भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 318 में से

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पृष्ठ 119

१०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१ अत्रिरुवाच | अत्रि बोले—जिसने अच्युतके चरणोंकी अर्चना अनर्चिताच्युतपदः पदमासादयेत् कथम्। | नहीं की है, वह पुरुष उस पदको, जो इन्द्रादि देवताओंके इन्द्रादिदुरवापं यन्मानवैः सुदुरासदम्॥ ५८ | लिये भी दुर्लभ और मनुष्योंके लिये तो अत्यन्त | दुष्प्राप्य है, कैसे पा सकता है ? ॥ ५८ ॥ अङ्गिरा उवाच | अङ्गिरा बोले—जो भगवान् कमलाकान्तके कमनीय न हि दूरे पदं तस्य सर्वासां सम्पद्दामिह । | चरणकमलोंका अनुशीलन (चिन्तन) करता है, उसके कमलाकान्तकान्ताङ्घ्रिकमलं यः सुशीलयेत्॥ ५९ | लिये त्रिभुवनकी सारी सम्पदाओंका स्थान दूर (दुर्लभ) | नहीं है ॥ ५९ ॥ पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्य बोले—ध्रुव ! जिनके स्मरणमात्रसे यस्य स्मरणमात्रेण महापातकसंततिः। | महापातकोंकी परम्परा अत्यन्त नाशको प्राप्त हो जाती परमान्तकमाप्नोति स विष्णुः सर्वदो ध्रुव ॥ ६० | है, वे भगवान् विष्णु ही सब कुछ देनेवाले हैं ॥ ६० ॥ पुलह उवाच | पुलह बोले—जिन्हें प्रधान (प्रकृति) और पुरुष यदाहुः परमं ब्रह्म प्रधानपुरुषात् परम्। | (जीव)—से विलक्षण परब्रह्म कहते हैं, जिनकी मायासे यन्मायया कृतं सर्वं स विष्णुः कीर्तितोऽर्थदः ॥ ६१ | समस्त प्रपञ्च रचा गया है, उन भगवान् विष्णुका यदि | कीर्तन किया जाय तो वे अपने भक्तके अभीष्ट मनोरथको क्रतुरुवाच | पूर्ण कर देते हैं ॥ ६१ ॥ यो यज्ञपुरुषो विष्णुर्वेदवेद्यो जनार्दनः । | क्रतु बोले—जो यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु वेदोंके अन्तरात्मास्य जगतः संतुष्टः किं न यच्छति ॥ ६२ | द्वारा जाननेयोग्य हैं तथा जो जनार्दन इस समस्त जगत्के | अन्तरात्मा हैं, वे प्रसन्न हों तो क्या नहीं दे सकते ? ॥ ६२ ॥ वसिष्ठ उवाच | वसिष्ठ बोले—राजकुमार ! जिनकी भौंहोंके नर्तनमात्रमें यद्भ्रूनर्तनवर्तिन्यः सिद्धयोऽष्टौ नृपात्मज। | आठों सिद्धियाँ वर्तमान हैं, उन भगवान् हृषीकेशकी तमाराध्य हृषीकेशं चतुर्वर्गो न दूरतः ॥ ६३ | आराधना करनेसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों | पुरुषार्थ दूर नहीं रहते ॥ ६३ ॥ ध्रुव उवाच | ध्रुव बोले—द्विजवरो ! भगवान् विष्णुकी आराधनाके सत्यमुक्तं द्विजेन्द्रा वो विष्णोराराधनं प्रति। | सम्बन्धमें आपलोगोंने जो विचार प्रकट किया, वह कथं स भगवानिज्यः स विधिश्चोपदिश्यताम् ॥ ६४ | सत्य है। अब मुझे यह बताइये कि उन भगवान्की पूजा | कैसे करनी चाहिये ? उसकी विधिका मुझे उपदेश प्रभूतदो भवेद्यो वै दुराराध्यतमो भवेत्। | कीजिये। जो बहुत कुछ दे सकते हैं, उनकी आराधना बालोऽहं राजपुत्रोऽहं दुःखं नैव मया क्षमम्॥ ६५ | भी कठिन ही होगी। मैं राजकुमार हूँ और बालक हूँ; | मुझसे विशेष कष्ट नहीं सहा जा सकता ॥ ६४-६५ ॥ मुनय ऊचुः | मुनिगण बोले—खड़े होते, चलते, सोते-जागते, तिष्ठता गच्छता वापि स्वपता जाग्रता तथा। | लेटते और बैठते हुए प्रतिक्षण भगवान् नारायणका स्मरण शयानेनोपविष्टेन वेद्यो नारायणः सदा ॥ ६६ | करना चाहिये। भगवान् वासुदेवके नामका जप करनेवाला पुत्रान् कलत्रं मित्राणि राज्यं स्वर्गापवर्गकम्। | मनुष्य पुत्र, स्त्री, मित्र, राज्य, स्वर्ग तथा मोक्ष—सब कुछ वासुदेवं जपन् मर्त्यः सर्वं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ ६७ |