत् किंचन नो चकार ॥ ८१
हर्षाश्रुपूर्णः पुलकाञ्चिताङ्ग- स्त्रिलोकनाथेति वदन्नथोच्चैः। दण्डप्रणामाय पपात भूमौ प्रवेपमानभ्रु हरेः पुरः स हि ॥ ८२
दण्डवत् प्रणिपत्याथ परितः परिलुण्ठ्य च। रुरोद हर्षेण चिरं दृष्ट्वा तं जगतो गुरुम् ॥ ८३
नारदेन सनन्देन सनकेन च संश्रुतम्। अन्यैः सनत्कुमाराद्यैर्योगिभिर्योगिनां वरम् ॥ ८४
कारुण्यबाष्पनीरार्द्रं पुण्डरीकविलोचनम्। ध्रुवमुत्थापयांचक्रे चक्री धृत्वा करेण तम् ॥ ८५
हरिस्तु परिपस्पर्श तदङ्गं धूलिधूसरम्। कराभ्यां कोमलाभ्यां स परिष्वज्याह तं हरिः ॥ ८६
वरं वरय भो बाल यत्ते मनसि वर्तते। तद्ददामि न संदेहो नादेयं विद्यते तव ॥ ८७
हिन्दी अनुवाद
रहा हो। निश्चल और स्नेहपूर्ण दृष्टिवाले वे भगवान् अपने दाँतोंकी किरणरूप जलके अमित प्रवाहद्वारा तपस्यामें लगे हुए राजकुमार ध्रुवके शरीरकी धूलिको धोते हुए-से उससे इस प्रकार बोले ॥ ७६–७८॥
'वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या, ध्यान, इन्द्रिय-निग्रह और दुस्साध्य मनःसंयमसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह उत्तम वर मुझसे माँग लो' ॥ ७९ ॥
भगवान्की वह सम्पूर्ण गम्भीर वाणी सुनते ही ध्रुवने सहसा आँखें खोल दीं। उस समय उन्हीं चतुर्भुज ब्रह्मको, जिनका वह अपने हृदयमें चिन्तन कर रहा था, उसने सामने मूर्तिमान् होकर खड़ा देखा ॥ ८० ॥
उन परम पूजनीय त्रिभुवनपतिको सहसा सामने देख वह राजकुमार सकपका गया और 'मैं यहाँ इनसे क्या कहूँ? क्या करूँ?' इत्यादि बातें सोचता हुआ क्षणभर न तो कुछ बोला और न कुछ कर ही सका। उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भरे थे, शरीरके रोएँ खड़े हो गये थे। वह भगवान्के सामने उच्चस्वरसे 'हे त्रिभुवननाथ!' यों कहता हुआ दण्डवत्-प्रणाम करनेके लिये पृथ्वीपर पड़ गया। उस समय उसकी भौंहें काँप रही थीं। दण्डकी भाँति प्रणाम करके जगद्गुरु भगवान्की ओर एकटक दृष्टि लगाये वह आनन्दातिरेकसे चारों ओर लोट-पोट होकर देरतक रोता रहा। नारद, सनन्दन, सनक और सनत्कुमार आदि तथा अन्य योगी जिन योगीश्वरका श्रवण-कीर्तन एवं स्तवन किया करते हैं और जिनके नेत्र करुणाके आँसुओंसे भीगे हुए थे, उन्हीं कमललोचन भगवान्को आज ध्रुवने प्रत्यक्ष देखा। उस समय चक्रधर भगवान्ने अपने हाथसे पकड़कर ध्रुवको उठा लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने दोनों कोमल हाथोंसे उसके धूलिधूसरित शरीरको सब ओरसे पोंछा और उसे हृदयसे लगाकर कहा ॥ ८१–८६॥
'बच्चा! तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा है, उसके अनुसार वर माँग लो। मैं निस्संदेह वह सब तुम्हें दे दूँगा। तुम्हारे लिये कोई भी वस्तु अदेय नहीं है' ॥ ८७ ॥
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अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १११ ततो वरं राजशिशुर्ययाचे | तब राजकुमारने भगवान् विष्णुसे यही वर माँगा कि विष्णुं वरं ते स्तवशक्तमेव। | 'मुझे आपकी स्तुति करनेकी शक्ति प्राप्त हो।' यह सुनकर तं मूर्तविज्ञाननिभेन देवः | भगवान्ने मूर्तिमान् विज्ञानके समान निर्मल शङ्खसे ध्रुवके पस्पर्श शङ्खेन मुखेऽमलेन ॥ ८८ | मुखको छुआ दिया। मरीचि आदि देवर्षियोंके दिये हुए | ज्ञानरूपी चन्द्रमाकी किरणोंसे क्षालित होकर ध्रुवका चित्त अथ सुरमुनिदत्तज्ञानचन्द्रेण सम्यग् | पूर्णतया निर्मल हो गया था। फिर त्रिभुवनगुरु भगवान्के विमलितमिव चित्तं पूर्णमेव ध्रुवस्य। | शङ्ख-स्पर्शसे उसके अन्तःकरणमें ज्ञानरूपी सूर्यका उदय त्रिभुवनगुरुशङ्खस्पर्शजज्ञानभाना- | हो जानेपर उसमें पूर्ण प्रकाश हो गया। इससे वह आनन्दित नुदयति नितरान्तः साधु तुष्टाव हृष्टः ॥ ८९ | होकर भगवान्की सुन्दर स्तुति करने लगा ॥ ८८-८९ ॥ | ध्रुव बोला—समस्त मुनिगण जिनके चरणकमलोंकी ध्रुव उवाच | वन्दना करते हैं, जो खर राक्षस अथवा गर्दभरूपधारी | धेनुकासुरका संहार करनेवाले हैं, जिनकी बाललीलाएँ अखिलमुनिजननिवहनमितचरणः। खरकदन- | चपलतासे पूर्ण हैं, देवगण जिनके चरणोदक (गङ्गाजी)- करः। चपलचरितः। देवाराधितपादजलः। | की आराधना करते हैं, सजल मेघके समान जिनका | श्याम वर्ण है, सौभ विमानके अधिपति शाल्वके धाम सजलजलधरश्यामः शमितसौभपतिशाल्वधामा। | (तेज)-को जिन्होंने सदाके लिये शान्त कर दिया है, | जिन्होंने सुन्दर गोपवनिताओंके अत्यन्त विनयवश नूतन अभिरामरामातिविनयकृतनवरसरसापहतेन्द्रिय- | प्रेमरसमय रासलीलाको प्रकट किया और उससे मोहित सुररमणीविहितान्तःकरणानन्दः। अनादिनिधनः। | होनेवाली देववनिताओँके अन्तःकरणमें भी आनन्दका | संचार किया, जिनका आदि और अन्त नहीं है, जिन्होंने अधननिरजद्विजमित्रोद्धरणधीरः। अवधीरितसुरनाथ- | अपने निर्धन मित्र सुदामा नामक ब्राह्मणका धीरतापूर्वक | दैन्यदुःखसे उद्धार किया, देवराज इन्द्रकी प्रार्थनासे जिन्होंने नाथितविपक्षपक्षः। ऋक्षराजबिलप्रवेशापहृत- | उनके शत्रुपक्षको पराजित किया, ऋक्षराज जाम्बवान्की | गुहामें प्रवेश करके खोयी हुई स्यमन्तक मणिको लाकर स्यमन्तकापमार्जितनिजापवाददुरितहृतत्रैलोक्यभारः। | जिन्होंने अपने ऊपर लगे हुए कलङ्करूप दुरितको दूर | करके त्रिभुवनका भार हल्का किया है, जो द्वारकापुरीमें द्वारकावासनिरतः। स्वरितमधुरवेणुवादनश्रवणामृत- | नित्य निवास करते हैं, जो अपनी मधुर मुरली बजाकर | श्रुतिमधुर अतीन्द्रिय-ज्ञानको प्रकट करते तथा यमुनाटटपर प्रकटितातीन्द्रियज्ञानः। यमुनाटटचरः। द्विजधेनुभृङ्ग- | विचरते हैं, जिनके वंशीनादको सुननेके लिये पक्षी, गौ | और भृङ्गगण अपना-अपना आहार त्याग देते हैं, जिनके गणैस्त्यक्तनिजनिजाहारः। संसारदुस्तरपारावार- | चरणकमल दुस्तर संसार-सागरसे पार करनेके लिये समुत्तरणाङ्घ्रिपोतः। स्वप्रतापानलहुतकालयवनः। | जहाजरूप हैं, जिन्होंने अपनी प्रतापाग्निमें कालयवनको | होम दिया है, जो वनमालाधारी हैं, जिनके श्रवण वनमालाधरवरमणिकुण्डलालंकृतश्रवणः। नाना- | सुन्दर मणिमय कुण्डलोंसे अलंकृत हैं, जिनके अनेक प्रसिद्धाभिधानः। निगमविबुधमुनिजनवचन- | प्रसिद्ध नाम हैं, जो वेदवाणी तथा देवता और मुनियोंके | भी मन-वाणीके अगोचर हैं, जो भगवान् सुवर्णके समान मनोऽगोचरः। कनकपिशङ्गकौशेयवासोभगवान् | पीत रेशमी वस्त्र धारण करते हैं, जिनका वक्षःस्थल भृगुपदकौस्तुभविभूषितोरःस्थलः। स्वदयिता- | भृगुजीके चरण-चिह्न तथा कौस्तुभमणिसे अलंकृत है,
१९२ श्रीमन्नरसिंहपुराण [अध्याय ३१
१९२ श्रीमन्नरसिंहपुराण [अध्याय ३१ क्रूरनिजजननीगोकुलपालकचतुर्भुजशङ्खचक्र- | जो अपने प्रिय भक्त अक्रूर, माता देवकी और गोकुलके गदापद्मतुलसीनवदलदामहारकेयूरकटकमुकुटा- | पालक हैं तथा जो अपनी चारों भुजाओंमें शङ्ख, चक्र, लंकृतः । सुनन्दनादिभागवतोपासितविश्वरूपः । | गदा, पद्म धारण किये नूतन तुलसीदलकी माला, मुक्ताहार, पुराणपुरुषोत्तमः । उत्तमश्लोकः । लोकावासो | केयूर, कड़ा और मुकुट आदिसे विभूषित हैं, सुनन्दन वासुदेवः । श्रीदेवकीजठरसम्भूतः । भूतपतिविरञ्चि- | आदि भगवद्भक्त जिन विश्वरूप हरिकी उपासना करते नतचरणारविन्दः । वृन्दावनकृतकेलिगोपिकाजन- | हैं, जो पुराण-पुरुषोत्तम हैं, पुण्ययशवाले हैं तथा समस्त श्रमापहः । सततं सम्पादितसुजनकामः । कुन्दनिभ- | लोकोंके आवास-स्थान वासुदेव हैं, जो देवकीके उदरसे शङ्खधरमिन्दुनिभवक्त्रं सुन्दरसुदर्शनमुदारतरहासं | प्रकट हुए हैं, भूतनाथ शिव तथा ब्रह्माजीने जिनके विद्वज्जनवन्दितमिदं ते रूपमतिहृद्यमखिलेश्वरं | चरणारविन्दोंपर मस्तक झुकाया है, जो वृन्दावनमें की नतोऽस्मि । | गयी लीलासे थकी हुई गोपियोंके श्रमको दूर करनेवाले हैं, सज्जनोंके मनोरथोंको जो सर्वदा पूर्ण किया करते हैं, स्थानाभिकामी तपसि स्थितोऽहं | ऐसी महिमावाले हे सर्वेश्वर ! जो कुन्दके समान उज्ज्वल त्वां दृष्टवान् साधुमुनीन्द्रगुह्यम् । | शङ्ख धारण करते हैं, जिसका चन्द्रमाके समान सुन्दर काचं विचिन्वन्निव दिव्यरत्नं | मुख है, सुन्दर नेत्र हैं तथा अत्यन्त मनोहर मुसकान है, स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरान्न याचे ॥ ९० | ऐसे अत्यन्त हृदयहारी आपके इस रूपको, जो ज्ञानियोंद्वारा वन्दित है, मैं प्रणाम करता हूँ। मैं उत्तम स्थान प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्यामें अपूर्वदृष्टे तव पादपद्मे | प्रवृत्त हुआ और बड़े-बड़े मुनीश्वरोंके लिये भी जिनका दृष्ट्वा दृढं नाथ नहि त्यजामि । | दर्शन पाना असम्भव है, उन्हीं आप परमेश्वरका दर्शन कामान् न याचे स हि कोऽपि मूढो | पा गया—ठीक उसी तरह, जैसे काँचकी खोज करनेवाला यः कल्पवृक्षात् तुषमात्रमिच्छेत् ॥ ९१ | कोई मनुष्य भाग्यवश दिव्य रत्न हस्तगत कर ले। स्वामिन् ! मैं कृतार्थ हो गया, अब मैं कोई वर नहीं माँगता। हे त्वां मोक्षबीजं शरणं प्रपन्नः | नाथ! जिनका दर्शन अपूर्व है—पहले कभी उपलब्ध शक्नोमि भोक्तुं न बहिःसुखानि । | नहीं हुआ है, उन आपके चरणकमलोंका दर्शन पाकर रत्नाकरे देव सति स्वनाथे | अब मैं इन्हें छोड़ नहीं सकता। मैं अब भोगोंकी याचना विभूषणं काचमयं न युक्तम् ॥ ९२ | नहीं करूँगा; ऐसा कोई मूर्ख ही होगा, जो कल्पवृक्षसे केवल भूसी पाना चाहेगा ? देव ! आज मैं मोक्षके कारणभूत आप परमेश्वरकी शरणमें आ पड़ा हूँ, अब बाह्य विषय- अतो न याचे वरमीश युष्मत्- | सुखोंको मैं नहीं भोग सकता। जब रत्नोंकी खान समुद्र पादाब्जभक्तिं सततं ममास्तु । | अपना मालिक हो जाय, तब काँचका भूषण पहनना इमं वरं देववर प्रयच्छ | कभी उचित नहीं हो सकता। अतः ईश ! अब मैं दूसरा पुनः पुनस्त्वामिदमेव याचे ॥ ९३ | कोई वर नहीं माँगता; आपके चरण-कमलोंमें मेरी सदा भक्ति बनी रहे, देववर ! मुझे यही वर दीजिये। मैं बारंबार आपसे यही प्रार्थना करता हूँ ॥ ९०-९३ ॥ श्रीसूत उवाच | श्रीसूतजी कहते हैं—इस प्रकार अपने दर्शनमात्रसे इत्यात्मसंदर्शनलब्धदिव्य- | दिव्य ज्ञान प्राप्त करके स्तुति करते हुए ध्रुवको देखकर ज्ञानं गदन्तं भगवाञ्जगाद ॥ ९४ | भगवान्ने उससे कहा ॥ ९४ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन ११३ --- [संस्कृत श्लोक] --- श्रीभगवानुवाच आराध्य विष्णुं किमनेन लब्धं मा भूज्जनेऽपीत्थमसाधुवादः । स्थानं परं प्राप्नुहि यन्मतं ते कालेन मां प्राप्स्यसि शुद्धभावः ॥ ९५ आधारभूतः सकलग्रहाणां कल्पद्रुमः सर्वजनैश्च वन्द्यः । मम प्रसादात्तव सा च माता ममान्तिके या च सुनीतिरार्या ॥ ९६ श्रीसूत उवाच तं साधयित्वेति वरैर्मुकुन्दः स्वमालयं दृश्यवपुर्जगाम । त्यक्त्वा शनैर्दिव्यवपुः स्वभक्तं मुहुः परावृत्य समीक्षमाणः ॥ ९७ तावच्च सद्यः सुरसिद्धसंघः श्रीविष्णुत्तद्भक्तसमागमं तम् । दृष्ट्वाथ वर्षन् सुरपुष्पवृष्टिं तुष्टाव हर्षाद् ध्रुवमव्ययं च ॥ ९८ श्रियाभिमत्य च सुनीतिसूनु- र्विभाति देवैरपि वन्द्यमानः । योऽयं नृणां कीर्तनदर्शनाभ्या- मायुर्यशो वर्धयति श्रियं च ॥ ९९ इत्थं ध्रुवः प्राप पदं दुरापं हरेः प्रसादान्न च चित्रमेतत् । तस्मिन् प्रसन्ने द्विजराजपत्रे न दुर्लभं भक्तजनेषु किंचित् ॥ १०० सूर्यमण्डलमानात्तु द्विगुणं सोममण्डलम्। पूर्णे शतसहस्रे द्वे तस्मान्नक्षत्रमण्डलम् ॥ १०१ द्वे लक्षेऽपि बुधस्यापि स्थानं नक्षत्रमण्डलात् । तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशना स्थितः ॥ १०२ अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तावन्माने व्यवस्थितः । लक्षद्वयं तु भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः ॥ १०३ सौरिर्बृहस्पतेश्चोर्ध्वं द्विलक्षे तु व्यवस्थितः । तस्माच्छनैश्चरादूर्ध्वं लक्षे सप्तर्षिमण्डलम् ॥ १०४ सप्तर्षिमण्डलादूर्ध्वमेकं लक्षं ध्रुवः स्थितः । मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिष्चक्रस्य सत्तम ॥ १०५ --- [हिन्दी अनुवाद] --- श्रीभगवान् बोले—'ध्रुवने विष्णुकी आराधना करके क्या पा लिया?' इस तरहका अपवाद लोगोंमें न फैल जाय। इसके लिये तुम अपने अभीष्ट सर्वोत्तम स्थानको ग्रहण करो, पुनः समय आनेपर शुद्धभाव हो तुम मुझे प्राप्त कर लोगे। मेरे प्रसादसे समस्त ग्रहोंके आधारभूत, कल्पवृक्ष और सब लोगोंके वन्दनीय होकर तुम और तुम्हारी माता आर्या सुनीति मेरे निकट निवास करोगे ॥ ९५-९६ ॥ श्रीसूतजी कहते हैं—इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रकट हो, उपर्युक्त वरदानोंसे ध्रुवका मनोरथ पूर्ण करके, भगवान् मुकुन्द धीरेसे अपना वह दिव्य रूप छिपा, बारंबार घूमकर उस भक्तकी ओर देखते हुए अपने वैकुण्ठधामको चले गये। इसी बीचमें देवताओंका समुदाय भगवान् विष्णु और उनके भक्तके उस समागमको देख हर्षके मारे तत्काल दिव्य पुष्प बरसाने और उस अविनाशी ध्रुवका स्तवन भी करने लगा। सुनीतिकुमार ध्रुव आज श्री और सम्मान—दोनोंसे सम्पन्न होकर देवताओंका भी वन्दनीय हो, शोभा पा रहा है। यह अपने दर्शन तथा गुणकीर्तनसे मनुष्योंकी आयु, यश तथा लक्ष्मीकी भी वृद्धि करता रहेगा ॥ ९७–९९ ॥ इस प्रकार ध्रुव भगवान् विष्णुके प्रसादसे दुर्लभ पद पा गया—यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। उन गरुडवाहन भगवान्के प्रसन्न हो जानेपर भक्तोंके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। सूर्यमण्डलका जितना मान है, उससे दूना चन्द्रमण्डलका मान है। चन्द्रमण्डलसे पूरे दो लाख योजन दूर ऊपर नक्षत्रमण्डल है, नक्षत्रमण्डलसे भी दो लाख योजन ऊँचे बुधका स्थान है और बुधके भी स्थानसे उतनी ही दूरीपर शुक्रकी स्थिति है। शुक्रसे भी दो लाख योजन दूर मङ्गल है और मङ्गलसे दो लाख योजनपर देवपुरोहित बृहस्पतिका निवास है। बृहस्पतिसे भी दो लाख योजन ऊपर शनैश्चरका स्थान है। उन शनैश्चरसे दो लाख योजन ऊपर सप्तर्षियोंका मण्डल है। सप्तर्षि-मण्डलसे एक लाख योजन ऊपर ध्रुव स्थित है। साधुशिरोमणे ! वह समस्त ज्योतिर्मण्डलका केन्द्र है ॥ १००–१०५ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
१९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
स्वभावात् तपति विप्रेन्द्र अधश्चोर्ध्वं च रश्मिभिः। | विप्रवर ! सूर्यदेव स्वभावतः अपनी किरणोंद्वारा नीचे कालसंख्यां त्रिलोकस्य स करोति युगे युगे ॥ १०६ | तथा ऊपरके लोकोंमें ताप पहुँचाते हैं। वे ही प्रत्येक युगमें जनस्तपस्तथा सत्यमेतांल्लोकान् द्विजोत्तम। | त्रिभुवनकी कालसंख्या निश्चित करते हैं। द्विजोत्तम ! ब्रह्मणा मुनिशार्दूल विष्णुभक्तिविवर्धितः ॥ १०७ | मुनिश्रेष्ठ ! ब्रह्माजीके द्वारा विष्णुभक्तिसे अभ्युदयको प्राप्त ऊर्ध्वगतैर्द्विजश्रेष्ठ रश्मिभिस्तपते रविः। | होकर सूर्य अपनी ऊर्ध्वगत किरणोंसे ऊपरके जन, तप अधोगतैश्च भूर्लोकं द्योतते दीर्घदीधितिः ॥ १०८ | तथा सत्य लोकोंमें गर्मी पहुँचाते हैं और अधोगत किरणोंसे सर्वपापहरः सूर्यः कर्ता त्रिभुवनस्य च। | भूलोकको प्रकाशित करते हैं ॥ १०६-१०८ ॥ छत्रवत् प्रतिपश्येत मण्डलान्मण्डलं परम् ॥ १०९ | समस्त पापोंको हरनेवाले सूर्यदेव त्रिभुवनकी सृष्टि आदित्यमण्डलाधस्ताद् भुवर्लोकं प्रतिष्ठितम्। | करते हैं। वे छत्रकी भाँति स्थित हो एक मण्डलसे दूसरे त्रैलोक्यस्येश्वरत्वं च विष्णुदत्तं शतक्रतोः ॥ ११० | मण्डलको दर्शन देते और प्रकाशित करते हैं। सूर्यमण्डलके लोकपालैः स सहितो लोकान् रक्षति धर्मतः। | नीचे भुवर्लोक प्रतिष्ठित है। तीनों भुवनोंका आधिपत्य वसेत् स्वर्गे महाभाग देवेन्द्रः स तु कीर्तिमान् ॥ १११ | भगवान् विष्णुने शतक्रतु इन्द्रको दे रखा है। वे समस्त ततोऽधस्तान्मुने चेदं पातालं विद्धि सप्रभम्। | लोकपालोंके साथ धर्मपूर्वक लोकोंकी रक्षा करते हैं। न तत्र तपते सूर्यो न रात्रिर्न निशाकरः ॥ ११२ | महाभाग ! वे यशस्वी देवेन्द्र स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। दिव्यस्वरूपमास्थाय तपन्ति सततं जनाः। | मुने ! इन सात लोकोंसे नीचे यह प्रभापूर्ण पाताललोक स्थित पातालस्था द्विजश्रेष्ठ दीप्यमानाः स्वतेजसा ॥ ११३ | है, ऐसा आप जानें। वहाँ न सूर्यका ताप है, न चन्द्रमाका स्वर्लोकात्तु महर्लोकः कोटिमात्रे व्यवस्थितः। | प्रकाश, [न दिन है] न रात। द्विजश्रेष्ठ ! पातालवासी जन ततो योजनमात्रेण द्विगुणो मण्डलेन तु ॥ ११४ | दिव्यरूप धारण करके सदा अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए जनलोकः स्थितो विप्र पञ्चमो मुनिसेवितः। | तपते हैं। स्वर्गलोकसे करोड़ योजन ऊपर महर्लोक स्थित तत्रोपरि तपोलोकश्चतुर्भिः कोटिभिः स्थितः ॥ ११५ | है। हे विप्र ! उससे दूने दो करोड़ योजनपर मुनिसेवित सत्यलोकोऽष्टकोटीभिस्तपोलोकोपरिस्थितः। | जनलोक, जो पाँचवाँ लोक है, स्थित है। उससे चार करोड़ सर्वे छात्राकृतिज्ञेया भुवनोपरिसंस्थिताः ॥ ११६ | योजन ऊपर तपोलोककी स्थिति है। तपोलोकसे ऊपर ब्रह्मलोकाद्विगुलोको द्विगुणश्च व्यवस्थितः। | आठ करोड़ योजनपर सत्यलोक (ब्रह्मलोक) स्थित है। ये वाराहे तस्य माहात्म्यं कथितं लोकचिन्तकैः ॥ ११७ | सभी भुवन एक-दूसरेके ऊपर छत्रकी भाँति स्थित हैं। ततः परं द्विजश्रेष्ठ स्थितः परमपूरुषः। | ब्रह्मलोकसे सोलह करोड़ योजनपर विष्णुलोककी स्थिति ब्रह्माण्डात् परमः साक्षान्निर्लेपः पुरुषः स्थितः ॥ ११८ | है। लोकचिन्तकोंने वाराहपुराणमें उसके माहात्म्यका वर्णन पशुपाशैर्विमुच्येत तपोज्ञानसमन्वितः। | किया है। द्विजश्रेष्ठ ! इसके आगे परम पुरुषकी स्थिति है, इति ते संस्थितिः प्रोक्ता भूगोलस्य मयानघ। | जो ब्रह्माण्डसे विलक्षण साक्षात् परमात्मा हैं। इस प्रकार यस्तु सम्यगिमां वेत्ति स याति परमां गतिम् ॥ ११९ | जाननेवाला मनुष्य तप और ज्ञानसे युक्त होकर पशुपाश लोकस्य संस्थानकरोऽप्रमेयो | (अविद्या-बन्धन)-से मुक्त हो जाता है॥ १०९-११८१/२॥ विष्णुर्नृसिंहो नरदेवपूजितः। | अनघ ! इस प्रकार मैंने तुम्हें भूगोलकी स्थिति बतलायी। युगे युगे विष्णुरनादिमूर्तिमा- | जो पुरुष सम्यक् प्रकारसे इसका ज्ञान रखता है, वह परम नास्थाय विश्वं परिपाति दुष्टहा ॥ १२० | गतिको प्राप्त होता है। मनुष्यों और देवताओंसे पूजित | नृसिंहस्वरूप अप्रमेय भगवान् विष्णु लोककी रक्षा करनेवाले | हैं। वे अनादि मूर्तिमान् परमेश्वर प्रत्येक युगमें शरीर धारणकर | दुष्टोंका वध करके विश्वका पालन करते हैं॥ ११९-१२०॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे एकत्रिशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
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बत्तीसवाँ अध्याय
अध्याय ३२ ] सहस्रानीक-चरित्र; श्रीनृसिंह-पूजनका माहात्म्य ११५ बत्तीसवाँ अध्याय सहस्रानीक-चरित्र; श्रीनृसिंह-पूजनका माहात्म्य भरद्वाज उवाच सहस्रानीकस्य हरेरवतारांश्च शार्ङ्गिणः। साम्प्रतं श्रोतुमिच्छामि तन्मे वद महामते॥ १ सूत उवाच हन्त ते कथयिष्यामि चरितं तस्य धीमतः। सहस्रानीकस्य हरेरवतारांश्च मे शृणु॥ २ सहस्रानीकोऽभिषिक्तो निजराज्ये द्विजोत्तमैः। पालयामास धर्मेण राज्यं स तु नृपात्मजः॥ ३ तस्य पालयतो राज्यं राजपुत्रस्य धीमतः। भक्तिर्बभूव देवेशे नरसिंहे सुरोत्तमे॥ ४ तं द्रष्टुमागतः साक्षाद्विष्णुभक्तं भृगुः पुरा। अर्घ्यपाद्यासनै राजा तमभ्यर्च्यब्रवीदिदम्॥ ५ पावितोऽहं मुनिश्रेष्ठ साम्प्रतं तव दर्शनात्। त्वद्दर्शनमपुण्यानां कलावस्मिन् सुदुर्लभम्॥ ६ नरसिंहं प्रतिष्ठाप्य देवदेवं सनातनम्। आराधयितुमिच्छामि विधानं तत्र मे वद॥ ७ अवतारांनशेषांश्च देवदेवस्य चक्रिणः। श्रोतुमिच्छामि सकलांस्तान् पुण्यानपि मे वद॥ ८ भृगुरुवाच शृणु भूपालपुत्र त्वं न हि कश्चित् कलौ युगे। हरौ भक्तिं करोत्यत्र नृसिंहे चातिभक्तिमान्॥ ९ स्वभावाद्यस्य भक्तिः स्यान्नरसिंहे सुरोत्तमे। तस्यारयः प्रणश्यन्ति कार्यसिद्धिश्च जायते॥ १० त्वमतीव हरेर्भक्तः पाण्डुवंशेऽपि सत्तमः। तेन ते निखिलं वक्ष्ये शृणुष्वैकाग्रमानसः॥ ११ यः कुर्याच्छोभनं वेश्म नरसिंहस्य भक्तिमान्। स सर्वपापनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात्॥ १२ प्रतिमां लक्षणोपेतां नरसिंहस्य कारयेत्। स सर्वपापनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात्॥ १३ भरद्वाजजी बोले—सूतजी! अब मैं सहस्रानीकका चरित्र और भगवान् विष्णुके अवतारोंकी कथा सुनना चाहता हूँ; महामते! कृपा करके वह मुझसे कहिये॥ १॥ सूतजीने कहा—ब्रह्मन्! बहुत अच्छा, अब मैं बुद्धिमान् सहस्रानीकके चरित्रका और भगवान्के अवतारोंका वर्णन करूँगा, सुनिये॥ २॥ राजकुमार सहस्रानीकको जब उत्तम ब्राह्मणोंने उसके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया, तब वे धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगे। राज्यके पालनमें लगे हुए बुद्धिमान् राजकुमारकी देवेश्वर, देवश्रेष्ठ भगवान् नृसिंहमें भक्ति हो गयी। पूर्वकालमें एक बार उन विष्णुभक्त नरेशका दर्शन करनेके लिये स्वयं भृगुजी आये। राजाने अर्घ्य, पाद्य और आसनादिके द्वारा भृगुजीका सम्मान करके उनसे यह कहा—'मुनिश्रेष्ठ! इस समय मैं आपके दर्शनसे पवित्र हो गया। जिन्होंने पुण्य नहीं किया है, ऐसे मनुष्योंके लिये इस कलियुगमें आपका दर्शन परम दुर्लभ है। मैं सनातन देवदेव नरसिंहकी स्थापना करके उनकी आराधना करना चाहता हूँ, आप कृपया मुझे इसका विधान बतायें। तथा मैं देवदेव श्रीहरिके सम्पूर्ण अवतारोंको भी सुनना चाहता हूँ; अतः आप उन सभी पुण्यावतारोंकी कथा मुझसे कहिये'॥ ३—८॥ भृगुजी बोले—राजकुमार! सुनो; इस कलियुगमें कोई भी भगवान् नृसिंहके प्रति अत्यन्त भक्तिभाव रखकर उनकी आराधना नहीं कर रहा है। देववर भगवान् नृसिंहमें जिसकी स्वभावतः भक्ति हो जाती है, उसके सारे शत्रु नष्ट हो जाते हैं और उसे प्रत्येक कार्यमें सिद्धि प्राप्त होती है। इस पाण्डुवंशमें तुम ही श्रेष्ठ पुरुष और भगवान्के अत्यन्त भक्त हो; अतः तुमसे मैं तुम्हारी पूछी हुई सब बातें बताऊँगा; एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ ९—११॥ जो भक्तिपूर्वक नृसिंहदेवका सुन्दर मन्दिर निर्माण कराता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें स्थान पाता है। जो भगवान् नृसिंहकी सुन्दर लक्षणोंसे युक्त प्रतिमा बनवाता है, वह सब पापोंसे छुटकारा पाकर विष्णुलोकको जाता है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
११६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
११६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३ प्रतिष्ठां नरसिंहस्य यः करोति यथाविधि । नरश्रेष्ठ! जो निष्कामभावसे नृसिंहदेवकी विधिवत् प्रतिष्ठा निष्कामो नरशार्दूल देहबाधात् प्रमुच्यते ॥ १४ करता है, वह दैहिक दुःखोंसे मुक्त हो जाता है। जो नरसिंहं प्रतिष्ठाप्य यः पूजामाचरेन्नरः । भगवान् नृसिंहकी स्थापना करके सदा उनकी पूजा तस्य कामाः प्रसिध्यन्ति परमं पदमाप्नुयात् ॥ १५ करता है, उसके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं तथा वह परम ब्रह्मादयः सुराः सर्वे विष्णुमाराध्य ते पुरा। पदको प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मादि सभी देवता पूर्वकालमें स्वं स्वं पदमनुप्राप्ताः केशवस्य प्रसादतः ॥ १६ भगवान् विष्णुकी आराधना करके उनके प्रसादसे अपने- ये ये नृपवरा राजन् मान्धातृप्रमुखा नृपाः । अपने लोकको प्राप्त हुए थे। राजन्! मांधाता आदि जो- ते ते विष्णुं समाराध्य स्वर्गलोकमितो गताः ॥ १७ जो प्रधान नरेश हो गये हैं, वे सभी भगवान् विष्णुकी यस्तु पूजयते नित्यं नरसिंहं सुरेश्वरम् । आराधना करके यहाँसे स्वर्गलोकको चले गये। जो स स्वर्गमोक्षभागी स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ १८ सुरेश्वर नृसिंहका प्रतिदिन पूजन करता है, वह स्वर्ग तस्मादेकमना भूत्वा यावज्जीवं प्रतिज्ञया। और मोक्षका भागी होता है—इसमें अन्यथा विचार अर्चनान्नरसिंहस्य प्राप्स्यसे स्वाभिवाञ्छितम् ॥ १९ करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये तुम भी प्रतिज्ञापूर्वक विधिवत्स्थापयेद्यस्तु कारयित्वा जनार्दनम् । एकचित्त होकर जीवनपर्यन्त भगवान् नृसिंहकी पूजा न तु निर्गमनं तस्य विष्णुलोकाद् भवेन्नृप ॥ २० करते हुए अपना मनोरथ प्राप्त करोगे। नृप! जो भगवान् नरो नृसिंहं तमनन्तविक्रमं जनार्दनकी प्रतिमा बनवाकर विधिवत् उसकी स्थापना सुरासुरैरर्चितपादपङ्कजम् । करता है, उसका विष्णुलोकसे कभी निष्क्रमण नहीं संस्थाप्य भक्त्या विधिवच्च पूजयेत् होता। यदि मनुष्य उन अनन्त विक्रमशाली भगवान् प्रयाति साक्षात् परमेश्वरं हरिम् ॥ २१ नरसिंहकी, जिनके चरण-कमलोंकी देवता तथा असुर, दोनों ही पूजा करते हैं, विधिवत् स्थापना करके भक्तिपूर्वक पूजा करे तो वह साक्षात् परमेश्वर भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है ॥ १२–२१ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें सहस्रानीक-चरित्रके अन्तर्गत बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥ तैंतीसवाँ अध्याय भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल—राजा जयध्वजकी कथा राजोवाच राजा बोले—भगवान्! मैं आपके प्रसादसे भगवान्के हरेरर्चाविधिं पुण्यां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । पूजनकी पावन विधिको विशेषरूपसे यथावत् सुनना त्वत्प्रसादाद्विशेषेण भगवन् प्रब्रवीहि मे ॥ १ चाहता हूँ; कृपया आप मुझे विस्तारसे बतायें। भगवान् सम्मार्जनकरो यश्च नरसिंहस्य मन्दिरे । नृसिंहके मन्दिरमें जो झाडू देता है वह तथा जो उसे यत्पुण्यं लभते तद्वदुपलेपनकृन्नरः ॥ २ लीपता-पोतता है, वह पुरुष किस पुण्यको प्राप्त करता शुद्धोदकेन यत्पुण्यं स्नापिते केशवे भवेत् । है? केशवको शुद्ध जलसे स्नान करानेपर कौन-सा पुण्य In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ३३ ] भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल ११७ क्षीरस्नानेन यत्पुण्यं दध्ना च मधुना तथा। प्राप्त होता है तथा दूध, दही, मधु, घी एवं पञ्चगव्यद्वारा घृतस्नानेन यत्पुण्यं पञ्चगव्येन यद्भवेत् ॥ ३ स्नान करानेसे क्या पुण्य होता है ? भगवान्की प्रतिमाको क्षालिते चोष्णतोयेन प्रतिमायां च भक्तितः। गर्म जलसे भक्तिपूर्वक स्नान करानेपर तथा कर्पूर और कर्पूरागुरुतोयेन मिश्रेण स्नापितेन च ॥ ४ अगुरु मिले हुए जलसे स्नान करानेपर कौन-सा पुण्य अर्घ्यदानेन यत्पुण्यं पाद्याचमनदानके। प्राप्त होता है ? भगवान्को अर्घ्य देनेसे, पाद्य और मन्त्रेण स्नापिते यच्च वस्त्रदानेन यद्भवेत् ॥ ५ आचमन अर्पण करनेसे, मन्त्रोच्चारणपूर्वक नहलानेसे श्रीखण्डकुङ्कुमाभ्यां तु अर्चिते किं फलं भवेत्। और वस्त्र-दान करनेसे क्या पुण्य होता है ? ॥ १—५ ॥ पुष्पैर्अभ्यर्चिते यच्च यत्फलं धूपदीपयोः ॥ ६ चन्दन और केसरद्वारा पूजा करनेपर तथा फूलोंसे नैवेद्यैर्यत्फलं प्रोक्तं प्रदक्षिणकृते तु यत्। पूजा करनेपर क्या फल होता है ? तथा धूप और दीप नमस्कारकृते यच्च फलं यत्स्तोत्रगीतयोः ॥ ७ देनेका क्या फल है ? नैवेद्य निवेदन करनेका और तालवृन्तप्रदानेन चामरस्य च यद्भवेत्। प्रदक्षिणा करनेका क्या फल है ? इसी प्रकार नमस्कार ध्वजप्रदाने यद्विष्णोः शङ्खदानेन यद्भवेत् ॥ ८ करनेसे एवं स्तुति और यशोगान करनेसे कौन-सा फल एतच्चान्यच्च यत्किंचिदज्ञानान्न प्रचोदितम्। प्राप्त होता है ? भगवान् विष्णुके लिये पंखा दान करने, तत्सर्वं कथय ब्रह्मन् भक्तस्य मम केशवे ॥ ९ चँवर प्रदान करने, ध्वजाका दान करने और शङ्ख-दान सूत उवाच करनेसे क्या फल होता है ? ब्रह्मन् ! मैंने जो कुछ पूछा इति सम्प्रेरितो विप्रस्तेन राज्ञा भृगुस्तदा। है, वह तथा अज्ञानवश मैंने जो नहीं पूछा है, वह सब मार्कण्डेयं नियुज्याथ कथने स गतो मुनिः ॥ १० भी मुझसे कहिये; क्योंकि भगवान् केशवके प्रति मेरी सोऽपि तस्मिन् मुदायुक्तो हरिभक्त्या विशेषतः। हार्दिक भक्ति है ॥ ६—९ ॥ राज्ञे प्रवक्तुमारेभे भृगुणा चोदितो मुनिः ॥ ११ सूतजी बोले—राजाके इस प्रकार पूछनेपर वे ब्रह्मर्षि मार्कण्डेय उवाच भृगु मुनि मार्कण्डेयजीको उत्तर देनेके लिये नियुक्त करके राजपुत्र शृणुष्वेदं हरिपूजाविधिं क्रमात्। स्वयं चले गये। भृगुजीकी प्रेरणासे मुनिवर मार्कण्डेयजीने विष्णुभक्तस्य वक्ष्यामि तवाहं पाण्डुवंशज ॥ १२ राजापर उनकी हरिभक्तिसे विशेष प्रसन्न होकर उनके प्रति नरसिंहस्य नित्यं च यः सम्मार्जनमारभेत्। इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ १०-११ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके स मोदते ॥ १३ मार्कण्डेयजी बोले—पाण्डुकुलनन्दन राजकुमार ! गोमयेन मृदा तोयैर्यः करोत्युपलेपनम्। भगवान् विष्णुकी इस पूजा-विधिको क्रमशः सुनो; तुम स चाक्षयफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते ॥ १४ विष्णुके भक्त हो, अतः मैं तुम्हें यह सब बताऊँगा। जो अत्रार्थे यत्पुरावृत्तमितिहासं पुरातनम्। भगवान् नरसिंहके मन्दिरमें नित्य झाडू लगाता है, वह सब यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुक्तिर्भवति सत्तम ॥ १५ पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें आनन्दित होता है। जो पुरा युधिष्ठिरो राजा पञ्चभिर्भ्रातृभिर्युतः। गोबर, मिट्टी तथा जलसे वहाँकी भूमि लीपता है, वह द्रौपद्या सह राजेन्द्र काननं विचचार ह ॥ १६ अक्षय फल प्राप्त करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। सत्तम ! इस विषयमें एक प्राचीन सत्य इतिहास है, जिसे सुनकर सब पापोंसे मुक्ति मिल जाती है ॥ १२-१५ ॥ राजेन्द्र ! पूर्वकालमें राजा युधिष्ठिर द्रौपदी तथा अपने पाँच भाइयोंके साथ वनमें विचरते थे। घूमते- In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
१९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३ शूलकण्टकनिष्क्रान्तास्ततस्ते पञ्च पाण्डवाः। नारदोऽपि गतो नाकं जुष्टेदं तीर्थमुत्तमम्॥ १७ ततो युधिष्ठिरो राजा प्रस्थितस्तीर्थमुत्तमम्। दर्शनं मुनिमुख्यस्य तीर्थधर्मोपदेशिनः॥ १८ चिन्तयति च धर्मात्मा क्रोधपैशुन्यवर्जितः। दानवो बहुरोमा च तथा स्थूलशिरा नृप॥ १९ पाण्डवान् गच्छतो वीक्ष्य दानवो द्रौपदीच्छया। कृत्वा भूप मुने रूपं बहुरोमाऽऽगतस्तदा॥ २० प्रणिधानं विधायाथ आसीनः कुशविष्टरे। बिभ्रत् कमण्डलुं पार्श्वे दर्भसूचीं तथा करे॥ २१ अक्षमालां जपन्मन्त्रं स्वनासाग्रं निरीक्षयन्। स दृष्टः पाण्डवैस्तत्र रेवायां वनचारिभिः॥ २२ ततो युधिष्ठिरो राजा तं प्रणम्य सहानुजः। जगाद वचनं दृष्ट्वा भाग्येनासि महामुने॥ २३ तीर्थानि रुद्रदेहायाः सुगोप्यानि निवेदय। मुनीनां दर्शनं नाथ श्रुतं धर्मोपदेशकम्॥ २४ यावन्मुनिमुवाचेदं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः। तावत्स्थूलशिराः प्राप्तो मुनिरूपधरोऽपरः॥ २५ जल्पन्नित्यातुंर वाक्यं को नामास्त्यत्र रक्षकः। भयातुरं नरो जीवं यो रक्षेच्छरणागतम्॥ २६ तस्यानन्तफलं स्याद्वै किं पुनर्मां द्विजोत्तमम्। एकतो मेदिनीदानं मेरुभूधरदक्षिणम्॥ २७ अन्यतो ह्यार्तजीवानां प्राणसंशयवारणम्। द्विजं धेनुं स्त्रियं बालं पीड्यमानं च दुर्जनैः॥ २८ उपेक्षेत नरो यस्तु स च गच्छति रौरवम्। अथ मां हतसर्वस्वं प्राणत्यागपरायणम्॥ २९ को रक्षति नरो वीरः पराभूतं हि दानवैः। गृहीत्वा चाक्षमालां मे तथा शुभकमण्डलुम्॥ ३० निहतोऽहं कराघातैस्तथा खाटो मनोहरम्। गृहीतं मम सर्वस्वं दानवेन दुरात्मना॥ ३१ घूमते वे पाँचों पाण्डव शूल और कण्टकमय मार्गको पार करके एक उत्तम तीर्थकी ओर प्रस्थित हुए। उसके पहले भगवान् नारदजी भी उस उत्तम तीर्थका सेवन करके स्वर्गलोकको लौट गये थे। क्रोध और पिशुनतासे रहित धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर उस उत्तम तीर्थकी ओर प्रस्थान करके तीर्थधर्मका उपदेश करनेवाले किसी मुनिवरके दर्शनकी बात सोच रहे थे, इसी बीचमें बहुरोमा तथा स्थूलशिरा नामक दानव वहाँ आये। भूपाल! पाण्डवोंको जाते देख द्रौपदीका अपहरण करनेकी इच्छासे बहुरोमा नामक दानव मुनिका रूप धारण करके वहाँ आया। वह कुशके आसनपर बैठकर ध्यानमग्न हो गया। उसके पार्श्वमें कमण्डलु था और हाथमें उसने कुशकी पवित्री पहन रखी थी। वह नासिकाके अग्रभागका अवलोकन करता हुआ रुद्राक्षकी मालासे मन्त्र-जप कर रहा था। नर्मदा-तटवर्ती वनमें भ्रमण करते हुए पाण्डवोंने वहाँ उसे देखा॥ १६–२२॥ तदनन्तर उसे देखकर राजा युधिष्ठिरने भाइयोंसहित प्रणाम करके उससे यह बात कही—महामुने! भाग्यसे आप यहाँ विद्यमान हैं। इस रुद्रदेहा (रेवा)-के समीपवर्ती परम गोपनीय तीर्थोंको हमें बताइये। नाथ! हमने सुना है कि मुनियोंका दर्शन धर्मका उपदेश करनेवाला होता है॥ २३–२४॥ धर्मपुत्र युधिष्ठिर जबतक उस मायावी मुनिसे बात कर ही रहे थे, तबतक ही स्थूलशिरा नामक दूसरा दानव मुनिरूप धारण किये वहाँ आ पहुँचा। वह बड़े ही आतुरभावसे इस प्रकार पुकार रहा था—अहो! यहाँ कौन हमारी रक्षा करनेवाला है? जो मनुष्य शरणमें आये हुए किसी भी भयपीड़ितकी रक्षा करता है, वह अनन्त पुण्यफलका भागी होता है; फिर जो मुझ उत्तम ब्राह्मणकी रक्षा करेगा, उसके पुण्यफलका तो कहना ही क्या है। एक ओर मेरु पर्वतकी दक्षिणापूर्वक सम्पूर्ण पृथिवीका दान और दूसरी ओर पीड़ित प्राणियोंके प्राण-संकटका निवारण—दोनों बराबर हैं। जो पुरुष दुष्टोंद्वारा सताये जाते हुए ब्राह्मण, गौ, स्त्री और बालकोंकी उपेक्षा करता है, वह रौरव नरकमें पड़ता है। मेरा सर्वस्व लूट लिया गया है। मैं दानवोंसे अपमानित होकर प्राण त्याग देनेको उद्यत हूँ। इस समय कौन ऐसा वीर पुरुष है, जो मेरी रक्षा कर सके? दुष्ट दानवने मेरी स्फटिककी माला, सुन्दर कमण्डलु और मनोहर खाट छीनकर मुझे थप्पड़से मारा है और सर्वस्व लूट लिया है॥ २५–३१॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय ३३ ] भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल ११९ इत्याकर्ण्य वचः क्लीबं पाण्डवा जातसम्भ्रमाः । | इस प्रकारके कातर वचन सुनकर पाण्डव हड़बड़ा यान्ति रोमाञ्चिता भूयो विधायौग्निं च तं मुनिम् ॥ ३२ | गये। वे रोमाञ्चित हो, आग जलाकर उस मुनिके पीछे चले। द्रौपदीको उन लोगोंने पहलेवाले महात्मा मुनिके विमुच्य द्रौपदीं तत्र मुनेः पार्श्वे महात्मनः । | पास ही छोड़ दिया और स्वयं रोषसे भरकर वहाँसे ततो दूरतरं प्राप्ताः संरम्भात्ते च पाण्डवाः ॥ ३३ | बहुत दूर निकल गये॥ ३२-३३॥ तदनन्तर युधिष्ठिरने कहा—हमें तो यहाँ कुछ भी ततो युधिष्ठिरोऽवोचत् किं च नो नात्र दृश्यते । | दिखायी नहीं देता। अर्जुन ! तुम द्रौपदीकी रक्षाके लिये कृष्णासंरक्षणार्थाय व्रज व्यावृत्य चार्जुन ॥ ३४ | यहाँसे लौट जाओ। तब भाईके वचनसे प्रेरित होकर अर्जुन वहाँसे चल दिये। राजन् ! फिर राजा युधिष्ठिरने ततोऽर्जुनो विनिष्क्रान्तो बन्धुवाक्यप्रणोदितः । | उस गहन वनके भीतर सूर्यमण्डलकी ओर देखकर यह ततो युधिष्ठिरो राजा सत्यां वाचमकल्पयत् ॥ ३५ | सत्य वचन कहा—मेरी सत्यवादिता, पुण्यकर्म तथा धर्मपूर्वक भाषण करनेसे संतुष्ट होकर देवगण संशयमें निरीक्ष्य मण्डलं भानोस्तदा सुगहने वने । | पड़े हुए मुझको सत्य बात बतला दें॥ ३४-३६१/२॥ मम सत्याच्च सुकृताद् धर्मसम्भाषणात् प्रभो ॥ ३६ राजन् ! युधिष्ठिरके यों कहनेपर आकाशमें इस तथ्यं शंसन्तु त्रिदशा मम संशयभाजिनः । | प्रकारका शब्द हुआ, यद्यपि वहाँ बोलनेवाला कोई ततोऽम्बरेऽभवद्वाणी तदा भूपाशरीरिणी ॥ ३७ | व्यक्ति नहीं था—महाराज ! यह (जो आपके पास खड़ा है, वह मुनि नहीं) दानव है। स्थूलशिरा नामक मुनि दानवोऽयं महाराज मुनिः स्थूलशिराः स्थितः । | तो सुखपूर्वक हैं, उनपर किसीके द्वारा कोई उपद्रव नहीं नासावुपद्रुतः केन मायैषास्य दुरात्मनः ॥ ३८ | है। यह तो इस दुष्टकी माया है॥ ३७-३८॥ ततो भीमः कराघातैर्नश्यमानं हि दानवम् । | तब भीमने अत्यन्त क्रोधसे युक्त हो उस भागते हुए संरम्भात्कुपितोऽत्यर्थं मौलिदेशे जघान तम् ॥ ३९ | दानवके मस्तकपर बड़े वेगसे मुष्टिप्रहार किया। फिर तो दानवने भी अपना रौद्ररूप धारण किया और भीमको सोऽपि रूपं निजं प्राप्य रौद्रं भीममताडयत् । | मुक्का मारा। इस प्रकार भीम और दानवमें वहाँ दारुण तत्र युद्धं प्रवृत्तं दारुणं भीमदैत्ययोः ॥ ४० | संग्राम छिड़ गया। भीमने उस वनमें बड़े कष्टसे उसके स्थूल मस्तकका छेदन किया॥ ३९-४०१/२॥ कष्टाद्बभञ्ज भीमोऽपि तस्य स्थूलं शिरो वने । | इधर अर्जुन भी जब मुनिके आश्रमपर पहुँचे, तब अर्जुनोऽपि समायातो नैव पश्यति तं मुनिम् ॥ ४१ | वहाँ उन्हें न तो वह मुनि दिखायी दिया और न प्राणप्रिया साध्वी भार्या द्रौपदी ही दीख पड़ी। तब तथा च द्रौपदीं भूयः साध्वीं कान्तां च वल्लभाम् । | अर्जुनने वृक्षपर चढ़कर ज्यों ही इधर-उधर दृष्टि ततो वृक्षं समारुह्य यावत्पश्यति चार्जुनः ॥ ४२ | डाली, त्यों ही देखा कि एक दानव द्रौपदीको अपने कंधेपर बिठाकर बड़ी शीघ्रतासे भागा जा रहा है और तावद्विधाय तां स्कन्धे शीघ्रं धावति दानवः । | उस दुष्टके द्वारा हरी गयी द्रौपदी कुररीकी भाँति संहृता याति दुष्टेन रुदती कुररी यथा ॥ ४३ | ‘हा धर्मपुत्र! हा भीम!’ इत्यादि रटती हुई विलाप कर रही है। द्रौपदीको उस अवस्थामें देखकर वीर कुर्वती भीमभीमेति धर्मपुत्रेति वादिनी । | अर्जुन अपनी आवाजसे दिशाओंको गुँजाते हुए चले। तां दृष्ट्वा स ययौ वीरः शब्दैः संनादयन् दिशः ॥ ४४ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
१२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
पादन्यासोुरुवेगेन प्रभग्नाः पादपा भृशम्। ततो दैत्योऽपि तां तन्वीं विहायाशु पलायितः ॥ ४५ तथापि चार्जुनो तस्य कोपान्मुञ्चति नासुरम्। पतितो मेदिनीपृष्ठे तावदेव चतुर्भुजः ॥ ४६ पीते च वाससी बिभ्रत् शङ्खचक्रायुधानि च। ततः स विस्मयाक्रान्तो नत्वा पार्थो वचोऽवदत् ॥ ४७
अर्जुन उवाच कथं कृतेषा भगवंस्त्वया मायात्र वैष्णवी। मयाप्यपकृतं नाथ तत् क्षमस्व नमोऽस्तु ते ॥ ४८ नूनमज्ञानभावेन कर्मैतद्दारुणं मया। तत्क्षन्तव्यं जगन्नाथ चैतन्यं मानवे कुतः ॥ ४९
चतुर्भुज उवाच नाहं कृष्णो महाबाहो बहुरोमास्मि दानवः। उपयातो हरेर्देहं पूर्वकर्मप्रभावतः ॥ ५०
अर्जुन उवाच बहुरोमन् पूर्वजातिं कर्म मे शंस तत्त्वतः। केन कर्मविपाकेन विष्णोः सारूप्यमाप्तवान् ॥ ५१
चतुर्भुज उवाच शृण्वर्जुन महाभाग सहितो भ्रातृभिर्मम। चरितं चित्रमत्यर्थं शृण्वतां मुदवर्धनम् ॥ ५२ अहमासं पुरा राजा सोमवंशसमुद्भवः। जयध्वज इति ख्यातो नारायणपरायणः ॥ ५३ विष्णोर्देवालये नित्यं सम्मार्जनपरायणः। उपलेपरतश्चैव दीपदाने समुद्यतः ॥ ५४ वीतिहोत्र इति ख्यात आसीत् साधुपुरोहितः। मम तच्चरितं दृष्ट्वा विप्रो विस्मयमागतः ॥ ५५
मार्कण्डेय उवाच कदाचिदुपविष्टं तं राजानं विष्णुतत्परम्। अपृच्छद्वीतिहोत्रस्तं वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ५६ राजन् परमधर्मज्ञ हरिभक्तिपरायण। विष्णुभक्तिमतां पुंसां श्रेष्ठोऽसि पुरुषर्षभ ॥ ५७ सम्मार्जनपरो नित्यं उपलेपरतस्तथा। तन्मे वद महाभाग त्वया किं विदितं फलम् ॥ ५८
हिन्दी अनुवाद
उस समय उनके बड़े वेगसे पैर रखनेके कारण अनेकानेक वृक्ष गिर गये। तब वह दैत्य भी उस तन्वङ्गीको छोड़कर अकेला ही वेगसे भागा; तथापि अर्जुनने क्रोधके कारण उस असुरका पीछा न छोड़ा। भागते-भागते वह दानव एक जगह पृथ्वीपर गिर पड़ा और गिरते ही चार भुजाओंसे युक्त हो, शङ्ख तथा चक्र आदि धारण किये पीताम्बरधारी विष्णुके रूपमें दीख पड़ा। तब कुन्तीनन्दन अर्जुन बड़े ही विस्मित हुए और प्रणाम करके बोले ॥ ४१-४७॥
अर्जुनने कहा— भगवन्! आपने यहाँ वैष्णवी माया क्यों फैला रखी थी? मैंने भी जो आपका अपकार किया है, उसके लिये हे नाथ! मेरे अपराधको क्षमा करें; आपको नमस्कार है। हे जगन्नाथ! अज्ञानके कारण ही मैंने यह दारुण कर्म किया है; इसलिये इसे क्षमा कर दें। भला, एक साधारण मनुष्यमें इतनी समझ कहाँ हो सकती है, जिससे आपको अन्य वेषमें भी पहचान ले ॥ ४८-४९॥
चतुर्भुज बोला— महाबाहो! मैं विष्णु नहीं, बहुरोमा नामक दानव हूँ। मैंने अपने पूर्वकर्मके प्रभावसे भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त किया है ॥ ५० ॥
अर्जुन बोले— बहुरोमन्! तुम अपने पूर्वजन्म और कर्मका ठीक-ठीक वर्णन करो। तुमने किस कर्मके परिणामसे विष्णुका सारूप्य प्राप्त किया है? ॥ ५१ ॥
चतुर्भुज बोला— महाभाग अर्जुन! आप अपने भाइयोंके साथ मेरे अत्यन्त विचित्र चरित्रको सुनिये; यह श्रोताओंके आनन्दको बढ़ानेवाला है। मैं पूर्वजन्ममें चन्द्रवंशमें उत्पन्न जयध्वज नामसे विख्यात राजा था। उस समय सदा ही मैं भगवान् नारायणके भजनमें लगा रहता और उनके मन्दिरमें झाडू लगाया करता था। प्रतिदिन उस मन्दिरको लीपता और [रात्रिमें] वहाँ दीप जलाया करता था। उन दिनों वीतिहोत्र नामक एक साधु ब्राह्मण मेरे यहाँ पुरोहित थे। प्रभो! वे मेरे इस कार्यको देखकर बहुत विस्मित हुए ॥ ५२-५५॥
मार्कण्डेयजी बोले— एक दिन वेद-वेदाङ्गोंके पूर्ण विद्वान् पुरोहित वीतिहोत्रजीने बैठे हुए उन विष्णुभक्त राजासे इस प्रकार प्रश्न किया— परम धर्मज्ञ भूपाल! हरिभक्तिपरायण नरश्रेष्ठ! आप विष्णुभक्त पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं; क्योंकि आप भगवान्के मन्दिरमें प्रतिदिन झाडू तथा लेप दिया करते हैं। अतः महाभाग! आप मुझे बताइये कि भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और वहाँ लीपने-पोतनेका कौन-सा उत्तम फल आप जानते हैं।
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अध्याय ३३ ] भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल १२१ कर्माण्यान्यानि सन्त्येव विष्णोः प्रियतराणि वै। | यद्यपि भगवान्को अत्यन्त प्रिय लगनेवाले अन्य कर्म भी तथापि त्वं महाभाग एतयोः सततोद्यतः ॥ ५९ | हैं ही, तथापि महाभाग ! आप इन्हीं दो कर्मोंमें सदा सर्वथा | लगे रहते हैं। नरेश! यदि आपको इनसे होनेवाला महान् सर्वात्मना महापुण्यं जनेश विदितं तव। | पुण्यरूप फल ज्ञात हो और वह छिपानेयोग्य न हो तथा यदि तद्ब्रूहि यद्यगुह्यं च प्रीतिर्मयि तवास्ति चेत् ॥ ६० | आपका मुझपर प्रेम हो तो अवश्य ही उस फलको मुझे | बताइये ॥ ५६—६०॥ जयध्वज उवाच | जयध्वज बोले- विप्रवर ! इस विषयमें आप मेरा | ही पूर्वजन्मका चरित्र सुनें। मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका शृणुष्व विप्रशार्दूल ममैव चरितं पुरा ॥ ६१ | स्मरण है, इसीसे मैं सब जानता हूँ। मेरा चरित्र श्रोताओंको | आश्चर्यमें डालनेवाला है। विप्रेन्द्र ! पूर्वजन्ममें मैं रैवत जातिस्मरत्वाज्जानामि श्रोतृणां विस्मयावहम्। | नामका ब्राह्मण था। जिनको यज्ञ करनेका अधिकार नहीं पूर्वजन्मनि विप्रेन्द्र रैवतो नाम वाडवः ॥ ६२ | है, उनसे भी मैं सदा ही यज्ञ कराता था और अनेकों | गाँवोंका पुरोहित था। इतना ही नहीं, मैं दूसरोंकी चुगली अयाज्ययाजकोऽहं वै सदैव ग्रामयाजकः। | खानेवाला, निर्दय और नहीं बेचने योग्य वस्तुओंका पिशुनो निष्ठुरश्चैव अपण्यानां च विक्रयी ॥ ६३ | विक्रय करनेवाला था। निषिद्ध कर्मोंका आचरण करनेके | कारण मेरे बान्धवोंने मुझे त्याग दिया था। मैं महान् पापी निषिद्धकर्माचरणात् परित्यक्तः स्वबन्धुभिः। | और सदा ही ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाला था। परायी स्त्री महापापरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषरतस्तथा ॥ ६४ | और पराये धनका लोभी था, प्राणियोंकी हिंसा किया | करता था। सदा ही मद्य पीता और ब्राह्मणोंसे द्वेष रखता परदारपरद्रव्यलोलुपो जन्तुहिंसकः। | था। इस प्रकार मैं प्रतिदिन पापमें लगा रहता और बहुधा मद्यपानरतो नित्यं ब्रह्मद्वेषरतस्तथा ॥ ६५ | लूटपाट भी करता था ॥ ६१-६५ १/२ ॥ | एक दिन रातमें स्वेच्छाचारिताके कारण मैं कुछ एवं पापरतो नित्यं बहुशो मार्गरोधकृत्। | ब्राह्मण-पत्नियोंको पकड़कर एक सूने ठाकुर-मन्दिरमें कदाचित् कामचारोऽहं गृहीत्वा ब्राह्मणस्त्रियः ॥ ६६ | ले गया। उस मन्दिरमें कभी पूजा नहीं होती थी। [यों | ही खण्डहर-सा पड़ा रहता था।] वहाँ स्त्रियोंके साथ शून्यं पूजादिभिर्विष्णोर्मन्दिरं प्रामवान्निशि। | रमण करनेकी इच्छासे मैंने अपने वस्त्रके किनारेसे उस स्ववस्त्रप्रान्ततो ब्रह्मन् कियदंशः स मार्जितः ॥ ६७ | मन्दिरका कुछ भाग बुहारकर साफ किया और हे | द्विजोत्तम! [प्रकाशके लिये] दीप जलाकर रख दिया। प्रदीपः स्थापितस्तत्र सुरतार्थाय द्विजोत्तम। | [यद्यपि मैंने अपनी पाप-वासना पूर्ण करनेके लिये ही तेनापि मम दुष्कर्म निःशेषं क्षयमागतम् ॥ ६८ | मन्दिरमें झाडू लगायी और दीप जलाया था, तथापि] | उससे भी मेरा सारा पापकर्म नष्ट हो गया। ब्राह्मण ! इस एवं स्थितं विष्णुगृहे मया भोगेच्छया द्विज। | प्रकार जब मैं उस विष्णुमन्दिरमें भोगकी इच्छासे ठहरा तदैव दीपकं दृष्ट्वा आगताः पुरपालकाः ॥ ६९ | हुआ था, उसी समय वहाँ दीपक देखकर नगरके रक्षक | आ पहुँचे और यह कहकर कि 'यह किसी शत्रु का दूत चौर्यार्थं परदूतोऽयमित्युक्त्वा मामपातयन्। | है, यहाँ चोरी करने आया है,' उन्होंने मुझे पृथ्वीपर गिरा खड्गेन तीक्ष्णधारेण शिरश्छित्त्वा च ते गताः ॥ ७० | दिया तथा तीखी धारवाली तलवारसे मेरा मस्तक काटकर | वे चले गये। तब मैं भगवान्के पार्षदोंसे युक्त दिव्य दिव्यं विमानमारुह्य प्रभुदाससमन्वितम्। | विमानपर आरूढ़ हो, गन्धर्वोंद्वारा अपना यशोगान सुनता गन्धर्वैर्गीयमानोऽहं स्वर्गलोकं तदा गतः ॥ ७१ | हुआ स्वर्गलोकको चला गया ॥ ६६-७१ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
१२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३ चतुर्भुज उवाच चतुर्भुज बोला—इस प्रकार मैंने दिव्यरूप धारणकर, तत्र स्थित्वा ब्रह्मकल्पं शतं साग्रं द्विजोत्तमाः। दिव्य भोगोंसे सम्पन्न होकर स्वर्गलोकमें सौ कल्पोंसे भी दिव्यभोगसमायुक्तो दिव्यरूपसमन्वितः॥ ७२ अधिक कालतक निवास किया। फिर उसी पुण्यके जातोऽहं पुण्ययोगाद्धि सोमवंशसमुद्भवः। भोगसे चन्द्रवंशमें उत्पन्न जयध्वज नामसे विख्यात जयध्वज इति ख्यातो राजा राजीवलोचनः॥ ७३ कमलके समान नेत्रोंवाला राजा हुआ। उस जन्ममें भी तत्रापि कालवशतो मृतः स्वर्गमवाप्तवान्। कालवश मृत्युको प्राप्त होनेपर मैं स्वर्गलोकमें आया। इन्द्रलोकमनुप्राप्य रुद्रलोकं ततो गतः॥ ७४ फिर यहाँसे रुद्रलोकको प्राप्त हुआ। एक बार रुद्रलोकसे रुद्रलोकाद्ब्रह्मलोकं गच्छता नारदो मुनिः। ब्रह्मलोकको जाते समय मैंने नारदमुनिको देखा, परंतु दृष्टश्च नमितो नैव गर्वान्मे हसितश्च सः॥ ७५ देखनेपर भी उन्हें प्रणाम नहीं किया और उनकी हँसी कुपितः शप्तवान् मां स राक्षसो भव भूपते। उड़ाने लगा। इससे कुपित होकर उन्होंने शाप दिया— इति शापं समाकर्ण्य दत्तं तेन द्विजन्मना॥ ७६ 'राजन्! तू राक्षस हो जा।' उन ब्राह्मणके दिये हुए इस प्रसादितो मया भूप प्रसादं कृतवान् मुनिः। शापको सुनकर मैंने क्षमा माँगकर (किसी तरह) उन्हें यदा रेवामठे राजन् धर्मपुत्रस्य धीमतः॥ ७७ प्रसन्न किया। तब मुनिने मुझपर शापानुग्रहके रूपमें कृपा भार्यापहारं नयतः शापमोक्षो भविष्यति। की। [उन्होंने कहा—] राजन्! जिस समय बुद्धिमान् सोऽहमर्जुन भूपाल धर्मपुत्र युधिष्ठिर॥ ७८ धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी भार्याका हरण करके तुम रेवा- विष्णोः सारूप्यमगमं यामि वैकुण्ठमद्य वै। तटवर्ती मठमें चले जाओगे, उस समय तुम्हें शापसे मुक्ति मिल जायगी।' भूपाल! धर्मपुत्र युधिष्ठिर! अर्जुन! मैं वही राजा जयध्वज हूँ। इस समय भगवान् विष्णुके मार्कण्डेय उवाच सारूप्यको प्राप्त हुआ हूँ। अब मैं निश्चय ही वैकुण्ठधामको जाऊँगा॥ ७२-७८१/२ ॥ इत्युक्त्वा गरुडारूढो धर्मपुत्रस्य पश्यतः॥ ७९ मार्कण्डेयजी बोले—यह कहकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरके गतवान् विष्णुभवनं यत्र विष्णुः श्रिया सह। देखते-ही-देखते वे राजा जयध्वज गरुडपर आरूढ हो सम्मार्जनोपलेपाभ्यां महिमा तेन वर्णितः॥ ८० विष्णुधामको चले गये, जहाँ लक्ष्मीजीके साथ भगवान् अवशेनापि यत्कर्म कृत्वेमां श्रियमागतः। विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। इसीसे विष्णुमन्दिरके भक्तिमद्भिः प्रशान्तैश्च किं पुनः सम्यगर्चनातू॥ ८१ बुहारने और लीपनेसे बड़ी महत्ता प्राप्त होनेका वर्णन किया गया है। [राजा जयध्वजने पूर्वजन्ममें] कामके सूत उवाच वशीभूत होकर भी जिस कर्मको करनेसे ऐसी दिव्य सम्पत्ति मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा पाण्डुवंशसमुद्भवः। प्राप्त कर ली, उसीको यदि भक्तिमान् और शान्त पुरुष सहस्रानीकभूपालो हरिपूजारतोऽभवत्॥ ८२ करे तथा भलीभाँति भगवान्का पूजन करे तो उनको प्राप्त तस्माच्छृणुत विप्रेन्द्रा देवो नारायणोऽव्ययः। होनेवाले फलके विषयमें क्या कहना है?॥ ७९-८१॥ ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि पूजकानां विमुक्तिदः॥ ८३ सूतजी बोले—मार्कण्डेयजीके उपर्युक्त वचन सुनकर अर्चयध्वं जगन्नाथं भूयो भूयो वदाम्यहम्। पाण्डुवंशमें उत्पन्न राजा सहस्रानीक भगवान्के पूजनमें तर्तुं यदीच्छथ द्विजा दुस्तरं भवसागरम्॥ ८४ संलग्न हो गये। इसलिये विप्रवृन्द! आपलोग यह सुन येऽर्चयन्ति हरिं भक्ताः प्रणतार्तिहरं हरिम्। लें कि अविनाशी भगवान् नारायण जानकर अथवा अनजानमें ते वन्द्यास्ते प्रपूज्याश्च नमस्याश्च विशेषतः॥ ८५ भी पूजा करनेवाले अपने भक्तोंको मुक्ति प्रदान करते हैं। द्विजो! मैं यह बारंबार कहता हूँ कि यदि आपलोग दुस्तर भवसागरके पार जाना चाहते हैं तो भगवान् जगन्नाथकी पूजा करें। जो भक्त प्रणतजनोंका कष्ट दूर करनेवाले भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं, वे वन्दनीय, पूजनीय और विशेषरूपसे नमस्कार करनेयोग्य हैं॥ ८२-८५॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते मार्कण्डेयेनोपदिष्टसम्मार्जनोपफल नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके प्रसङ्गमें मार्कण्डेयमुनिद्वारा उपदिष्ट 'मन्दिरमें झाडू देने और उसके लीपनेकी महिमाका वर्णन' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३॥
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चौंतीसवाँ अध्याय
अध्याय ३४ ] भगवान् विष्णुके पूजनका फल १२३ चौंतीसवाँ अध्याय भगवान् विष्णुके पूजनका फल श्रीसहस्रानीक उवाच श्रीसहस्रानीकने पूछा—महामते द्विजवर पुनरेव द्विजश्रेष्ठ मार्कण्डेय महामते। मार्कण्डेयजी! अब पुनः यह बताइये कि भगवान् निर्माल्यापनयाद्विष्णोर्यत्पुण्यं तद्वदस्व मे॥ १ विष्णुके निर्माल्य (चन्दन-पुष्प आदि)-को हटानेसे कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है॥ १ ॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! नृसिंहस्वरूप भगवान् निर्माल्यमपनीयाथ तोयेन स्नाप्य केशवम्। केशवको निर्माल्य हटाकर जलसे स्नान करानेसे मनुष्य नरसिंहाकृतिं राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २ सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण तीर्थोंके सर्वतीर्थफलं प्राप्य यानारूढो दिवं व्रजेत्। सेवनका फल प्राप्तकर, विमानपर आरूढ हो स्वर्गको श्रीविष्णोः सदनं प्राप्य मोदते कालमक्षयम्॥ ३ चला जाता है और वहाँसे श्रीविष्णुधामको प्राप्त होकर आगच्छ नरसिंहेति आवाह्याक्षतपुष्पकैः। अक्षयकालपर्यन्त आनन्दका उपभोग करता है। ‘भगवान् एतावतापि राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ४ नरसिंह! आप यहाँ पधारें’—इस प्रकार अक्षत और दत्त्वाऽऽसनमथार्घ्यं च पाद्यमाचमनीयकम्। पुष्पोंके द्वारा यदि भगवान्का आवाहन करे तो राजेन्द्र! देवदेवस्य विधिना सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ५ इतनेसे भी वह मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। स्नाप्य तोयेन पयसा नरसिंहं नराधिप। देवदेव नृसिंहको विधिपूर्वक आसन, पाद्य (पैर धोनेके सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ६ लिये जल), अर्घ्य (हाथ धोनेके लिये जल) और स्नाप्य दध्ना सकृद्यस्तु निर्मलः प्रियदर्शनः। आचमनीय (कुल्ला करनेके लिये जल) अर्पण करनेसे विष्णुलोकमवाप्नोति पूज्यमानः सुरोत्तमैः॥ ७ भी सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। नराधिप! यः करोति हरेरर्चां मधुना स्नापयन्नरः। भगवान् नृसिंहको दूध और जलसे स्नान कराकर मनुष्य अग्निलोके स मोदित्वा पुनर्विष्णुपुरे वसेत्॥ ८ सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो घृतेन स्त्रपनं यस्तु स्नानकाले विशेषतः। एक बार भी भगवान्को दहीसे स्नान कराता है, वह नरसिंहाकृतेः कुर्याच्छङ्खभेरीनिनादितम्॥ ९ निर्मल एवं सुन्दर शरीर धारणकर सुरवरोंसे पूजित होता पापकञ्चुकमुन्मुच्य यथा जीर्णामहिस्त्वचम्। हुआ विष्णुलोकको जाता है। जो मनुष्य मधुसे भगवान्को दिव्यं विमानमास्थाय विष्णुलोके महीयते॥ १० नहलाता हुआ उनकी पूजा करता है,वह अग्निलोकमें पञ्चगव्येन देवेशं यः स्नापयति भक्तितः। आनन्दोपभोग करके पुनः विष्णुपुर (वैकुण्ठधाम)-में मन्त्रपूर्वं महाराज तस्य पुण्यमनन्तकम्॥ ११ निवास करता है। जो स्नानकालमें श्रीनरसिंहके विग्रहको यश्च गोधूमकैश्चूर्णैरूद्वर्त्योष्णेन वारिणा। शङ्ख और नगारेका शब्द कराते हुए विशेषरूपसे घीसे प्रक्षाल्य देवदेवेशं वारुणं लोकमाप्नुयात्॥ १२ स्नान कराता है, वह पुरुष पुरानी केंचुलको छोड़नेवाले साँपकी भाँति पाप-कञ्चुकको त्यागकर दिव्य विमानपर आरूढ हो, विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ २-१०॥ महाराज! जो देवेश्वर भगवान्को भक्तिपूर्वक मन्त्रपाठ करते हुए पञ्चगव्यसे स्नान कराता है, उसका पुण्य अक्षय होता है। जो गेहूँके आटेसे देवदेवेश्वर भगवान्को उबटन लगाकर गरम जलसे उन्हें In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth