भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 318 में से

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पृष्ठ 186

अध्याय ४७] श्रीरामावतारकी कथा — श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७५ एतस्मिन्नेव काले तु विश्वामित्रो महातपाः । इन्हीं दिनों महातपस्वी विश्वामित्रजीने यज्ञविधिसे यागेन यष्टुमारेभे विधिना मधुसूदनम् ॥ ४५ भगवान् मधुसूदनका यजन आरम्भ किया। परंतु पहले स तु विघ्नेन यागोऽभूद्राक्षसैर्बहुशः पुरा। उस यज्ञमें बहुत बार राक्षसोंद्वारा विघ्न डाला गया था, नेतुं स यागरक्षार्थं सम्प्राप्तो रामलक्ष्मणौ ॥ ४६ नृपश्रेष्ठ! इसलिये इस बार विश्वामित्रजी यज्ञकी रक्षाके विश्वामित्रो नृपश्रेष्ठ तत्पितुर्मन्दिरं शुभम्। लिये राम तथा लक्ष्मणको ले जानेके निमित्त उनके दशरथस्तु तं दृष्ट्वा प्रत्युत्थाय महामतिः ॥ ४७ पिताके सुन्दर महलमें आये। महाबुद्धिमान् दशरथजी अर्घ्यपाद्यादि विधिना विश्वामित्रमपूजयत्। उन्हें देखकर उठ खड़े हुए और अर्घ्य-पाद्यादि उपचारोंद्वारा स पूजितो मुनिः प्राह राजानं राजसंनिधौ ॥ ४८ उन्होंने विधिवत् उनकी पूजा की। इस प्रकार उनके शृणु राजन् दशरथ यदर्थमहमागतः । द्वारा सम्मानित हो, मुनिने अन्य राजाओंके निकट विराजमान तत्कार्यं नृपशार्दूल कथयामि तवाग्रतः ॥ ४९ राजा दशरथसे कहा—'राजसिंह महाराज दशरथ ! सुनो— राक्षसैर्नाशितो यागो बहुशो मे दुरासदैः । मैं जिस कार्यके लिये आया हूँ, वह तुम्हारे सामने यज्ञस्य रक्षणार्थं मे देहि त्वं रामलक्ष्मणौ ॥ ५० निवेदन करता हूँ। मेरे यज्ञको दुर्धर्ष राक्षसोंने अनेक बार नष्ट किया है; अतः उसकी रक्षाके लिये तुम राम और लक्ष्मणको मुझे दे दो' ॥ ४५–५०॥ राजा दशरथः श्रुत्वा विश्वामित्रवचो नृप । नरेश्वर! विश्वामित्रजीकी बात सुननेपर राजा दशरथ- विषण्णवदनो भूत्वा विश्वामित्रमुवाच ह ॥ ५१ के मुखपर विषाद छा गया। वे उनसे बोले—'भगवन् ! बालाभ्यां मम पुत्राभ्यां किं ते कार्यं भविष्यति । मेरे ये दोनों पुत्र अभी बालक हैं। इनसे आपका कौन- अहं त्वया सहागत्य शक्त्या रक्षामि ते मखम् ॥ ५२ सा कार्य सिद्ध होगा? मैं स्वयं आपके साथ चलकर राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा राजानं मुनिरब्रवीत् । यथाशक्ति यज्ञकी रक्षा करूँगा।' राजाकी बात सुनकर रामोऽपि शक्नुते नूनं सर्वान्नाशयितुं नृप ॥ ५३ मुनि उनसे बोले—'नरपाल ! राम भी उन सब राक्षसोंका रामेणैव हि ते शक्या न त्वया राक्षसा नृप। नाश कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं है। सच तो यह अतो मे देहि रामं च न चिन्तां कर्तुमर्हसि ॥ ५४ है कि रामके द्वारा ही वे राक्षस मारे जा सकते हैं, तुम्हारे द्वारा नहीं; अतः राजन् ! तुम्हें रामको ही मुझे दे देना चाहिये और किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये' ॥ ५१–५४॥ इत्युक्तो मुनिना तेन विश्वामित्रेण धीमता । बुद्धिमान् विश्वामित्रमुनिके द्वारा यों कहे जानेपर तूष्णीं स्थित्वा क्षणं राजा मुनिवर्यमुवाच ह ॥ ५५ राजा क्षणभरके लिये चुप हो गये और फिर उन यद्ब्रवीमि मुनिश्रेष्ठ प्रसन्नस्त्वं निबोध मे । मुनीश्वरसे बोले—'मुनिश्रेष्ठ! मैं जो कह रहा हूँ, उसे राजीवलोचनं राममहं दास्ये सहानुजम् ॥ ५६ आप प्रसन्नतापूर्वक सुनें। मैं कमललोचन रामको लक्ष्मणके किं त्वस्य जननी ब्रह्मन् अदृष्टैनं मरिष्यति । सहित आपको दे तो दूँगा, परंतु ब्रह्मन्! इनकी माता अतोऽहं चतुरङ्गेण बलेन सहितो मुने ॥ ५७ इन्हें देखे बिना मर जायगी। इसलिये मुने! मेरा ऐसा आगत्य राक्षसान् हन्मीत्येवं मे मनसि स्थितम् । विचार है कि मैं स्वयं ही चतुरङ्गिणी सेनाके साथ चलकर सब राक्षसोंका वध करूँ' ॥ ५५–५७१/२॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

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