भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 318 में से

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पृष्ठ 181

१७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६ अथ मन्त्रिवरः प्राह ब्राह्मणो ब्राह्मणप्रियः। | यह सुनकर राजाके प्रधान मन्त्रीने कहा—'महाराज! राजकार्यं न पश्येद् वै स्वपक्षस्यैव पोषणात्॥ २० | ब्राह्मण ब्राह्मणका ही प्रेमी होता है, वह अपने पक्षका | पोषण करनेके कारण राजाके कार्यकी कोई परवाह नहीं हे राजंस्त्वयि तिष्ठन्ति गृहाणि विविधानि च। | करता। राजन् ! उस गौको पाकर आपके पास तत्काल तथा सुवर्णपात्राणि शयनादीनि च स्त्रियः॥ २१ | गुप्त हो जानेवाले नाना प्रकारके घर, सोनेके पात्र, | शय्यादि तथा सुन्दरी स्त्रियाँ—ये सब सामान प्रस्तुत तां धेनुं प्राप्य राजेन्द्र लीयमानानि तत्क्षणात्। | रहेंगे, जिन्हें हम लोगोंने वहाँ प्रत्यक्ष देखा है। इस उत्तम अस्माभिस्तत्र दृष्टानि नीयतां धेनुरुत्तमा॥ २२ | धेनुको आप अवश्य ले चलें। महामते राजेन्द्र! यह गौ | आपके ही योग्य है। भूपाल! यदि आपकी इच्छा हो तवेयं योग्या राजेन्द्र यदीच्छसि महामते। | तो मैं स्वयं जाकर इसे ले आऊँगा। आप केवल मुझे गत्वाहमानयिष्यामि आज्ञां मे देहि भूभुज॥ २३ | आज्ञा दीजिये'॥ २०—२३॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा राजा तथेत्याह नृपोत्तम। | नृपवर! मन्त्रीके इस प्रकार कहनेपर राजाने 'बहुत सचिवस्तत्र गत्वाथ सुरभिं हर्तुमारभत्॥ २४ | अच्छा' कहकर अनुमति दे दी। फिर राजमन्त्री आश्रमपर | जाकर गौका अपहरण करने लगा। तब जमदग्नि मुनिने वारयामास सचिवं जमदग्निः समन्ततः। | उसे सब ओरसे मना किया, किंतु उसने उनकी बात न राजयोग्यामिमां ब्रह्मन् देहि राज्ञे महामते॥ २५ | मानते हुए कहा—'महाबुद्धिमान् ब्राह्मण! यह गौ राजाके | योग्य है; अतः इसे राजाको ही दे दीजिये। आप तो साग त्वं तु शाकफलाहारी किं धेन्वा ते प्रयोजनम्। | और फल खानेवाले हैं; आपको इस गायसे क्या काम इत्युक्त्वा तां बलाद्धृत्वा नेतुं मन्त्री प्रचक्रमे॥ २६ | है?' यों कहकर मन्त्री उस गौको बलपूर्वक ले जाने | लगा। राजन्! तब उस मुनिने स्त्रीसहित आकर उसे पुनः पुनः सभार्यः स मुनिर्वारयामास तं नृपम्। | रोका। इसपर उस दुष्टात्मा और ब्रह्महत्यारे मन्त्रीने उस ततो मन्त्री सुदुष्टात्मा मुनिं हत्वा तु तं नृप॥ २७ | मुनिका वध करके गौको ज्यों ही ले जाना चाहा, त्यों | ही वह दिव्य गौ आकाशमार्गसे चली गयी और राजा ब्रह्महा नेतुमारेभे वायुमार्गेण सा गता। | मन-ही-मन क्षुब्ध होकर माहिष्मती नगरीको लौट राजा च क्षुब्धहृदयो ययौ माहिष्मतीं पुरीम्॥ २८ | आया॥ २४—२८॥ मुनिपत्नी सुदुःखार्ता रोदयन्ती भृशं तदा। | राजन्! उस समय मुनिकी पत्नी दुःखसे पीडित त्रिस्सप्तकृत्वः स्वां कुक्षिं ताडयामास पार्थिव॥ २९ | होकर अत्यन्त विलाप करने लगी और प्राण त्याग देनेकी | इच्छासे अपनी कुक्षि (उदर) में उसने इक्कीस बार तच्छृण्वन्नागतो रामो गृहीतपरशुस्तदा। | मुक्का मारा। माताका विलाप सुनकर परशुरामजी वनसे पुष्पादीनि गृहीत्वा तु वनान्मातरमब्रवीत्॥ ३० | फूल आदि लेकर हाथमें कुल्हाड़ी लिये उसी समय आये | और मातासे बोले—'मा! इस प्रकार छाती पीटनेकी अलमम्ब प्रहारेण निमित्ताद् विदितं मया। | आवश्यकता नहीं है। मैं सब कुछ शकुनसे जान गया हूँ। हनिष्यामि दुराचारमर्जुनं दुष्टमन्त्रिणम्॥ ३१ | उस दुष्ट मन्त्रीवाले दुराचारी राजा अर्जुनका मैं अवश्य वध | करूँगा। मातः! चूँकि तुमने अपनी कुक्षिमें इक्कीस बार त्वयैकविंशवारेण यस्मात्कुक्षिश्च ताडिता। | प्रहार किया है, इसलिये मैं इस भूमण्डलके क्षत्रियोंका त्रिस्सप्तकृत्वस्तस्मात्तु हनिष्ये भुवि पार्थिवान्॥ ३२ | इक्कीस बार संहार करूँगा'॥ २९—३२॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth