भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 318 में से

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पृष्ठ 189

१७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७ ततश्चारब्धवान् यागं विश्वामित्रो महातपाः। | तदनन्तर महान् तपस्वी विश्वामित्रने यज्ञ आरम्भ दीक्षां प्रविष्टे च मुनौ विश्वामित्रे महात्मनि ॥ ८८ | किया॥ ८५-८७१/२ ॥ | महात्मा विश्वामित्र ज्यों-ही यज्ञकी दीक्षामें प्रविष्ट हुए, यज्ञे तु वितते तत्र कर्म कुर्वन्ति ऋत्विजः। | उस यज्ञका कार्य चालू हो गया। उसमें ऋत्विज्गण मारीचश्च सुबाहुश्च बहवश्चान्यराक्षसाः ॥ ८९ | अपना-अपना कार्य करने लगे। तब रावणके द्वारा नियुक्त | मारीच, सुबाहु तथा अन्य बहुत-से राक्षसगण यज्ञ नष्ट आगता यागनाशाय रावणेन नियोजिताः। | करनेके लिये वहाँ आये। उन सबको वहाँ आया जान तानागतान् स विज्ञाय रामः कमललोचनः ॥ ९० | कमलनयन श्रीरामने बाण मारकर 'सुबाहु' नामक राक्षसको | तो धराशायी कर दिया। वह अपने शरीरसे रक्तकी वर्षा- शरेण पातयामास सुबाहुं धरणीतले। | सी करने लगा। इसके बाद 'भल्ल' नामक बाणका प्रहार असृक्प्रवाहं वर्षन्तं मारीचं भल्लकेन तु ॥ ९१ | करके श्रीरामने मारीचको उसी तरह समुद्रके तटपर फेंक | दिया, जैसे वायु पत्तेको उड़ाकर दूर फेंक दे। तदनन्तर प्रताड्य नीतवानब्धिं यथा पर्णं तु वायुना। | श्रीराम और लक्ष्मण दोनोंने मिलकर शेष सभी राक्षसोंका शेषांस्तु हतवान् रामो लक्ष्मणश्च निशाचरान् ॥ ९२ | वध कर डाला॥ ८८-९२॥ | इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा यज्ञकी रक्षा होती रामेण रक्षितमखो विश्वामित्रो महायशाः। | रहनेसे महायशस्वी विश्वामित्रने उस यज्ञको विधिवत् समाप्य यागं विधिवत् पूजयामास ऋत्विजान् ॥ ९३ | पूर्ण करके ऋत्विजोंका दक्षिणादिसे पूजन किया। शत्रुदमन! | उस यज्ञके सदस्योंका भी यथोचित समादर करके सदस्यानपि सम्पूज्य यथार्हं च ह्वारिंदम। | विश्वामित्रजीने श्रीराम और लक्ष्मणकी भी भक्तिपूर्वक रामं च लक्ष्मणं चैव पूजयामास भक्तितः ॥ ९४ | पूजा एवं प्रशंसा की। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज! तदनन्तर | उस यज्ञमें मिले हुए भागोंसे सन्तुष्ट देवताओंने भगवान् ततो देवगणस्तुष्टो यज्ञभागेन सत्तम। | रामके मस्तकपर पुष्पोंकी वर्षा की॥ ९३-९५॥ ववर्ष पुष्पवर्षं तु रामदेवस्य मूर्धनि ॥ ९५ | इस प्रकार भाई लक्ष्मणके साथ विनयशील | श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंसे प्राप्त भयका निवारण करके, निवार्य राक्षसभायं कारयित्वा तु तन्मखम्। | विश्वामित्रका यज्ञ पूर्ण कराकर, नाना प्रकारकी पावन श्रुत्वा नाना कथाः पुण्या रामो भ्रातृसमन्वितः ॥ ९६ | कथाएँ सुनते हुए मुनिके द्वारा उस स्थानपर लाये गये, | जहाँ शिला बनी हुई अहल्या थी। राजेन्द्र! पूर्वकालमें तेन नीतो विनीतात्मा अहल्या यत्र तिष्ठति। | इन्द्रके साथ व्यभिचार करनेसे अपने पति गौतमका शाप व्यभिचारान्महेन्द्रेण भर्त्रा शप्ता हि सा पुरा ॥ ९७ | प्राप्तकर अहल्या पत्थर हो गयी थी। उस समय रामका | दर्शन पाते ही वह शापसे मुक्त हो पुनः अपने पति पाषाणभूता राजेन्द्र तस्य रामस्य दर्शनात्। | गौतमके पास चली गयी॥ ९६-९८॥ अहल्या मुक्तशापा च जगाम गौतमं प्रति ॥ ९८ | तदनन्तर विश्वामित्रजीने वहाँ क्षणभर विचार किया विश्वामित्रस्ततस्तत्र चिन्तयामास वै क्षणम्। | कि मुझे कमललोचन रामचन्द्रजीका विवाह करके इन्हें कृतदारो मया नेयो रामः कमललोचनः ॥ ९९ | अयोध्या ले चलना चाहिये। यह सोचकर अनेक शिष्योंसे | घिरे हुए महातपस्वी विश्वामित्रजी श्रीराम और लक्ष्मणको इति संचिन्त्य तौ गृह्य विश्वामित्रो महातपाः। | साथ ले मिथिलाकी ओर चल दिये॥ ९९-१००॥ शिष्यैःपरिवृतोऽनेकैर्र्जगाम मिथिलां प्रति ॥ १००