संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६ छियालीसवाँ अध्याय परशुरामावतारकी कथा
मार्कण्डेय उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रादुर्भावं हरेः शुभम्। जामदग्न्यं पुरा येन क्षत्रमुत्सादिंतं शृणु॥ १ पुरा देवगणैर्विष्णुः स्तुतः क्षीरोदधौ नृप। ऋषिभिश्च महाभागैर्जमदग्नेः सुतोऽभवत्॥ २ परशुराम इति ख्यातः सर्वलोकेषु स प्रभुः। दुष्टानां निग्रहं कर्तुमवतीर्णो महीतले॥ ३ कृतवीर्यसुतः श्रीमान् कार्तवीर्योऽभवत् पुरा। दत्तात्रेयं समाराध्य चक्रवर्त्तित्वमाप्तवान्॥ ४ स कदाचिन्महाभागो जमदग्न्याश्रमं ययौ। जमदग्निस्तु तं दृष्ट्वा चतुरङ्गबलान्वितम्॥ ५ उवाच मधुरं वाक्यं कार्तवीर्यं नृपोत्तमम्। मुच्यतामत्र ते सेना अतिथित्वं समागतः। वन्यादिकं मया दत्तं भुक्त्वा गच्छ महामते॥ ६ प्रमुच्य सेनां मुनिवाक्यगौरवात् स्थितो नृपस्तत्र महानुभावः। आमन्त्र्य राजानमलङ्घ्यकीर्ति- र्मुनिः स धेनुं च दुदोह दोग्ध्रीम्॥ ७ हस्त्यश्वशाला विविधा नराणां गृहाणि चित्राणि च तोरणानि। सामन्तयोग्यानि शुभानि राजन् समिच्छतां यानि सुकाननानि॥ ८ गृहं वरिष्ठं बहुभूमिकं पुनः समन्वितं साधुगुणैरुपस्करैः। दुग्ध्वा प्रकल्पन् मुनिराह पार्थिवं गृहं कृतं ते प्रविशेह राजन्॥ ९ इमे च मन्त्रिप्रवरा जनास्ते गृहेषु दिव्येषु विशन्तु शीघ्रम्। हस्त्यश्वजात्यश्च विशन्तु शालां भृत्याश्च नीचेषु गृहेषु सन्तु॥ १०
मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! अब मैं भगवान् विष्णुके जामदग्न्य (परशुराम) नामक शुभ अवतारका वर्णन करता हूँ, जिसने पूर्वकालमें क्षत्रियवंशका उच्छेद किया था; उस प्रसङ्गको सुनो॥ १॥ नरेश्वर! पहलेकी बात है, क्षीरसागरके तटपर देवताओं और महाभाग ऋषियोंने भगवान् विष्णुकी स्तुति की; इससे वे जमदग्नि मुनिके पुत्रके रूपमें अवतीर्ण हुए। वे भगवान् सम्पूर्ण लोकोंमें 'परशुराम' नामसे विख्यात थे और दुष्ट राजाओंका नाश करनेके लिये ही इस भूतलपर अवतीर्ण हुए थे। उनके अवतारसे पूर्व राजा कृतवीर्यका पुत्र 'कार्तवीर्य' हुआ था, जिसने दत्तात्रेयजीकी आराधना करके सार्वभौम राज्य प्राप्त कर लिया था। एक समय वह महाभाग नरेश जमदग्नि ऋषिके आश्रमपर गया। उसके साथ चतुरङ्गिणी सेना थी। उस राजाको चतुरङ्गिणी सेनाके साथ आश्रमपर आया देख जमदग्निने नृपवर कार्तवीर्यसे मधुर वाणीमें कहा—'महामते! आप मेरे अतिथि होकर यहाँ पधारे हैं; अतः आज अपनी सेनाका पड़ाव यहीं डालिये और मेरे दिये हुए वन्य फल आदिका भोजन करके कल यहाँसे जाइयेगा' ॥ २–६॥ महानुभाव राजा कार्तवीर्य मुनिके वाक्यका गौरव मानकर अपनी सेनाको वहीं ठहरनेका आदेश दे वहाँ रह गया। इधर अलङ्घ्य यशवाले मुनिने राजाको आमन्त्रित करके अपनी कामधेनु गौका दोहन किया। राजन्! उन्होंने अनेकानेक गजशाला, अश्वशाला, मनुष्योंके रहनेयोग्य विचित्र गृह और तोरण (द्वार) आदिका दोहन किया। सामन्त नरेशोंके रहनेयोग्य सुन्दर भवन, जिनमें बगीचे आदिकी इच्छा रखनेवालोंके लिये सुन्दर उद्यान थे, दोहनद्वारा प्रस्तुत किये। फिर अनेक मंजिलोंका श्रेष्ठ महल, जिसमें सुन्दर एवं उपयोगी सामान संचित थे, गोदोहनके द्वारा उपलब्ध करके मुनिने भूपालसे कहा—'राजन्! आपके लिये महल तैयार है। आप इसमें प्रवेश कीजिये। आपके ये श्रेष्ठ मन्त्री तथा और लोग भी शीघ्र ही इन दिव्य गृहोंमें प्रवेश करें। विभिन्न जातियोंके हाथी और घोड़े आदि भी गजशाला और अश्वशालामें रहें तथा भृत्यगण भी इन छोटे घरोंमें निवास करें' ॥ ७–१०॥
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