भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 318 में से

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पृष्ठ 183

१७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७ ब्रह्मणो मानसः पुत्रः पुलस्त्योऽभून्महामुनिः । तस्य वै विश्रवा नाम पुत्रोऽभूत्तस्य राक्षसः ॥ २ तस्माज्जातो महावीरो रावणो लोकरावणः । तपसा महता युक्तः स तु लोकानुपाद्रवत् ॥ ३ सेन्द्रा देवा जितास्तेन गन्धर्वाः किंनरास्तथा । यक्षाश्च दानवाश्चैव तेन राजन् विनिर्जिताः ॥ ४ स्त्रियश्चैव सुरूपिण्यो हृतास्तेन दुरात्मना । देवादीनां नृपश्रेष्ठ रत्नानि विविधानि च ॥ ५ रणे कुबेरं निर्जित्य रावणो बलदर्पितः । तत्पुरीं जगृहे लङ्कां विमानं चापि पुष्पकम् ॥ ६ तस्यां पुर्यां दशग्रीवो रक्षसामधिपोऽभवत् । पुत्राश्च बहवस्तस्य बभूवुरमितौजसः ॥ ७ राक्षसाश्च तमाश्रित्य महाबलपराक्रमाः । अनेककोटयो राजन् लङ्कायां निवसन्ति ये ॥ ८ देवान् पितॄन् मनुष्यांश्च विद्याधरगणानपि । यक्षांश्चैव ततः सर्वे घातयन्ति दिवानिशम् ॥ ९ संत्रस्तं तद्भयादेव जगदासीच्चराचरम् । दुःखाभिभूतमत्यर्थं सम्बभूव नराधिप ॥ १० एतस्मिन्नेव काले तु देवाः सेन्द्रा महर्षयः । सिद्धा विद्याधराश्चैव गन्धर्वाः किंनरास्तथा ॥ ११ गुह्यका भुजगा यक्षा ये चान्ये स्वर्गवासिनः । ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा शङ्करं च नराधिप ॥ १२ ते ययुर्हतविक्रान्ताः क्षीराब्धेस्तटमुत्तमम् । तत्राराध्य हरिं देवास्तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ १३ ब्रह्मा च विष्णुमाराध्य गन्धपुष्पादिभिः शुभैः । प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वासुदेवमथास्तुवत् ॥ १४ ब्रह्मोवाच नमः क्षीराब्धिवासाय नागपर्यङ्कशायिने । नमः श्रीकरसंस्पृष्टदिव्यपादाय विष्णवे ॥ १५ नमस्ते योगनिद्राय योगान्तर्भाविताय च । तार्क्ष्यासनाय देवाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ १६


[हिन्दी अनुवाद]

ब्रह्माजीके मानस पुत्र जो महामुनि पुलस्त्यजी हैं, उनके 'विश्रवा' नामक पुत्र हुआ। विश्रवाका पुत्र राक्षस रावण हुआ। समस्त लोकोंको रुलानेवाला महावीर रावण विश्रवासे ही उत्पन्न हुआ था। वह महान् तपसे युक्त होकर समस्त लोकोंपर धावा करने लगा। राजन्! उसने इन्द्रसहित समस्त देवताओं, गन्धर्वों और किंनरोंको जीत लिया तथा यक्षों और दानवोंको भी अपने वशीभूत कर लिया। नृपश्रेष्ठ! उस दुरात्माने देवता आदिकी सुन्दरी स्त्रियाँ और नाना प्रकारके रत्न भी हर लिये। बलाभिमानी रावणने युद्धमें कुबेरको जीतकर उनकी पुरी लङ्का और पुष्पक-विमानपर भी अधिकार जमा लिया॥ २—६॥

उस लङ्कापुरीमें दशमुख रावण राक्षसोंका राजा हुआ। उसके अनेक पुत्र उत्पन्न हुए, जो अपरिमित बलसे सम्पन्न थे। राजन्! लङ्कामें जो कई करोड़ महाबली और पराक्रमी राक्षस निवास करते थे, वे सभी रावणका सहारा लेकर देवता, पितर, मनुष्य, विद्याधर और यक्षोंका दिन-रात संहार किया करते थे। नराधिप! समस्त चराचर जगत् उसके भयसे भीत और अत्यन्त दुःखी हो गया था॥ ७—१०॥

नरेश! इसी समय जिनका पुरुषार्थ प्रतिहत हो गया था, वे इन्द्रसहित समस्त देवता, महर्षि, सिद्ध, विद्याधर, गन्धर्व, किंनर, गुह्यक, सर्प, यक्ष तथा जो अन्य स्वर्गवासी थे, वे ब्रह्मा और शङ्करजीको आगे करके क्षीरसागरके उत्तम तटपर गये। वहाँ उस समय देवतालोग भगवान्‌की आराधना करके हाथ जोड़कर खड़े हो गये। फिर ब्रह्माजीने गन्ध-पुष्प आदि सुन्दर उपचारोंद्वारा भगवान् वासुदेव विष्णुकी आराधना की और हाथ जोड़, प्रणाम करके वे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ११—१४॥

ब्रह्माजी बोले— जो क्षीरसागरमें निवास करते हैं, सर्पकी शय्यापर सोते हैं, जिनके दिव्य चरण भगवती श्रीलक्ष्मीजीके कर-कमलोंद्वारा सहलाये जाते हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। योग ही जिनकी निद्रा है, योगके द्वारा अन्तःकरणमें जिनका ध्यान किया जाता है और जो गरुड़जीके ऊपर आसीन होते हैं, उन आप भगवान् गोविन्दको नमस्कार है।