संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 318 में से
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अध्याय ४७ ] | श्रीरामावतारकी कथा — श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र | १७७
(संस्कृत श्लोक - वाम स्तम्भ)
मुनिधार्मिकसिद्धांश्च पश्यन्तौ रामलक्ष्मणौ। ऋषिभ्यश्च वरान् प्राप्य तेन नीतौ नृपात्मजौ ॥ ७४ ताटकाया वनं घोरं मृत्योर्मुखमिवापरम्। गते तत्र नृपश्रेष्ठ विश्वामित्रो महातपाः ॥ ७५ राममक्लिष्टकर्माणमिदं वचनमब्रवीत्। राम राम महाबाहो ताटका नाम राक्षसी ॥ ७६ रावणस्य नियोगेन वसत्यस्मिन् महावने। तया मनुष्या बहवो मुनिपुत्रा मृगास्तथा ॥ ७७ निहता भक्षिताश्चैव तस्मात्तां वध सत्तम। इत्येवमुक्तो मुनिना रामस्तं मुनिमब्रवीत् ॥ ७८ कथं हि स्त्रीवधं कुर्यामहमद्य महामुने। स्त्रीवधे तु महापापं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७९ इति रामवचः श्रुत्वा विश्वामित्र उवाच तम्। तस्यास्तु निधनाद्राम जनाः सर्वे निराकुलाः ॥ ८० भवन्ति सततं तस्मात् तस्याः पुण्यप्रदो वधः। इत्येवं वादिनि मुनौ विश्वामित्रे निशाचरी ॥ ८१ आगता सुमहाघोरा ताटका विवृतानना। मुनिना प्रेरितो रामस्तां दृष्ट्वा विवृताननाम् ॥ ८२ उद्यतैकभुजयष्टिमायतीं श्रोणिलम्बिपुरुषान्त्रमेखलाम् । तां विलोक्य वनितावधे घृणां पन्त्रिणा सह मुमोच राघवः ॥ ८३ शरं संधाय वेगेन तेन तस्या उरःस्थलम्। विपाटितं द्विधा राजन् सा पपात ममार च ॥ ८४ घातयित्वा तु तामेवं तावानीय मुनिस्तु तौ। प्रापयामास तं तत्र नानाऋषिनिषेवितम् ॥ ८५ नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्। नानानिर्झरतोयाढ्यं विन्ध्यशैलान्तरस्थितम् ॥ ८६ शाकमूलफलोपेतं दिव्यं सिद्धाश्रमं स्वकम्। रक्षार्थं तावुभौ स्थाप्य शिक्षयित्वा विशेषतः ॥ ८७
(हिन्दी अनुवाद - दक्षिण स्तम्भ)
मार्गमें मुनियों, धर्मात्माओं और सिद्धोंका दर्शन करते हुए तथा ऋषियोंसे वर प्राप्तकर, राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्रजीके द्वारा उस ताड़कावनमें ले जाये गये, जो यमराजके दूसरे मुखके समान भयंकर था। नृपश्रेष्ठ ! वहाँ पहुँचकर महातपस्वी विश्वामित्रने अनायास ही महान् कर्म करनेवाले रामसे कहा—'महाबाहो राम ! इस महान् वनमें रावणकी आज्ञासे 'ताड़का' नामकी एक राक्षसी रहती है। उसने बहुत-से मनुष्यों, मुनिपुत्रों और मृगोंको मारकर अपना आहार बना लिया है; अतः सत्तम ! तुम उसका वध करो' ॥ ७४-७७ १/२ ॥
मुनिवर विश्वामित्रके इस प्रकार कहनेपर रामने उनसे कहा—'महामुने ! आज मैं स्त्रीका वध कैसे करूँ? क्योंकि बुद्धिमान् लोग स्त्रीवधमें महान् पाप बतलाते हैं।' श्रीरामकी यह बात सुनकर विश्वामित्रने उनसे कहा—'राम! उस ताड़काको मारनेसे सभी मनुष्य सदाके लिये निर्भय हो जायँगे, इसलिये उसका वध करना तो पुण्यदायक है' ॥ ७८-८० १/२ ॥
मुनिवर विश्वामित्र इस प्रकार कह ही रहे थे कि वह महाघोर राक्षसी ताड़का मुँह फैलाये वहाँ आ पहुँची। तब मुनिकी प्रेरणासे रामने उसकी ओर देखा। वह मुँह बाये आ रही थी। उसकी छड़ी-सरीखी एक बाँह ऊपरकी ओर उठी थी। कटिप्रदेशमें मेखला (करधनी)-की जगह लिपटी हुई मनुष्यकी अँतड़ी लटक रही थी। इस रूपमें आती हुई उस निशाचरीको देखकर श्रीरामने स्त्रीवधके प्रति होनेवाली घृणा और बाणको एक साथ ही छोड़ दिया। राजन्! उन्होंने धनुषपर बाण रखकर उसे बड़े वेगसे छोड़ा। उस बाणने ताड़काकी छातीके दो टुकड़े कर दिये। फिर तो वह धरतीपर गिरी और मर गयी ॥ ८१-८४ ॥
इस प्रकार ताड़काका वध करवाकर मुनि श्रीराम और लक्ष्मण दोनोंको अपने उस दिव्य सिद्धाश्रमपर ले आये, जो बहुत-से मुनियोंद्वारा सेवित था। वह आश्रम विन्ध्य पर्वतकी मध्यवर्तिनी उपत्यकामें विद्यमान था। वहाँ नाना प्रकारके वृक्ष और लतासमूह फैले हुए थे और भाँति-भाँतिके पुष्प उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह आश्रम अनेकानेक झरनोंके जलसे सुशोभित तथा शाक एवं मूल-फलादिसे सम्पन्न था। वहाँ उन दोनों राजकुमारोंको विशेषरूपसे शिक्षा देकर मुनिने उनको यज्ञकी रक्षाके लिये नियुक्त कर दिया।
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