संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ
पृष्ठ 171, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 171
१६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४४
[श्लोक ८२ – ८९ एवं हिन्दी अनुवाद]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनयाथ च त्वां नौमि नृत्यामि तत्परः सदा।<br>अथाभितुष्टो भगवान् प्रियमाह प्रियंवदम् ॥ ८२<br><br>वत्स यद्यदभीष्टं ते तत्तदस्तु सुखी भव।<br>अन्तर्हिते च मय्यत्र मा खिद त्वं महामते ॥ ८३<br><br>त्वच्चित्तान्नापयास्यामि क्षीराब्धेरिव सुप्रियात्।<br>पुनर्द्वित्रिदिनैस्त्वं मां द्रष्टा दुष्टवधोद्यतम् ॥ ८४<br><br>अपूर्वाविष्कृताकारं नृसिंहं पापभीषणम्।<br>उक्त्वेत्यतः प्रणमतः पश्यतश्चातिलालसम् ॥ ८५<br><br>अतृप्तस्यैव तस्येशो माययान्तर्दधे हरिः।<br>ततो हताददृष्ट्वा तं सर्वतो भक्तवत्सलम् ॥ ८६<br><br>हाहेत्यश्रुप्लुतः प्रोच्य ववन्दे स चिरादिति।<br>श्रूयमाणेऽथ परितः प्रतिबुद्धजनस्वने ॥ ८७<br><br>उत्थायाब्धितटाद्धीमान् प्रह्लादः स्वपुरं ययौ ॥ ८८<br><br>अथ दितिजसुतश्चिरं प्रहृष्टः<br> स्मृतिबलतः परितस्तमेव पश्यन्।<br>हरिमनुजगत्तिं त्वलं च पश्यन्<br> गुरुगृहमृतपुलकः शनैरवाप ॥ ८९ | यही नहीं, इस भक्तिसे युक्त होकर मैं आपका स्तवन किया करूँ और आपके ही परायण रहकर सदा नाचा करूँ'॥ ८११/२॥<br><br>भगवान्ने संतुष्ट होकर प्रिय भाषण करनेवाले प्रिय भक्त प्रह्लादसे तब कहा—'वत्स! तुम्हें जो-जो अभीष्ट हो, वह सब प्राप्त हो; तुम सुखी रहो। एक बात और है—महामते! यहाँसे मेरे अन्तर्धान हो जानेपर भी तुम खेद न करना। मैं अपने परमप्रिय स्थान क्षीरसागरकी भाँति तुम्हारे शुद्धचित्तसे कभी अलग न होऊँगा। तुम दो-ही-तीन दिनोंके बाद मुझे दुष्ट हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये उद्यत अपूर्व शरीर धारण किये नृसंहरूपमें, जो पापियोंके लिये भयानक है, पुनः प्रकट देखोगे।' यों कहकर भगवान् हरि, अपनेको प्रणाम करके अत्यन्त ललचायी हुई दृष्टिसे देखते रहनेपर भी तृप्त न होनेवाले उस भक्त प्रह्लादके सामने ही मायासे अन्तर्धान हो गये॥ ८२-८५१/२॥<br><br>तत्पश्चात् वे सहसा सब ओर दृष्टि डालनेपर भी जब भक्तवत्सल भगवान्को न देख सके, तब आँसू बहाते हुए उच्चस्वरसे हाहाकार करके बड़ी देरतक भगवान्की वन्दना करते रहे। फिर जब प्रातःकाल जगे हुए जन्तुओंकी वाणी सब ओर सुनायी देने लगी, तब बुद्धिमान् प्रह्लाद समुद्र-तटसे उठकर अपने नगरको चले गये। इसके बाद दैत्यनन्दन प्रह्लादजी परम प्रसन्न होकर अपने स्मरणबलसे संसारमें सब ओर भगवान्का ही दर्शन करते हुए तथा भगवान् एवं मनुष्यकी गतिको भलीभाँति समझते हुए रोमाञ्चित होकर धीरे-धीरे गुरुके घर गये॥ ८६-८९॥ |
इति श्रीनरसिंहपुराणे नरसिंहप्रादुर्भावे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहावतारविषयक' तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
चौवालीसवाँ अध्याय
नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br>अथागतं ते प्रह्लादं दृष्ट्वा दैत्याः सुविस्मिताः।<br>शशंसुर्दैत्यपतये यैः क्षिप्तः स महार्णवे ॥ १<br>स्वस्थं तमागतं श्रुत्वा दैत्यराड्विस्मयाकुलः। | **मार्कण्डेयजी बोले—**तदनन्तर प्रह्लादको [कुशलपूर्वक समुद्रसे] लौटा देखकर, जिन्होंने उन्हें महासागरमें डाला था, वे दैत्य बड़े विस्मित हुए और उन्होंने तुरंत यह समाचार दैत्यराज हिरण्यकशिपुको दिया। उन्हें स्वस्थ |
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth