भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 318 में से

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पृष्ठ 176

अध्याय ४५ ] वामन-अवतारकी कथा १६५ तस्मिञ्जाते समागत्य ब्रह्मा लोकपितामहः। जगन्नाथ ही प्रकट हुए। वामनजीका अवतार होनेपर जातकमीदिकाः सर्वाः क्रियास्तत्र चकार वै॥ ८ लोकपितामह ब्रह्माजी वहाँ आये। उन्होंने उनके जातकर्मादि कृतोपनयनो देवो ब्रह्मचारी सनातनः। सम्पूर्ण समयोचित संस्कार सम्पन्न किये। उपनयन-संस्कारके अदितिं चाप्यनुज्ञाप्य यज्ञशालां बलेर्ययौ ॥ ९ बाद वे सनातन भगवान् ब्रह्मचारी होकर अदितिकी आज्ञा ले राजा बलिकी यज्ञशालामें गये। चलते समय उनके गच्छतः पादविक्षेपाच्चचाल सकला मही। चरणोंके आघातसे पृथ्वी काँप उठती थी। दानवगण बलिके यज्ञभागान्न गृह्णन्ति दानवाश्च बलेर्मखात् ॥ १० यज्ञसे हविष्य ग्रहण करनेमें असमर्थ हो गये। वहाँकी प्रशान्ताश्चाग्नयस्तत्र ऋत्विजो मन्त्रतश्च्युताः। आग बुझ गयी। ऋत्विकगण मन्त्रोच्चारणमें त्रुटि करने विपरीतमिदं दृष्ट्वा शुक्रमह महाबलः ॥ ११ लगे। यह विपरीत कार्य देखकर महाबली बलिने शुक्राचार्यसे कहा— 'मुने ! ये महान् असुरगण यज्ञका भाग क्यों नहीं न गृह्णन्ति मुने कस्माद्धविर्भागं महासुराः। ग्रहण कर रहे हैं? अग्नि क्यों शान्त हो रही है ? विप्रवर ! कस्माच्च वह्नयः शान्ताः कस्माद्विक्ष्वलति द्विज ॥ १२ यह पृथ्वी क्यों डगमगा रही है तथा ये सम्पूर्ण ऋत्विज् कस्माच्च मन्त्रतो भ्रष्टा ऋत्विजः सकला अमी। मन्त्रभ्रष्ट क्यों हो रहे हैं?' बलिके इस प्रकार पूछनेपर इत्युक्तो बलिना शुक्नो दानवेन्द्रं वचोऽब्रवीत् ॥ १३ शुक्राचार्यने उस दानवराजसे कहा— ॥ ७-१३॥ शुक्र उवाच शुक्र बोले- असुरराज बलि ! तुम मेरी बात सुनो। हे बले शृणु मे वाक्यं त्वया देवा निराकृताः। तुमने देवताओंको जीतकर स्वर्गसे निकाल दिया है; तेषां राज्यप्रदानाय अदित्यामच्युतोऽसुर ॥ १४ उन्हें पुनः उनका राज्य देनेके लिये जगत्के उत्पत्तिस्थान देवदेव भगवान् विष्णु अदितिके गर्भसे वामनरूपमें देवदेवो जगद्योनिः संजातो वामनाकृतिः। प्रकट हुए हैं। असुरराज ! वे ही तुम्हारे यज्ञमें आ रहे स त्वागच्छति ते यज्ञं तत्पादव्यासकम्पिता ॥ १५ हैं, अतः उन्हींके पादविन्यास (पाँव रखने)-से कम्पित चलतीयं मही सर्वा तेनाद्यासुरभूपते। हो यह सारी पृथ्वी आज हिलने लगी है तथा उन्हींके तत्संनिधानादसुरा न गृह्णन्ति हविर्मखे ॥ १६ निकट आ जानेके कारण असुरगण आज यज्ञमें हविष्य ग्रहण नहीं कर रहे हैं। बले ! वामनके आगमनसे ही तवाग्नयोऽपि वै शान्ता वामनागमनाद्वि भोः। तुम्हारे यज्ञकी आग भी बुझ गयी है और ऋत्विज् भी ऋत्विजश्च न भासन्ते होममन्त्रो बलेऽधुना ॥ १७ श्रीहीन हो गये हैं। इस समयका होममन्त्र असुरोंकी असुराणां श्रियो हन्ति सुराणां भूतिरुत्तमा। सम्पत्तिको नष्ट कर रहा है और देवताओंका उत्तम इत्युक्तः स बलिः प्राह शुक्रं नीतिमतां वरम् ॥ १८ वैभव बढ़ रहा है ॥ १४-१७ १/२ ॥ शृणु ब्रह्मन् वचो मे त्वमागते वामने मखे। उनके इस प्रकार कहनेपर बलिने नीतिज्ञोंमें श्रेष्ठ यन्मया चाद्य कर्तव्यं वामनस्यास्य धीमतः ॥ १९ शुक्राचार्यजीसे कहा- 'ब्रह्मन् ! महाभाग ! आप मेरी बात तन्मे वद महाभाग त्वं हि नः परमो गुरुः। सुनें। यज्ञमें वामनजीके पधारनेपर उन बुद्धिमान् वामनजीके लिये मुझे क्या करना चाहिये, वह हमें बताइये; क्योंकि आप मेरे परम गुरु हैं' ॥ १८-१९ १/२ ॥ मार्कण्डेय उवाच इति संचोदितः शुक्रः स राज्ञा बलिना नृप ॥ २० मार्कण्डेयजी बोले- नरेश्वर ! राजा बलिके इस तमुवाच बलिं वाक्यं ममापि शृणु साम्प्रतम्। प्रकार पूछनेपर शुक्राचार्यजीने उनसे कहा- "राजन् ! देवानामुपकाराय भवतां संक्षयाय च ॥ २१ अब मेरी भी राय सुनो। बले! वे देवताओंका हित करने और तुम लोगोंके विनाशके लिये ही तुम्हारे स नूनमायाति बले तव यज्ञे न संशयः। यज्ञमें पधार रहे हैं, इसमें संदेह नहीं है। अतः जब आगते वामने देवे त्वया तस्य महात्मनः ॥ २२ भगवान् वामन यहाँ आ जायँ, तब उन महात्माके लिये In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth