भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 318 में से

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पृष्ठ 174

अध्याय ४४ ] नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका वध १६३ यत्राखण्डलदन्तिदन्तमुसला- 'हाय! युद्धके समय देवराज इन्द्रके वाहन गजराज न्याखण्डितान्याहवे ऐरावतके मूसल-जैसे दाँत जहाँ टकराकर टुकड़े-टुकड़े धारा यत्र पिनाकपाणिपरशो- हो गये थे, जहाँ पिनाकपाणि महादेवके फरसेकी तीखी राकुण्ठतामागमत् । धार भी कुण्ठित हो गयी थी, वहीं मेरा वक्षःस्थल इस तन्मे तावदुरो नृसिंहकरजै- समय नृसिंहके नखोंद्वारा फाड़ा जा रहा है। सच है, जब र्व्यादीर्यते साम्प्रतं भाग्य खोटा हो जाता है, तब तिनका भी प्रायः अनादर दैवे दुर्जनतां गते तृणमपि करने लगता है' ॥ ३० ॥ प्रायोऽप्यवज्ञायते ॥ ३० दैत्यराज हिरण्यकशिपु इस प्रकार कह ही रहा एवं वदति दैत्येन्द्रे ददार नरकेसरी। था कि भगवान् नृसिंहने उसका हृदयदेश विदीर्ण कर हृदयं दैत्यराजस्य पद्मपत्रमिव द्विपः ॥ ३१ दिया-ठीक उसी तरह, जैसे हाथी कमलके पत्तेको शकले द्वे तिरोभूते नखरन्ध्रे महात्मनः। अनायास ही छिन्न-भिन्न कर देता है। उसके शरीरके दोनों टुकड़े महात्मा नृसिंहके नखोंके छेदमें घुसकर ततः क्व यातो दुष्टोऽसाविति देवोऽतिविस्मितः ॥ ३२ छिप गये। राजन्! तब भगवान् सब ओर देखकर अत्यन्त विस्मित हो सोचने लगे-'अहो! वह दुष्ट कहाँ निरीक्ष्य सर्वतो राजन् वृथैतत्कर्म मेऽभवत् । चला गया? जान पड़ता है, मेरा यह सारा उद्योग ही इति संचिन्त्य राजेन्द्र नरसिंहो महाबलः ॥ ३३ व्यर्थ हो गया' ॥ ३१-३२१/२ ॥ व्यधुनत्करावुच्चैस्ततस्ते शकले नृप। राजेन्द्र! महाबली नृसिंह इस प्रकार चिन्तामें पड़कर नखरन्धान्निपतिते भूमौ रेणुसमे हरेः ॥ ३४ अपने दोनों हाथोंको बड़े जोरसे झाड़ने लगे। राजन्! फिर तो वे दोनों टुकड़े उन भगवान्के नख-छिद्रसे दृष्ट्वा व्यतीतसंरम्भो जहास परमेश्वरः। निकलकर भूमिपर गिर पड़े, वे कुचलकर धूलिकणके पुष्पवर्षं च वर्षन्तो नरसिंहस्य मूर्धनि ॥ ३५ समान हो गये थे। यह देख रोषहीन हो वे परमेश्वर हँसने लगे। इसी समय ब्रह्मादि सभी देवता अत्यन्त देवाः सब्रह्मकाः सर्वे आगताः प्रीतिसंयुताः। प्रसन्न हो वहाँ आये और भगवान् नरसिंहके मस्तकपर आगत्य पूजयामासुर्नरसिंहं परं प्रभुम् ॥ ३६ फूलोंकी वर्षा करने लगे। पास आकर उन सबने उन परम प्रभु नरसिंहदेवका पूजन किया ॥ ३३-३६ ॥ ब्रह्मा च दैत्यराजानं प्रह्लादमभिषेचयत् । तदनन्तर ब्रह्माजीने प्रह्लादको दैत्योंके राजाके पदपर धर्मे रतिः समस्तानां जनानामभवत्तदा ॥ ३७ अभिषिक्त किया। उस समय समस्त प्राणियोंका धर्ममें अनुराग हो गया। सम्पूर्ण देवताओंसहित भगवान् विष्णुने इन्द्रोऽपि सर्वदेवैस्तु हरिणा स्थापितो दिवि । इन्द्रको स्वर्गके राज्यपर स्थापित किया। भगवान् नृसिंह नरसिंहोऽपि भगवान् सर्वलोकहिताय वै ॥ ३८ भी सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये श्रीशैलके शिखरपर जा पहुँचे। वहाँ देवताओंसे पूजित हो वे श्रीशैलशिखरं प्राप्य विश्रुतः सुरपूजितः । प्रसिद्धिको प्राप्त हुए। वे भक्तोंका हित और अभक्तोंका स्थितो भक्तहितार्थाय अभक्तानां क्षयाय च ॥ ३९ नाश करनेके लिये वहीं रहने लगे ॥ ३७-३९ ॥ इत्येतन्नरसिंहस्य माहात्म्यं यः पठेन्नरः । नृपश्रेष्ठ! जो मनुष्य भगवान् नरसिंहके इस माहात्म्यको शृणोति वा नृपश्रेष्ठ मुच्यते सर्वपातकैः ॥ ४० पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता 1113 Narsingpuran_Section_7_2_Front In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth