संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०९ द्वादशाक्षरमन्त्रेण वासुदेवात्मकेन च। पा लेता है—इसमें संशय नहीं है। वासुदेवस्वरूप द्वादशाक्षर ध्यायंश्चतुर्भुजं विष्णुं जप्त्वा सिद्धिं न को गतः ॥ ६८ मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) -के द्वारा चार पितामहेन चाप्येष महामन्त्र उपासितः। भुजाधारी भगवान् विष्णुका ध्यान और जप करके किसने मनुना राज्यकामेन वैष्णवेन नृपात्मज ॥ ६९ सिद्धि नहीं प्राप्त कर ली ? राजकुमार ! पितामह (ब्रह्माजी) - त्वमप्येतेन मन्त्रेण वासुदेवपरो भव। ने भी इस महामन्त्रकी उपासना की थी। विष्णुभक्त मनुने यथाभिलषितामृद्धिं क्षिप्रं प्राप्स्यसि सत्तम ॥ ७० भी राज्यकी कामनासे इस मन्त्रद्वारा भगवान्की आराधना की थी। सत्पुरुषशिरोमणे ! तुम भी इस मन्त्रद्वारा भगवान् वासुदेवकी आराधनामें लग जाओ। इससे बहुत शीघ्र ही सूत उवाच अपनी मनोवाञ्छित समृद्धि प्राप्त कर लोगे ॥ ६६–७० ॥ इत्युक्त्वान्तर्हिताः सर्वे महात्मानो मुनीश्वराः। सूतजी कहते हैं—यों कहकर वे सभी महात्मा वासुदेवमना भूत्वा ध्रुवोऽपि तपसे ययौ ॥ ७१ मुनीश्वर वहीं अन्तर्हित हो गये और ध्रुव भी भगवान् ध्रुवः सर्वार्थदं मन्त्रं जपन् मधुवने तपः। वासुदेवमें मन लगाकर तपस्याके लिये चला गया। स चक्रे यमुनातीरे मुनिदिष्टेन वर्त्मना ॥ ७२ द्वादशाक्षर मन्त्र सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है। ध्रुव श्रद्धान्वितेन जपता च तपःप्रभावात् मधुवनमें यमुनाके तटपर मुनियोंकी बतायी हुई पद्धतिसे साक्षाद्दिवाब्जनयनं ददृशे हृदीशम्। उस मन्त्रका जप करने लगा। श्रद्धापूर्वक उस मन्त्रका दिव्याकृतिं सपदि तेन ततः स एव जप करते हुए राजकुमार ध्रुवने तपके प्रभावसे तत्काल हर्षात् पुनः स प्रजजाप नृपात्मभूतः ॥ ७३ ही हृदयमें भगवान् कमलनयनको प्रकट प्रत्यक्षवत् देखा। क्षुत्तर्षवर्षघनवातमहोष्णतादि- उनकी आकृति बड़ी दिव्य थी। भगवान्के दर्शनसे उसका शारीरदुःखकुलमस्य न किंचनाभूत्। हर्ष बढ़ गया। अब तो वह राजपुत्र पुनः बड़े उत्साहसे मग्ने मनस्यनुपमेयसुखाम्बुराशौ उस मन्त्रका जप करने लगा। उस समय भूख, प्यास, राज्ञः शिशोर्न च विवेद शरीरवार्ताम् ॥ ७४ वर्षा, आँधी और अधिक गर्मी आदि दैहिक दुःखोंमेंसे विघ्नाश्च तस्य किल शङ्कितदेवसृष्टा कोई भी उसे नहीं व्यापा। उस राजकुमारका मन अनुपम बालस्य तीव्रतपसो विफला बभूवुः। आनन्द-महासागरमें गोता लगा रहा था। अतः उस समय शीतातपादिरिव विष्णुमयं मुनिं हि उसे अपने शरीरकी भी सुध नहीं रह गयी थी। कहते प्रादेशिका न खलु धर्षयितुं क्षमन्ते ॥ ७५ हैं, उसकी तपस्यासे शङ्कित हुए देवताओंने कितने ही विघ्न खड़े किये; परंतु उस तीव्र तपस्वी बालकके लिये अथ भक्तजनप्रियः प्रभुः वे सभी निष्फल ही सिद्ध हुए। शीत और धूप आदिकी शिशुना ध्यानबलेन तोषितः। ही तरह ये एकदेशीय विघ्न भी उस विष्णुस्वरूप मुनिको वरदः पतगेन्द्रवाहनो व्यथित नहीं कर पाते थे ॥ ७१–७५ ॥ हरिरागात् स्वजनं समीक्षितुम् ॥ ७६ कुछ समयके बाद भक्तजनोंके प्रियतम वरदाता मणिपिण्डकमौलिरोजितो भगवान् विष्णु बालक ध्रुवके ध्यान-बलसे संतुष्ट होकर विलसद्रत्नमहाघनच्छविः । पक्षिराज गरुडपर सवार हो, अपने उस भक्तको देखनेके स बभावुदयाद्रिमत्सरा- लिये आये। मणिसमूहद्वारा निर्मित मुकुटसे मण्डित और द्धृतबालार्क इवासिताचलः ॥ ७७ शोभाशाली कौस्तुभरत्नसे समलंकृत, महामेघके समान श्यामकन्तिवाले वे भगवान् श्रीहरि ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो उदयाचलके प्रति डाह रखनेके कारण अपने शृङ्गपर बालरविकों धारण किये साक्षात् कज्जलगिरि प्रकाशित हो In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth