भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 318 में से

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पृष्ठ 122

अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १११ ततो वरं राजशिशुर्ययाचे | तब राजकुमारने भगवान् विष्णुसे यही वर माँगा कि विष्णुं वरं ते स्तवशक्तमेव। | 'मुझे आपकी स्तुति करनेकी शक्ति प्राप्त हो।' यह सुनकर तं मूर्तविज्ञाननिभेन देवः | भगवान्ने मूर्तिमान् विज्ञानके समान निर्मल शङ्खसे ध्रुवके पस्पर्श शङ्खेन मुखेऽमलेन ॥ ८८ | मुखको छुआ दिया। मरीचि आदि देवर्षियोंके दिये हुए | ज्ञानरूपी चन्द्रमाकी किरणोंसे क्षालित होकर ध्रुवका चित्त अथ सुरमुनिदत्तज्ञानचन्द्रेण सम्यग् | पूर्णतया निर्मल हो गया था। फिर त्रिभुवनगुरु भगवान्के विमलितमिव चित्तं पूर्णमेव ध्रुवस्य। | शङ्ख-स्पर्शसे उसके अन्तःकरणमें ज्ञानरूपी सूर्यका उदय त्रिभुवनगुरुशङ्खस्पर्शजज्ञानभाना- | हो जानेपर उसमें पूर्ण प्रकाश हो गया। इससे वह आनन्दित नुदयति नितरान्तः साधु तुष्टाव हृष्टः ॥ ८९ | होकर भगवान्की सुन्दर स्तुति करने लगा ॥ ८८-८९ ॥ | ध्रुव बोला—समस्त मुनिगण जिनके चरणकमलोंकी ध्रुव उवाच | वन्दना करते हैं, जो खर राक्षस अथवा गर्दभरूपधारी | धेनुकासुरका संहार करनेवाले हैं, जिनकी बाललीलाएँ अखिलमुनिजननिवहनमितचरणः। खरकदन- | चपलतासे पूर्ण हैं, देवगण जिनके चरणोदक (गङ्गाजी)- करः। चपलचरितः। देवाराधितपादजलः। | की आराधना करते हैं, सजल मेघके समान जिनका | श्याम वर्ण है, सौभ विमानके अधिपति शाल्वके धाम सजलजलधरश्यामः शमितसौभपतिशाल्वधामा। | (तेज)-को जिन्होंने सदाके लिये शान्त कर दिया है, | जिन्होंने सुन्दर गोपवनिताओंके अत्यन्त विनयवश नूतन अभिरामरामातिविनयकृतनवरसरसापहतेन्द्रिय- | प्रेमरसमय रासलीलाको प्रकट किया और उससे मोहित सुररमणीविहितान्तःकरणानन्दः। अनादिनिधनः। | होनेवाली देववनिताओँके अन्तःकरणमें भी आनन्दका | संचार किया, जिनका आदि और अन्त नहीं है, जिन्होंने अधननिरजद्विजमित्रोद्धरणधीरः। अवधीरितसुरनाथ- | अपने निर्धन मित्र सुदामा नामक ब्राह्मणका धीरतापूर्वक | दैन्यदुःखसे उद्धार किया, देवराज इन्द्रकी प्रार्थनासे जिन्होंने नाथितविपक्षपक्षः। ऋक्षराजबिलप्रवेशापहृत- | उनके शत्रुपक्षको पराजित किया, ऋक्षराज जाम्बवान्‌की | गुहामें प्रवेश करके खोयी हुई स्यमन्तक मणिको लाकर स्यमन्तकापमार्जितनिजापवाददुरितहृतत्रैलोक्यभारः। | जिन्होंने अपने ऊपर लगे हुए कलङ्करूप दुरितको दूर | करके त्रिभुवनका भार हल्का किया है, जो द्वारकापुरीमें द्वारकावासनिरतः। स्वरितमधुरवेणुवादनश्रवणामृत- | नित्य निवास करते हैं, जो अपनी मधुर मुरली बजाकर | श्रुतिमधुर अतीन्द्रिय-ज्ञानको प्रकट करते तथा यमुनाटटपर प्रकटितातीन्द्रियज्ञानः। यमुनाटटचरः। द्विजधेनुभृङ्ग- | विचरते हैं, जिनके वंशीनादको सुननेके लिये पक्षी, गौ | और भृङ्गगण अपना-अपना आहार त्याग देते हैं, जिनके गणैस्त्यक्तनिजनिजाहारः। संसारदुस्तरपारावार- | चरणकमल दुस्तर संसार-सागरसे पार करनेके लिये समुत्तरणाङ्घ्रिपोतः। स्वप्रतापानलहुतकालयवनः। | जहाजरूप हैं, जिन्होंने अपनी प्रतापाग्निमें कालयवनको | होम दिया है, जो वनमालाधारी हैं, जिनके श्रवण वनमालाधरवरमणिकुण्डलालंकृतश्रवणः। नाना- | सुन्दर मणिमय कुण्डलोंसे अलंकृत हैं, जिनके अनेक प्रसिद्धाभिधानः। निगमविबुधमुनिजनवचन- | प्रसिद्ध नाम हैं, जो वेदवाणी तथा देवता और मुनियोंके | भी मन-वाणीके अगोचर हैं, जो भगवान् सुवर्णके समान मनोऽगोचरः। कनकपिशङ्गकौशेयवासोभगवान् | पीत रेशमी वस्त्र धारण करते हैं, जिनका वक्षःस्थल भृगुपदकौस्तुभविभूषितोरःस्थलः। स्वदयिता- | भृगुजीके चरण-चिह्न तथा कौस्तुभमणिसे अलंकृत है,