भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०७ तिलकाङ्कितसद्भालान् कुशोपग्रहिताङ्गुलीन् । हुआ। उनके सुन्दर ललाटमें तिलक लगे थे। उन्होंने कृष्णाजिनोपविष्टांश्च ब्रह्मसूत्रैरलंकृतान् ॥ ४७ अँगुुलियोंमें कुशकी पवित्री पहन रखी थी तथा यज्ञोपवीतोंसे विभूषित होकर वे काले मृगचर्मपर बैठे उपगम्य विनम्रांसः प्रबद्धकरसम्पुटः । हुए थे। उनके पास जाकर ध्रुवने गर्दन झुका दी, दोनों ध्रुवो विज्ञापयांचक्रे प्रणम्य ललितं वचः ॥ ४८ हाथ जोड़ लिये और प्रणाम करके मधुर वाणीमें उन्हें अपना अभिप्राय निवेदित किया॥ ४४-४८॥ ध्रुव उवाच ध्रुव बोला—मुनिवरो ! आप मुझे सुनीतिके गर्भसे अवैत मां मुनिवराः सुनीत्युदरसम्भवम्। उत्पन्न राजा उत्तानपादका पुत्र ध्रुव जानें। इस समय मेरा उत्तानपादतनयं ध्रुवं निर्विण्णमानसम् ॥ ४९ चित्त जगत्की ओरसे विरक्त है॥ ४९॥ सूत उवाच सूतजी कहते हैं—अमूल्य नीति ही जिसका भूषण तं दृष्ट्वौजस्वलं बालं स्वभावमधुराकृतिम्। है—ऐसे मधुर और गम्भीर भाषण करनेवाले एवं स्वभावतः अनर्घ्यनयनेपथ्यं मृदुगम्भीरभाषिणम् ॥ ५० मनोहर आकृतिवाले उस तेजस्वी बालकको देखकर ऋषियोंने अत्यन्त विस्मित हो उसे अपने पास बिठाया उपोपवेश्य शिशुकं प्रोचुस्ते विस्मिता भृशम् । और कहा—'वत्स ! अभीतक तुम्हारे वैराग्य या निर्वेदका तवाद्यापि न जानीमो वत्स निर्वेदकारणम् ॥ ५१ कारण हम नहीं जान सके। वैराग्य तो उन मनुष्योंको होता है, जिनकी मनःकामनाएँ पूर्ण नहीं हो पातीं। तुम अनवाप्ताभिलाषाणां वैराग्यं जायते नृणाम्। तो सातों द्वीपोंके अधीश्वर सम्राट्के पुत्र हो; तुम अपूर्णमनोरथ सप्तद्वीपपते राज्ञः कुमारस्त्वं तथा कथम् ॥ ५२ कैसे हो सकते हो? हमसे तुम्हें क्या काम है ? तुम्हारी किमस्माभिरहो कार्यं कस्तवास्ति मनोरथः। मनोवाञ्छा क्या है'॥ ५०-५२ १/२ ॥ ध्रुव उवाच ध्रुव बोला—'मुनिगण ! मेरे जो उत्तमोत्तम बन्धु मुनयो मम यो बन्धुरुत्तमश्चोत्तमोत्तमः ॥ ५३ उत्तमकुमार हैं—उनके ही लिये पिताका दिया हुआ शुभ सिंहासन रहे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वरो ! पित्रा प्रदत्तं तस्यास्तु तद्भद्रासनमुत्तमम्। मैं आपलोगोंसे इतनी ही सहायता चाहता हूँ कि जिस भवत्कृतं हि साहाय्यं एतदिच्छामि सुव्रताः ॥ ५४ स्थानका किसी दूसरे राजाने उपभोग न किया हो, जो अन्य सभी स्थानोंसे उत्कृष्ट हो और इन्द्रादि देवताओंके अनन्यनृपभुक्तं यद् यदन्येभ्यः समुच्छ्रितम्। लिये भी दुर्लभ हो, वह स्थान मुझे किस उपायसे प्राप्त इन्द्रादिदुरवापं यत् कथं लभ्येत तत्पदम् ॥ ५५ हो सकता है, यह बता दें।' उस समय उस बालककी इति श्रुत्वा वचस्तस्य मुनयो बालकस्य तु। ये बातें सुनकर मरीचि आदि ऋषियोंने उसे यथार्थ ही यथार्थमेव प्रत्यूचुर्मरीच्याद्यास्तदा ध्रुवम् ॥ ५६ उत्तर दिया ॥ ५३–५६ ॥ मरीचिरुवाच मरीचि बोले—जिसने गोविन्द-चरणारविन्दोंके परागके रसका आस्वादन नहीं किया, वह मनोरथ- अनास्वादितगोविन्दपदाम्बुजरजोरसः । पथसे अतीत (ध्यानमें भी न आ सकनेवाले) पर्मोज्ज्वल मनोरथपथातीतं स्फीतं नाकलयोत् फलम् ॥ ५७ फलको नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ५७॥