संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय, ४५ प्रतिज्ञा नैव कर्तव्या ददाम्येतत्तवेति वै। 'मैं आपको यह वस्तु देता हूँ' यों कहकर कुछ इति श्रुत्वा वचस्तस्य बलिर्बलवतां वरः॥ २३ देनेकी प्रतिज्ञा न करना' ॥ २०-२२१/२॥ उनकी यह बात सुनकर बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिने उवाच तां शुभां वाणीं शुक्रमात्मपुरोहितम्। अपने पुरोहित शुक्राचार्यजीसे यह सुन्दर बात कही— आगते वामने शुक्र यज्ञे मे मधुसूदने ॥ २४ 'गुरुदेव शुक्र! यज्ञमें मधुसूदन भगवान् वामनके पधारनेपर मैं उन्हें कुछ भी देनेसे इनकार नहीं कर सकता। अभी- न शक्यते प्रतिख्यातुं दानं प्रति मया गुरो। अभी मैं आपसे कह चुका हूँ कि दूसरे प्राणी भी यदि अन्येषामपि जन्तूनामित्युक्तं ते मयाधुना ॥ २५ मुझसे कुछ याचना करेंगे तो मैं उन्हें वह वस्तु देनेसे इनकार नहीं कर सकता; फिर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले साक्षात् भगवान् विष्णु (वासुदेव) मेरे यज्ञमें पधारें और किं पुनर्वासुदेवस्य आगतस्य तु शार्ङ्गिणः। त्वया विघ्नो न कर्तव्यो वामनेऽत्रागते द्विज ॥ २६ मैं उनकी मुँहमाँगी वस्तु उन्हें देनेसे इनकार कर दूँ, यह कैसे सम्भव होगा? ब्राह्मणदेव! यहाँ भगवान् वामनके पदार्पण करनेपर आप उनके कार्यमें विघ्न न डालियेगा। यद्यद्द्रव्यं प्रार्थयते तत्तद्द्रव्यं ददाम्यहम्। वे जो-जो द्रव्य माँगेंगे, वही-वही मैं उन्हें दूँगा। मुनिश्रेष्ठ! कृतार्थोऽहं मुनिश्रेष्ठ यद्यागच्छति वामनः ॥ २७ यदि सचमुच ही यहाँ भगवान् वामन पधार रहे हैं तो मैं कृतार्थ हो गया' ॥ २३-२७॥ इत्येवं वदतस्तस्य यज्ञशालां स वामनः । राजा बलि जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय आगत्य प्रविवेशाथ प्रशंसंस बलेर्मखम् ॥ २८ वामनजीने आकर यज्ञशालामें प्रवेश किया और वे उनके उस यज्ञकी प्रशंसा करने लगे। राजन् ! उन्हें देखते तं दृष्ट्वा सहसा राजन् राजा दैत्याधिपो बलिः । ही दैत्याधिपति राजा बलिने सहसा उठकर पूजन- उपचारेण सम्पूज्य वाक्यमेतदुवाच ह॥ २९ सामग्रियोंसे उनकी पूजा की, फिर इस प्रकार कहा— 'देवदेव! आप धन आदि जो-जो वस्तु माँगेंगे, वह सब यद्यत्प्रार्थयसे मां त्वं देवदेव धनादिकम्। तत्सर्वं तव दास्यामि मां याचस्वाद्य वामन ॥ ३० मैं आपको दूँगा; इसलिये वामनजी! आज आप मुझसे याचना कीजिये' ॥ २८-३०॥ इत्युक्तो वामनस्तत्र नृपेन्द्र बलिना तदा । 'नृपेन्द्र! बलिके यों कहनेपर उस समय देवेश्वर भगवान् वामनने उनसे यही याचना की कि मुझे याचयामास देवेशो भूमेर्देहि पदत्रयम् ॥ ३१ अग्निशालाके लिये केवल तीन पग भूमि दीजिये, मुझे धनकी आवश्यकता नहीं है' ॥ ३११/२॥ ममाग्निशरणार्थाय न मेऽर्थेऽस्ति प्रयोजनम्। इत्युक्तो वामनेनाथ बलिः प्राह च वामनम् ॥ ३२ भगवान् वामनके यों कहनेपर बलिने उनसे कहा— 'यदि तीन पग भूमिसे ही आपको संतोष है तो तीन पदत्रयेण चेत्तृप्तिर्मया दत्तं पदत्रयम्। पग भूमि मैंने आपको दे दी' ॥ ३२१/२॥ एवमुक्ते तु बलिना वामनो बलिमब्रवीत् ॥ ३३ बलिके द्वारा यों कहे जानेपर भगवान् वामन उनसे बोले—'यदि आपने मुझे तीन पग भूमि दे दी तो मेरे दीयतां मे करे तोयं यदि दत्तं पदत्रयम्। हाथमें संकल्पका जल दीजिये' ॥ ३३१/२॥ इत्युक्तो देवदेवेन तदा तत्र स्वयं बलिः ॥ ३४ कहते हैं, उस समय वहाँ देवदेव भगवान् वामनजीके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth