संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ
पृष्ठ 180, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 180
अध्याय ४६ ] परशुरामावतारकी कथा १६९
इत्युक्तमात्रे मुनिना नृपोऽसौ मुनिके इस प्रकार कहते ही राजा कार्तवीर्यने उस गृहं वरिष्ठं प्रविवेश राजा। उत्तम गृहमें प्रवेश किया। फिर दूसरे लोग दूसरे-दूसरे अन्येषु चान्येषु गृहेषु सत्सु गृहोंमें प्रविष्ट हुए। इस प्रकार सबके यथास्थान स्थित मुनिः पुनः पार्थिवमाबभाषे॥ ११ हो जानेपर मुनिने पुनः राजा कार्तवीर्यसे कहा—'नरेश्वर! आपको स्नान करानेके लिये मैंने इन सौ उत्तम स्त्रियोंको स्नानप्रदानार्थमिदं मया ते नियत किया है। जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्र अप्सराओंके प्रकल्पितं स्त्रीशतमुत्तमं नृप। नृत्य-गीत सुनते हुए स्नान करते हैं, उसी प्रकार आप स्नाहि त्वमद्यात्र यथाप्रकामं भी इन स्त्रियोंके नृत्य-गीतसे आनन्दित हो इच्छानुसार यथा सुरेन्द्रो दिवि नृत्यगीतैः॥ १२ स्नान कीजिये'॥ ११-१२॥ स स्नातवांस्तत्र सुरेन्द्रवन्नृपो भूप! (मुनिकी आज्ञासे) वहाँ राजा कार्तवीर्यने गीत्यादिशब्दैर्मधुरैश्च वाद्यैः। इन्द्रकी भाँति मधुर वाद्यों और गीत आदिके शब्दोंसे स्नातस्य तस्याशु शुभे च वस्त्रे आनन्दित होते हुए स्नान किया। स्नान कर लेनेपर मुनिने ददौ मुनिर्भूप विभूषिते द्वे॥ १३ उन्हें दो सुन्दर सुशोभित वस्त्र दिये। धौतवस्त्र पहन और ऊपरसे चादर ओढ़कर राजाने नित्य-नियम करनेके परिधाय वस्त्रं च कृतोत्तरीयः बाद भगवान् विष्णुकी पूजा की। फिर उन मुनिवरने कृतक्रियो विष्णुपूजां चकार। गौसे अन्नमय महान् पर्वतका दोहन करके राजा तथा मुनिश्च दुग्ध्वान्नमयं महागिरिं राजसेवकवृन्दको अर्पित किया। नृप! राजा तथा उनके नृपाय भृत्याय च दत्तवानसौ॥ १४ भृत्यगणोंने जबतक भोजनका कार्य सम्पन्न किया, तबतक सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। तब उन्होंने रातको भी यावत्स राजा बुभुजे सभृत्य- मुनिके बनाये हुए उस भवनमें गीत आदि विनोदोंसे स्तावच्च सूर्यो गतवान् नृपास्तम्। आनन्दित हो शयन किया॥ १३-१५॥ रात्रौ च गीतादिविनोदयुक्तः शेते स राजा मुनिनिर्मिते गृहे॥ १५ तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल होते ही स्वप्नमें मिली ततः प्रभाते विमले स्वप्नलब्धमिवाभवत्। हुई सम्पत्तिके समान सब कुछ लुप्त हो गया। फिर वहाँ भूमिभागं ततः कंचिद् दृष्ट्वासौ चिन्तयन्नृपः॥ १६ केवल कोई भूभागमात्र ही अवशिष्ट देख राजाने मन- ही-मन विचार किया और अपने पुरोहितसे पूछा— किमियं तपसः शक्तिर्मुनेरस्य महात्मनः। 'महाभाग पुरोहितजी! यह महात्मा जमदग्नि मुनिके सुरभ्या वा महाभाग ब्रूहि मे त्वं पुरोहित॥ १७ तपकी शक्ति थी या कामधेनु गौकी? इसे आप मुझे बताइये।' कार्तवीर्यके इस प्रकार पूछनेपर पुरोहितने इत्युक्तः कार्तवीर्येण तमुवाच पुरोहितः। उससे कहा—'राजन्! मुनिमें भी सामर्थ्य है, परंतु यह मुनेः सामर्थ्यमप्यस्ति सिद्धिश्चेयं हि गोर्नृप॥ १८ सिद्धि तो गौकी ही थी। तो भी नरेश्वर! आप लोभवश उस गौका अपहरण न करें; क्योंकि जो उसे हर लेनेकी तथापि सा न हर्तव्या त्वया लोभान्नराधिप। इच्छा करता है, उसका निश्चय ही विनाश हो जाता यस्त्वेतां हर्तुमिच्छेद वै तस्य नाशो ध्रुवं भवेत्॥ १९ है'॥ १६-१९॥
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