संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४७ ] श्रीरामावतारकी कथा—श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७३ नमः क्षीराब्धिकल्लोलस्पृष्टमात्राय शार्ङ्गिणे । क्षीरसागरकी लहरें जिनके शरीरका स्पर्श करती हैं, जो नमोऽरविन्दपादाय पद्मनाभाय विष्णवे ॥ १७ 'शार्ङ्ग' नामक धनुष धारण करते हैं, जिनके चरण कमलके समान हैं तथा जिनकी नाभिसे कमल प्रकट भक्तार्चितसुपादाय नमो योगप्रियाय वै । हुआ है, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जिनके सुन्दर शुभाङ्गाय सुनेत्राय माधवाय नमो नमः ॥ १८ चरण भक्तोंद्वारा पूजित हैं, जिन्हें योग प्रिय है तथा जिनके अङ्ग और नेत्र सुन्दर हैं, उन भगवान् लक्ष्मीपतिको सुकेशाय सुनेत्राय सुललाटाय चक्रिणे । बारंबार नमस्कार है। जिनके केश, नेत्र, ललाट, मुख और सुवक्त्राय सुकर्णाय श्रीधराय नमो नमः ॥ १९ कान बहुत ही सुन्दर हैं, उन चक्रपाणि भगवान् श्रीधरको सुवक्षसे सुनाभाय पद्मनाभाय वै नमः । प्रणाम है। जिनके वक्षःस्थल और नाभि मनोहर हैं, उन सुभ्रुवे चारुदेहाय चारुदन्ताय शार्ङ्गिणे ॥ २० भगवान् पद्मनाभको नमस्कार है। जिनकी भौंहें सुन्दर, शरीर मनोहर और दाँत उज्ज्वल हैं, उन भगवान् शार्ङ्गधन्वाको चारुजङ्घाय दिव्याय केशवाय नमो नमः । प्रणाम है। रुचिर पिंडलियोंवाले दिव्यरूपधारी भगवान् सुनखाय सुशान्ताय सुविद्याय गदाभृते ॥ २१ केशवको नमस्कार है। जो सुन्दर नखोंवाले, परमशान्त और सद्धिद्याओंके आश्रय हैं, उन भगवान् गदाधरको धर्मप्रियाय देवाय वामनाय नमो नमः । नमस्कार है। धर्मप्रिय भगवान् वामनको बारंबार प्रणाम है। असुरघ्नाय चोग्राय रक्षोघ्नाय नमो नमः ॥ २२ असुर और राक्षसोंके हन्ता उग्र (नृसिंह)-रूपधारी भगवान्को देवानामार्त्तिनाशाय भीमकर्मकृते नमः । नमस्कार है। देवताओंकी पीड़ा हरनेके लिये भयंकर कर्म नमस्ते लोकनाथाय रावणान्तकृते नमः ॥ २३ करनेवाले तथा रावणके संहारक आप भगवान् जगन्नाथको प्रणाम है॥ १५–२३॥ मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी कहते हैं—ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार इति स्तुतो हृषीकेशस्तुतोष परमेष्ठिना । स्तुति की जानेपर भगवान् हृषीकेश प्रसन्न हो गये और स्वरूपं दर्शयित्वा तु पितामहमुवाच ह ॥ २४ अपना स्वरूप प्रत्यक्ष दिखाकर वे भगवान् ब्रह्माजीसे किमर्थं तु सुरैः सार्धमागतस्त्वं पितामह । बोले—'पितामह ! तुम देवताओंके साथ किसलिये यहाँ यत्कार्यं ब्रूहि मे ब्रह्मन् यदर्थं संस्तुतस्त्वया ॥ २५ आये हो ? ब्रह्मन् ! जो कार्य आ पड़ा हो और जिसके लिये तुमने मेरी स्तुति की है, वह बताओ।' समस्त इत्युक्तो देवदेवेन विष्णुना प्रभविष्णुना । लोकोंको उत्पन्न करनेवाले भगवान् विष्णुके द्वारा इस सर्वदेवगणैः सार्धं ब्रह्मा प्राह जनार्दनम् ॥ २६ प्रकार प्रश्न किये जानेपर सम्पूर्ण देवगणोंके साथ विराजमान ब्रह्माजीने उन जनार्दनसे कहा ॥ २४-२६ ॥ ब्रह्मोवाच ब्रह्माजी बोले—विभो! दुरात्मा रावणने समस्त नाशितं तु जगत्सर्वं रावणेन दुरात्मना । जगत्में भीषण संहार मचा रखा है। उस राक्षसने इन्द्रसहित सेन्द्राः पराजितास्तेन बहुशो राक्षसा विभो ॥ २७ देवताओंको कई बार परास्त किया है। रावणके पार्श्ववर्ती राक्षसैर्भक्षिता मर्त्या यज्ञाश्चापि विदूषिताः । राक्षसोंने असंख्य मनुष्योंको खा लिया और उनके देवकन्या हृतास्तेन बलाच्छतसहस्रशः ॥ २८ यज्ञोंको दूषित कर दिया है। स्वयं रावणने सैकड़ों-हजारों देवकन्याओंका अपहरण किया है। कमलनयन ! चूँकि त्वामृते पुण्डरीकाक्ष रावणस्य वधं प्रति । आपको छोड़कर दूसरे देवता रावणका वध करनेमें समर्थ न समर्था यतो देवास्त्वमतस्तद्वधं कुरु ॥ २९ नहीं हैं, अतः आप ही उसका वध करें ॥ २७–२९ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth