भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 318 में से

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अध्याय ४७ ] श्रीरामवावतारकी कथा — श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७१ इति कृत्वा प्रतिज्ञां स गृहीत्वा परशुं ययौ । | इस प्रकार प्रतिज्ञा करके फरसा लेकर वे वहाँसे माहिष्मतीं पुरीं प्राप्य कार्तवीर्यमथाह्वयत् ॥ ३३ | चल दिये और माहिष्मती पुरीमें जाकर उन्होंने राजा युद्धार्थमागतः सोऽथ अनेकाक्षौहिणीयुतः । | कार्तवीर्य अर्जुनको ललकारा। तब वह अनेक अक्षौहिणी तयोर्युद्धमभूत्तत्र भैरवं लोमहर्षणम् ॥ ३४ | सेनाके साथ युद्धके लिये आया। वहाँ उन दोनोंमें पिशिताशिजनानन्दं शस्त्रास्त्रशतसंकुलम् । | महाभयानक रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ, जो सैकड़ों अस्त्र- ततः परशुरामोऽभून्महाबलपराक्रमः ॥ ३५ | शस्त्रोंके प्रहारसे व्याप्त तथा मांस खानेवाले प्राणियोंको परं ज्योतिरचिन्त्यात्मा विष्णुः कारणमूर्तिमान् । | आनन्द देनेवाला था। उस समय परशुरामजी अपनेमें कार्तवीर्यबलं सर्वमनेकैकः क्षत्रियैः सह ॥ ३६ | अचिन्त्यस्वरूप, परम ज्योतिर्मय, कारणमूर्ति भगवान् हत्वा निपात्य भूमौ तु परमाद्भुतविक्रमः । | विष्णुकी भावना करके महान् बल और पराक्रमसे कार्तवीर्यस्य बाहूनां वनं चिच्छेद रोषवान् । | सम्पन्न हो गये। उन्होंने परम आश्चर्यमय पौरुष प्रकट छिन्ने बाहुवने तस्य शिरश्चिच्छेद भार्गवः ॥ ३७ | करते हुए कार्तवीर्यकी असंख्य क्षत्रियोंसे युक्त सम्पूर्ण विष्णुहस्ताद्वधं प्राप्य चक्रवर्ती स पार्थिवः । | सेनाको मारकर भूमिपर गिरा दिया और रोषसे भरकर दिव्यरूपधरः श्रीमान् दिव्यगन्धानुलेपनः ॥ ३८ | कार्तवीर्यकी समस्त भुजाएँ काट डालीं। उसके बाहुवनका दिव्यं विमानमारुह्य विष्णुलोकमवासवान् । | उच्छेद हो जानेपर भृगुनन्दन परशुरामने उसका मस्तक क्रोधात्परशुरामोऽपि महाबलपराक्रमः ॥ ३९ | भी धड़से अलग कर दिया ॥ ३३-३७॥ त्रिसप्तकृत्वो भूम्यां वै पार्थिवान्निजघान सः । | इस प्रकार वह चक्रवर्ती राजा कार्तवीर्य श्रीभगवान् क्षत्रियाणां वधात्तेन भूमेर्भारोऽवतारितः ॥ ४० | विष्णुके हाथसे वधको प्राप्त होकर दिव्यरूप धारण करके, भूमिश्च सकला दत्ता कश्यपाय महात्मने । | श्रीसम्पन्न एवं दिव्य चन्दनोंसे अनुलिप्त होकर, दिव्य इत्येष जामदग्न्याख्यः प्रादुर्भावो मयोदितः ॥ ४१ | विमानपर आरूढ़ हो, विष्णुधामको प्राप्त हुआ। फिर यश्च तच्छृणुयाद्भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४२ | महान् बल और पराक्रमवाले परशुरामजीने भी इस पृथ्वीके अवतीर्य भूमौ हरिरेष साक्षात् | क्षत्रियोंका इक्कीस बार संहार किया। इस प्रकार क्षत्रियोंका त्रिसप्तकृत्वः क्षितिपान्निहत्य सः । | वध करके उन्होंने भूमिक भार उतारा और सम्पूर्ण पृथ्वी क्षात्रं च तेजो प्रविभज्य राजन् | महात्मा कश्यपजीको दान कर दी ॥ ३८-४० १/२ ॥ रामः स्थितोऽद्यापि गिरौ महेन्द्रे ॥ ४३ | इस प्रकार मैंने तुमसे यह 'जामदग्न्य' (परशुराम) नामक अवतारका वर्णन किया। जो भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजन्! इस तरह पृथ्वीपर अवतीर्ण होनेके बाद ये साक्षात् भगवान् विष्णुस्वरूप परशुरामजी इक्कीस बार क्षत्रियोंको मारकर, क्षत्रियतेजको छिन्न-भिन्न करके आज भी महेन्द्र पर्वतपर विराजमान हैं ॥ ४१-४३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे परशुरामप्रादुर्भावो नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'परशुरामावतार' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥ ━━━━━━━━━━━━━━━━ सैंतालीसवाँ अध्याय श्रीरामावतारकी कथा - श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र श्रीमार्कण्डेय उवाच | श्रीमार्कण्डेयजी बोले - राजन् ! अब मैं भगवान् शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि प्रादुर्भावं हरेः शुभम् । | विष्णुके उस शुभ अवतारका वर्णन करूँगा, जिसके द्वारा निहतो रावणो येन सगणो देवकण्टकः ॥ १ | देवताओंके लिये कण्टकस्वरूप रावण अपने गणोंसहित मारा गया। तुम [ध्यान देकर] सुनो ॥ १ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth