संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें११० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
मूल संस्कृत श्लोक
स राजसूनुं तपसि स्थितं तं ध्रुवं ध्रुवस्निग्धदृगित्युवाच। दन्तांशुसङ्गैरमितप्रवाहैः प्रक्षालयन् रेणुमिवास्य गात्रे ॥ ७८
वरं वरं वत्स वृणीष्व यस्ते मनोगतस्त्वत्तपसास्मि तुष्टः। ध्यानेन ते चेन्द्रियनिग्रहेण मनोनिरोधेन च दुष्करेण ॥ ७९
शृण्वन् वचस्तत्सकलं गभीर- मुन्मीलिताक्षः सहसा ददर्श। स्वे चिन्त्यमानं त्विदमेव मूर्तं पुरःस्थितं ब्रह्म चतुर्भुजं सः ॥ ८०
दृष्ट्वा क्षणं राजसुतः सुपूज्यं पुरस्त्रयीशं किमिह ब्रवीमि। किं वा करोमीति ससम्भ्रमः स तु न चाब्रवीत् किंचन नो चकार ॥ ८१
हर्षाश्रुपूर्णः पुलकाञ्चिताङ्ग- स्त्रिलोकनाथेति वदन्नथोच्चैः। दण्डप्रणामाय पपात भूमौ प्रवेपमानभ्रु हरेः पुरः स हि ॥ ८२
दण्डवत् प्रणिपत्याथ परितः परिलुण्ठ्य च। रुरोद हर्षेण चिरं दृष्ट्वा तं जगतो गुरुम् ॥ ८३
नारदेन सनन्देन सनकेन च संश्रुतम्। अन्यैः सनत्कुमाराद्यैर्योगिभिर्योगिनां वरम् ॥ ८४
कारुण्यबाष्पनीरार्द्रं पुण्डरीकविलोचनम्। ध्रुवमुत्थापयांचक्रे चक्री धृत्वा करेण तम् ॥ ८५
हरिस्तु परिपस्पर्श तदङ्गं धूलिधूसरम्। कराभ्यां कोमलाभ्यां स परिष्वज्याह तं हरिः ॥ ८६
वरं वरय भो बाल यत्ते मनसि वर्तते। तद्ददामि न संदेहो नादेयं विद्यते तव ॥ ८७
हिन्दी अनुवाद
रहा हो। निश्चल और स्नेहपूर्ण दृष्टिवाले वे भगवान् अपने दाँतोंकी किरणरूप जलके अमित प्रवाहद्वारा तपस्यामें लगे हुए राजकुमार ध्रुवके शरीरकी धूलिको धोते हुए-से उससे इस प्रकार बोले ॥ ७६–७८॥
'वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या, ध्यान, इन्द्रिय-निग्रह और दुस्साध्य मनःसंयमसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह उत्तम वर मुझसे माँग लो' ॥ ७९ ॥
भगवान्की वह सम्पूर्ण गम्भीर वाणी सुनते ही ध्रुवने सहसा आँखें खोल दीं। उस समय उन्हीं चतुर्भुज ब्रह्मको, जिनका वह अपने हृदयमें चिन्तन कर रहा था, उसने सामने मूर्तिमान् होकर खड़ा देखा ॥ ८० ॥
उन परम पूजनीय त्रिभुवनपतिको सहसा सामने देख वह राजकुमार सकपका गया और 'मैं यहाँ इनसे क्या कहूँ? क्या करूँ?' इत्यादि बातें सोचता हुआ क्षणभर न तो कुछ बोला और न कुछ कर ही सका। उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भरे थे, शरीरके रोएँ खड़े हो गये थे। वह भगवान्के सामने उच्चस्वरसे 'हे त्रिभुवननाथ!' यों कहता हुआ दण्डवत्-प्रणाम करनेके लिये पृथ्वीपर पड़ गया। उस समय उसकी भौंहें काँप रही थीं। दण्डकी भाँति प्रणाम करके जगद्गुरु भगवान्की ओर एकटक दृष्टि लगाये वह आनन्दातिरेकसे चारों ओर लोट-पोट होकर देरतक रोता रहा। नारद, सनन्दन, सनक और सनत्कुमार आदि तथा अन्य योगी जिन योगीश्वरका श्रवण-कीर्तन एवं स्तवन किया करते हैं और जिनके नेत्र करुणाके आँसुओंसे भीगे हुए थे, उन्हीं कमललोचन भगवान्को आज ध्रुवने प्रत्यक्ष देखा। उस समय चक्रधर भगवान्ने अपने हाथसे पकड़कर ध्रुवको उठा लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने दोनों कोमल हाथोंसे उसके धूलिधूसरित शरीरको सब ओरसे पोंछा और उसे हृदयसे लगाकर कहा ॥ ८१–८६॥
'बच्चा! तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा है, उसके अनुसार वर माँग लो। मैं निस्संदेह वह सब तुम्हें दे दूँगा। तुम्हारे लिये कोई भी वस्तु अदेय नहीं है' ॥ ८७ ॥
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