संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 173, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४४ कृत्वेत्थं नारसिंहं तु ययौ विष्णुस्त्रिविक्रमः । नरसिंहः स्तम्भमध्यान्निर्गत्य प्रणनाद च ॥ १६ निनादश्रवणाद्दैत्या नरसिंहमवेष्टयन् । तान् हत्वा सकलांस्तत्र स्वपौरुषपराक्रमात् ॥ १७ बभञ्ज च सभां दिव्यां हिरण्यकशिपोर्नृप । वारयामासुरभ्येत्य नरसिंहं महाभटाः ॥ १८ ते तु राजन् क्षणादेव नरसिंहेन वै हताः । ततः शस्त्राणि वर्षन्ति नरसिंहे प्रतापिणि ॥ १९ स तु क्षणेन भगवान् हत्वा तद्बलमोजसा । ननाद च महानादं दिशः शब्देन पूरयन् ॥ २० तान्मृतानपि विज्ञाय पुनरन्यान्महासुरः । अष्टाशीतिसहस्राणि हेतिहस्तान् समादिशत् ॥ २१ तेऽप्यागत्य च तं देवं रुरुधुः सर्वतोदिशम् । हत्वा तानखिलान् युद्धे युध्यमानो ननाद सः ॥ २२ पुनः सभां बभञ्जासौ हिरण्यकशिपोः शुभाम् । तान् हतानपि विज्ञाय क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २३ ततो हिरण्यकशिपुर्निष्चक्राम महाबलः । उवाच च महीपाल दानवान् बलदर्पितान् ॥ २४ हन्यतां हन्यतामेष गृह्यतां गृह्यतामयम् । इत्येवं वदतस्तस्य प्रमुखे तु महासुरान् ॥ २५ युध्यमानान् रणे हत्वा नरसिंहो ननाद च । ततोऽतिदुद्रुवुर्दैत्या हतशेषा दिशो दश ॥ २६ तावद्धता युध्यमाना दैत्याः कोटिसहस्रशः । नरसिंहेन यावच्च नभोभागं गतो रविः ॥ २७ शस्त्रास्त्रवर्षचतुरं हिरण्यकशिपुं जवात् । प्रगृह्य तु बलाद्राजन् नरसिंहो महाबलः ॥ २८ संध्याकाले गृहद्वारि स्थित्वोरौ स्थाप्य तं रिपुम् । वज्रतुल्यमहोरस्कं हिरण्यकशिपुं रुषा । नखैः किसलयमिव दारयत्याह सोऽसुरः ॥ २९ इस प्रकार नरसिंहरूप धारणकर त्रिविक्रम भगवान् विष्णु खंभेके भीतरसे निकल पड़े और लगे बड़े जोर-जोरसे दहाड़ने। नरेश्वर! यह गर्जना सुनकर दैत्योंने भगवान् नरसिंहको घेर लिया। तब उन्होंने अपने पौरुष एवं पराक्रमसे उन सबको मौतके घाट उतारकर हिरण्यकशिपुका दिव्य सभाभवन नष्ट कर दिया। राजन्! उस समय जिन महाभटोंने निकट आकर नृसिंहजीको रोका, उन सबको उन्होंने क्षणभरमें मार डाला। तत्पश्चात् प्रतापी नरसिंहभगवान्पर असुर सैनिक अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ १६-१९ ॥ भगवान् नृसिंहने क्षणभरमें ही अपने तेजसे समस्त दैत्यसेनाका संहार कर दिया और दिशाओंको अपनी गर्जनासे गुँजाते हुए वे भयंकर सिंहनाद करने लगे। उपर्युक्त दैत्योंको मरा जान महासुर हिरण्यकशिपुने पुनः हाथमें शस्त्र लिये हुए अट्ठासी हजार असुर सैनिकोंको नृसिंहदेवसे लड़नेकी आज्ञा दी। उन असुरोंने भी आकर भगवान्को सब ओरसे घेर लिया। तब युद्धमें लड़ते हुए भगवान् उन सभीका वध करके पुनः सिंहनाद करने लगे। उन्होंने हिरण्यकशिपुके दूसरे सुन्दर सभाभवनको भी पुनः नष्ट कर दिया। राजन्! अपने भेजे हुए इन असुरोंको भी मारा गया जान क्रोधसे लाल-लाल आँखें करके महाबली हिरण्यकशिपु स्वयं बाहर निकला और बलाभिमानी दानवोंसे बोला—'अरे, इसे पकड़ो-पकड़ो; मार डालो, मार डालो। इस प्रकार कहते हुए हिरण्यकशिपुके सामने ही युद्ध करनेवाले उन सभी महान् असुरोंका रणमें संहार करके भगवान् नृसिंह गर्जने लगे। तब मरनेसे बचे हुए दैत्य दसों दिशाओंमें वेगपूर्वक भाग चले ॥ २०-२६ ॥ जबतक सूर्यदेव अस्ताचलको नहीं चले गये, तबतक भगवान् नृसिंह अपने साथ युद्ध करनेवाले हजारों करोड़ दैत्योंका संहार करते रहे। राजन्! किंतु जब सूर्य डूबने लगे, तब महाबली भगवान् नृसिंहने अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करनेमें कुशल हिरण्यकशिपुको बड़े वेगसे बलपूर्वक पकड़ लिया। फिर संध्याके समय घरके दरवाजेपर बैठकर, उस वज्रके समान कठोर विशाल वक्षवाले शत्रु हिरण्यकशिपुको अपनी जाँघोंपर गिराकर जब भगवान् नृसिंह रोषपूर्वक नखोंसे पत्तेकी भाँति उसे विदीर्ण करने लगे, तब उस महान् असुरने जीवनसे निराश होकर कहा— ॥ २७-२९ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth 113 Narsingpuran_Section_7_1_Back