संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१७४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७ इत्युक्तो ब्रह्मणा विष्णुर्ब्रह्माणमिदमब्रवीत्। ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर भगवान् विष्णु उनसे शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् यद्वदामि हितं वचः॥ ३० यों बोले—'ब्रह्मन्! मैं तुम लोगोंके हितके लिये जो बात कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। पृथ्वीपर सूर्यवंशमें सूर्यवंशोद्भवः श्रीमान् राजाऽऽसीद्भुवि वीर्यवान्। उत्पन्न श्रीमान् दशरथ नामसे प्रसिद्ध जो पराक्रमी राजा हैं, नाम्ना दशरथख्यातस्तस्य पुत्रो भवाम्यहम्॥ ३१ मैं उन्हींका पुत्र होऊँगा। सत्तम! रावणका वध करनेके रावणस्य वधार्थाय चतुर्धांशेन सत्तम। लिये मैं अंशतः चार स्वरूपोंमें प्रकट होऊँगा। विश्वस्रष्टा स्वांशैर्वानररूपेण सकला देवतागणाः॥ ३२ ब्रह्माजी! आप सभी देवताओंको आदेश दें कि वे अपने- वतार्यन्तां विश्वकर्तः स्यादेवं रावणक्षयः। अपने अंशसे वानररूपमें अवतीर्ण हों। इस प्रकार करनेसे ही रावणका संहार होगा।' देवदेव भगवान्के यों कहनेपर इत्युक्तो देवदेवेन ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ३३ लोकपितामह ब्रह्माजी तथा अन्य देवता उनको प्रणाम देवाश्च ते प्रणम्याथ मेरुपृष्ठं तदा ययुः। करके मेरुशिखरपर चले गये और पृथ्वीतलपर अपने- स्वांशैर्वानररूपेण अवतेरुश्च भूतले॥ ३४ अपने अंशसे वानररूपमें अवतीर्ण हुए॥ ३०-३४॥ अथापुत्रो दशरथो मुनिभिर्वेदपारगैः। तदनन्तर पुत्रहीन राजा दशरथने वेदके पारगामी इष्टिं तु कारयामास पुत्रप्राप्तिकरीं नृपः॥ ३५ मुनियोंद्वारा पुत्रकी प्राप्ति करानेवाले 'पुत्रेष्टि' नामक यज्ञका अनुष्ठान कराया। तब भगवान्की प्रेरणासे अग्निदेव ततः सौवर्णपात्रस्थं हविरादाय पायसम्। सुवर्णपात्रमें रखी हुई होमकी खीर हाथमें लिये कुण्डसे वह्निः कुण्डात् समुत्तस्थौ नूनं देवेन नोदितः॥ ३६ प्रकट हुए। मुनियोंने वह खीर ले ली और मन्त्र पढ़ते आदाय मुनयो मन्त्राच्चक्रुः पिण्डद्वयं शुभम्। हुए उसके दो सुन्दर पिण्ड बनाये। उन्हें मन्त्रसे अभिमन्त्रित दत्ते कौशल्याकैकेय्योर्द्वे पिण्डे मन्त्रमन्त्रिते॥ ३७ कर उन दोनों पिण्डोंको कौसल्या तथा कैकेयीके हाथमें दे दिया। महामते! पिण्ड-भोजनके समय उन ते पिण्डप्राशने काले सुमित्राया महामते। दोनों रानियोंने दोनों पिण्डोंमेंसे थोड़ा-थोड़ा निकालकर सौभाग्यवती सुमित्राको दे दिया। फिर उन तीनों रानियोंने पिण्डाभ्यामल्पमल्पं तु सुभागिन्याः प्रयच्छतः॥ ३८ विधिपूर्वक उन क्षीरपिण्डोंका भोजन किया। उन देवनिर्मित ततस्ताः प्राशयामासू राजपत्न्यो यथाविधि। पिण्डोंका भक्षण करनेके कारण उन सभी रानियोंने पिण्डान् देवकृतान् प्राश्य प्रापुर्गर्भाननिन्दितान्॥ ३९ उत्तम गर्भ धारण किये॥ ३५-३९॥ पृथ्वीनाथ! इस प्रकार भगवान् विष्णु लोकहितके एवं विष्णुर्दशरथाज्जातस्तत्पत्निषु त्रिषु। लिये ही राजा दशरथसे उनकी तीनों रानियोंके गर्भसे स्वांशैर्लोकहितायैव चतुर्धा जगतीपते॥ ४० अपने चार अंशोंद्वारा वे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नामक चार रूप धारण करके प्रकट हुए। मुनियोंद्वारा रामश्च लक्ष्मणश्चैव भरतः शत्रुघ्न एव च। जातकर्मादि संस्कार हो जानेपर वे मन्त्रयुक्त पिण्डके जातकर्मादिकं प्राप्य संस्कारं मुनिसंस्कृतम्॥ ४१ अनुसार दो-दो एक साथ रहते हुए सामान्य बालकोंकी मन्त्रपिण्डवशाद्योगं प्राप्य चेरुर्यथार्भकाः। भाँति विचरने लगे। इनमें राम और लक्ष्मण सदा एक साथ रहते थे। नरपाल! जातकर्मादि संस्कारोंसे सम्पन्न रामश्च लक्ष्मणश्चैव सह नित्यं विचेरतुः॥ ४२ हो, वे दोनों महान् शक्तिशाली भाई पिताकी प्रसन्नता जन्मादिकृतसंस्कारौ पितुः प्रीतिकरौ नृप। बढ़ाते हुए बढ़ने लगे। उनके शुभ लक्षण अश्रुतपूर्व एवं ववृधाते महावीर्यौ श्रुतिशब्दातिलक्षणौ॥ ४३ वर्णनातीत थे। अथवा वे वेद और व्याकरणादि शास्त्रोंमें पारंगत होनेके शुभलक्षणसे सुशोभित थे। राजन्! भरतः कैकयो राजन् भ्रात्रा सह गृहेऽवसत्। कैकेयीनन्दन भरत अपने अनुज शत्रुघ्नके साथ प्रायः घरपर ही रहते थे। नृपोत्तम! उन्होंने वेदशास्त्र और वेदशास्त्राणि बुबुधे शस्त्रशास्त्रं नृपोत्तम॥ ४४ अस्त्रविद्या भी सीख ली थी॥ ४०-४४॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth