संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४४ ] नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध १६१
आहूयतां च इत्याह क्रोधान्मृत्युवशे स्थितः ॥ २ तथासुरैर्दुरा नीतः समासीनं स दिव्यदृक् । आसन्नमृत्युं दैत्येन्द्रं ददर्शात्यूर्जितश्रियम् ॥ ३
नीलांशुमिश्रमाणिक्यद्युतिच्छन्नविभूषणम् । सधूमाग्निमिव व्यासमुच्चासनचितिस्थितम् ॥ ४
दंष्ट्रोत्कटैर्घोरतरैर्घनच्छविभिरुद्धतैः । कुमार्गदर्शिभिर्दैत्यैर्यमदूतैरिवावृतम् ॥ ५
दूरात् प्रणम्य पितरं प्राञ्जलिस्तु व्यवस्थितः । अथाहाकारणक्रोधः स खलो भर्त्सयन् सुतम् ॥ ६
भगवत्प्रियमत्युच्चैर्मृत्युमेवाश्रयन्निव । मूढ रे शृणु मद्वाक्यमेतदेवान्तिमं ध्रुवम् ॥ ७
इतो न त्वां प्रवक्ष्यामि श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् । उक्तेवेति द्रुतमाकृष्य चन्द्रहासासिमद्भुतम् ॥ ८
सम्भ्रमाद्वीक्षितः सर्वैश्चालयन्नाह तं पुनः । क्व चास्ति मूढ ते विष्णुः स त्वामद्य परक्षतु ॥ ९
त्वयोक्तं स हि सर्वत्र कस्मात्स्तम्भे न दृश्यते । यदि पश्यामि तं विष्णुमधुना स्तम्भमध्यगम् ॥ १०
तर्हि त्वां न वधिष्यामि भविष्यसि द्विधान्यथा । प्रह्लादोऽपि तथा दृष्ट्वा दध्यौ तं परमेश्वरम् ॥ ११
पुरोक्तं तद्वचः स्मृत्वा प्रणनाम कृताञ्जलिः । तावत्प्रस्फुटितस्तम्भो वीक्षितो दैत्यसूनुना ॥ १२
आदर्शरूपो दैत्यस्य खड्गतो यः प्रतिष्ठितः । तन्मध्ये दृश्यते रूपं बहुयोजनमायतम् ॥ १३
अतिरौद्रं महाकायं दानवानां भयंकरम् । महानेत्रं महावक्त्रं महादंष्ट्रं महाभुजम् ॥ १४
महानखं महापादं कालाग्निसदृशाननम् । कर्णान्तकृतविस्तारवदनं चातिभीषणम् ॥ १५
लौटा सुन दैत्यराज विस्मयसे व्याकुल हो उठा और क्रोधवश मृत्युके अधीन होकर बोला-'उसे यहाँ बुला लाओ।' असुरोंके द्वारा बुरी तरहसे पकड़कर लाये जानेपर दिव्यदृष्टिवाले प्रह्लादने सिंहासनपर बैठे हुए दैत्यराज हिरण्यकशिपुको देखा। उसकी मृत्यु निकट थी, उसका तेज बहुत बढ़ा हुआ था। उसके आभूषण नीलप्रभायुक्त माणिक्योंकी कान्तिसे आच्छन्न थे, अतएव वह धूमयुक्त फैली हुई अग्निके समान शोभित हो रहा था। वह ऊँचे सिंहासन-मञ्चपर विराजमान था और उसे मेघके समान काले दाढ़ोंके कारण विकराल, अत्यन्त भयानक, कुमार्गदर्शी एवं यमदूतोंके समान क्रूर दैत्य घेरे हुए थे॥ १-५॥
प्रह्लादजीने दूरसे ही हाथ जोड़कर पिताको प्रणाम किया और खड़े हो गये। तब मृत्युके निकट पहुँचनेवालेकी भाँति अकारण ही क्रोध करनेवाले उस दुष्टने भगवद्भक्त पुत्रको उच्चस्वरसे डाँटते हुए कहा-'अरे मूर्ख ! तू मेरा यह अन्तिम और अटल वचन सुन; इसके बाद मैं तुझसे कुछ न कहूँगा; इसे सुनकर तेरी जैसी इच्छा हो, वही करना।' यह कहकर उसने शीघ्र ही चन्द्रहास नामक अपनी अद्भुत तलवार खींच ली। उस समय सब लोग उसकी ओर आश्चर्यपूर्वक देखने लगे। उसने तलवार चलाते हुए पुनः प्रह्लादसे कहा-'रे मूढ़! तेरा विष्णु कहाँ है ? आज वह तेरी रक्षा करे ! तूने कहा था कि वह सर्वत्र है। फिर इस खंभेमें क्यों नहीं दिखायी देता ? यदि तेरे विष्णुको इस खंभेके भीतर देख लूँगा, तब तो तुझे नहीं मारूँगा; यदि ऐसा न हुआ तो इस तलवारसे तेरे दो टुकड़े कर दिये जायँगे' ॥ ६-१० १/२ ॥
प्रह्लादने भी ऐसी बात देखकर उन परमेश्वरका ध्यान किया और पहले कहे हुए उनके वचनको याद करके हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम किया। इतनेमें ही दैत्यनन्दन प्रह्लादने देखा कि वह दर्पणके समान स्वच्छ खंभा, जो अभीतक खड़ा था, दैत्यराजकी तलवारके आघातसे फट पड़ा तथा उसके भीतर अनेक योजन विस्तारवाला, अत्यन्त रौद्र एवं महाकाय नरसिंहरूप दिखायी दिया, जो दानवोंको भयभीत करनेवाला था। उसके बड़े-बड़े नेत्र, विशाल मुख, बड़ी-बड़ी दाढ़ें और लंबी-लंबी भुजाएँ थीं। उसके नख बहुत बड़े और पैर विशाल थे। उसका मुख कालाग्निके समान देदीप्यमान था, जबड़े कानतक फैले हुए थे और वह बहुत भयानक दिखायी देता था ॥ ११-१५ ॥
1113 Narsingpuran_Section_7_1_Front In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth