भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 318 में से

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पृष्ठ 175

१६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४५ नरो वा यदि वा नारी शृणोत्याख्यानमुत्तमम्। | है। नर हो या नारी—जो भी इस उत्तम आख्यानको सुनता वैधव्याद्दुःखशोकाच्च दुष्टसङ्गात्प्रमुच्यते॥ ४१ | है, वह दुष्टोंका सङ्ग करनेके दोषसे, दुःखसे, शोकसे एवं वैधव्यके कष्टसे छुटकारा पा जाता है। जो दुष्ट स्वभाववाला, दुःशीलोऽपि दुराचारो दुष्प्रजो दोषकर्मकृत्। | दुराचारी, दुष्ट संतानवाला, दूषित कर्मोंका आचरण करनेवाला, अधर्मिष्ठोऽनभोगी च शृण्वन् शुद्धो भवेन्नरः॥ ४२ | अधर्मात्मा और विषयभोगी हो, वह मनुष्य भी इसका श्रवण करनेसे शुद्ध हो जाता है॥ ४०—४२॥ हरिः सुरेशो नरलोकपूजितो | मनुष्यलोकपूजित देवेश्वर भगवान् हरिने पूर्वकालमें हिताय लोकस्य चराचरस्य। | चराचर जगत्के हितके लिये अपनी मायासे भयानक कृत्वा विरूपं च पुराऽऽत्ममायया | आकारवाला नरसिंहरूप धारण करके दुःखदायी दैत्य हिरण्यकं दुःखकरं नखैश्छिनत्॥ ४३ | हिरण्यकशिपुको नखोंद्वारा नष्ट कर दिया था॥ ४३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे नरसिंहप्रादुर्भावो नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहका प्रादुर्भाव' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४४॥ पैंतालीसवाँ अध्याय वामन-अवतारकी कथा मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! जिन्होंने पूर्वकालमें शृणु राजन् समासेन वामनस्य पराक्रमम्। | राजा बलिके यज्ञमें सहस्रों दैत्योंका संहार किया था, बलियागे हता येन पुरा दैत्याः सहस्रशः॥ १ | उन भगवान् वामनका चरित्र संक्षेपसे सुनो॥ १॥ विरोचनसुतः पूर्वं महाबलपराक्रमः। | पहलेकी बात है, विरोचनका पुत्र बलि महान् बल त्रैलोक्यं बुभुजे जित्वा देवानिन्द्रपुरोगमान्॥ २ | और पराक्रमसे सम्पन्न हो इन्द्र आदि समस्त देवताओंको जीतकर त्रिभुवनका राज्य भोग रहा था। नृपवर! उसके ततः कृशतरा देवा बभूवुस्तेन खण्डिताः। | द्वारा खण्डित हुए देवतालोग बहुत दुबले हो गये थे। इन्द्रं कृशतरं दृष्ट्वा नष्टराज्यं नृपोत्तम॥ ३ | राज्य नष्ट हो जानेसे इन्द्र और अधिक कृश हो गये थे। अदितिर्देवमाता या सातप्यत्परमं तपः। | उन्हें इस दशामें देखकर देवमाता अदितिने बहुत बड़ी तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ ४ | तपस्या की। उन्होंने भगवान् जनार्दनको प्रणाम करके अभीष्ट वाणीद्वारा उनका स्तवन किया। अदितिकी स्तुतिसे प्रसन्न हो ततः स्तुत्याभिसंतुष्टो देवदेवो जनार्दनः। | देवाधिदेव मधुसूदन जनार्दन उनके सम्मुख उपस्थित हो स्थित्वा तत्पुरतो वाचमुवाच मधुसूदनः॥ ५ | बोले—'सौभाग्यशालिनि! मैं बलिको बाँधनेके लिये तुम्हारा तव पुत्रो भविष्यामि सुभगे बलिबन्धनः। | पुत्र होऊँगा।' उनसे यों कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान इत्युक्त्वा तां गतो विष्णुः स्वगृहं सा समाययौ॥ ६ | हो गये और अदिति भी अपने घर चली गयीं॥ २—६॥ ततः कालेन सा गर्भमवाप नृप कश्यपात्। | राजन्! तदनन्तर समय आनेपर अदितिने कश्यपजीसे अजायत स विश्वेशो भगवान् वामनाकृतिः॥ ७ | गर्भ धारण किया। उस गर्भसे वामनरूपमें साक्षात् भगवान् In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth 1113 Narsingpuran_Section_7_2_Back