संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 318 में से
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१८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४७ [मूल संस्कृत श्लोक - वाम भाग] तथेत्युक्त्वा च राजा हि भवचापं तदद्भुतम्। अनेक भूभुजां भङ्गि स्थापयामास पूर्ववत् ॥ ११६ ततो दशरथसुतो विश्वामित्रेण चोदितः । तेषां मध्यात्समुत्थाय रामः कमललोचनः ॥ ११७ प्रणम्य विप्रान् देवांश्च धनुरादाय तत्तदा। सज्यं कृत्वा महाबाहुर्ज्याघोषमकरोत्त्तदा ॥ ११८ आकृष्यमाणं तु बलात्तेन भग्नं महद्धनुः । सीता च मालामादाय शुभां रामस्य मूर्धनि ॥ ११९ क्षिप्त्वा संवरयामास सर्वक्षत्रियसन्निधौ । ततस्ते क्षत्रियाः क्रुद्धा राममासाद्य सर्वतः ॥ १२० मुमुचुः शरजालानि गर्जयन्तो महाबलाः। तान्निरीक्ष्य ततो रामो धनुरादाय वेगवान् ॥ १२१ ज्याघोषतलघोषेण कम्पयामास तान्नृपान्। चिच्छेद शरजालानि तेषां स्वास्त्रै रथांस्ततः ॥ १२२ धनूंषि च पताकाश्च रामश्चिच्छेद लीलया । संनह्य स्वबलं सर्वं मिथिलाधिपतिस्ततः ॥ १२३ जामातरं रणे रक्षन् पाष्णिग्राहो बभूव ह। लक्ष्मणश्च महावीरो विद्राव्य युधि तान्नृपान् ॥ १२४ हस्त्यश्वाञ्जगृहे तेषां स्यन्दनानि बहूनि च। वाहनानि परित्यज्य पलायनपरान्नृपान् ॥ १२५ तान्निहन्तुं च धावत्स पृष्ठतो लक्ष्मणस्तदा । मिथिलाधिपतिस्तं च वारयामास कौशिकः ॥ १२६ जितसेनं महावीरं रामं भ्रात्रा समन्वितम्। आदाय प्रविवेशाथ जनकः स्वगृहं शुभम् ॥ १२७ दूतं च प्रेषयामास तदा दशरथाय सः। श्रुत्वा दूतममुखात् सर्वं विदितार्थः स पार्थिवः ॥ १२८ सभार्यः ससुतः श्रीमान् हस्त्यश्वरथवाहनः। मिथिलामाजगामाशु स्वबलेन समन्वितः ॥ १२९ जनकोऽप्यस्य सत्कारं कृत्वा स्वां च सुतां ततः । विधिवत्कृतशुल्कां तां ददौ रामाय पार्थिव ॥ १३० अपराश्च सुतास्तिस्रो रूपवत्यः स्वलङ्कृताः । त्रिभ्यस्तु लक्ष्मणादिभ्यः स्वकन्या विधिवद्ददौ ॥ १३१ [हिन्दी अनुवाद - दक्षिण भाग] तब 'बहुत अच्छा' कहकर राजाने अनेक भूपालोंका मान भङ्ग करनेवाले उस अद्भुत शिवधनुषको पूर्ववत् वहाँ रखवाया। तत्पश्चात् कमललोचन दशरथनन्दन राम विश्वामित्रजीके आज्ञा देनेपर राजाओंके बीचसे उठे और ब्राह्मणों तथा देवताओंको प्रणाम करके उन्होंने वह धनुष उठा लिया। फिर उन महाबाहुने धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसकी टंकार की। रामके द्वारा बलपूर्वक खींचे जानेसे वह महान् धनुष सहसा टूट गया। तब सीताजी सुन्दर माला लेकर आयीं और उन सम्पूर्ण क्षत्रियोंके निकट भगवान् रामके गलेमें वह माला डालकर उन्होंने उनका विधिपूर्वक पतिरूपसे वरण किया। इससे वहाँ आये हुए सभी महाबली क्षत्रिय कुपित हो गये और श्रीरामचन्द्रजीपर सब ओरसे आक्रमण एवं गर्जना करते हुए उनपर बाण बरसाने लगे। उन्हें यों करते देख श्रीरामने भी वेगपूर्वक हाथमें धनुष ले प्रत्यञ्चाकी टंकारसे उन सभी नरेशोंको कम्पित कर दिया और अपने अस्त्रोंसे उन सबके बाण तथा रथ काट डाले। इतना ही नहीं, श्रीरामने लीलापूर्वक ही उनके धनुष तथा पताकाएँ भी काट डालीं। तदनन्तर मिथिलानरेश भी अपनी सारी सेना तैयार करके उस संग्राममें जामाता श्रीरामकी रक्षा करते हुए उनके पृष्ठपोषक हो गये। इधर, महावीर लक्ष्मणने भी युद्धमें उन राजाओंको मार भगाया तथा उनके हाथी, घोड़े और बहुत-से रथ अपने अधिकारमें कर लिये। अपने वाहन छोड़कर भागे जाते हुए उन राजाओंको मार डालनेके लिये लक्ष्मण उनके पीछे दौड़े। तब उन्हें मिथिलानरेश जनक और विश्वामित्रने मना कर दिया ॥ ११६-१२६ ॥ राजाओंकी सेनापर विजय पाये हुए महावीर श्रीरामको लक्ष्मणसहित साथ ले राजा जनकने अपने सुन्दर भवनमें प्रवेश किया। उसी समय उन्होंने राजा दशरथके पास एक दूत भेजा। दूतके मुखसे सारी बातें सुनकर राजाको सब वृत्तान्त ज्ञात हुआ। तब श्रीमान् राजा दशरथ अपनी रानियों और पुत्रोंको साथ ले, हाथी, घोड़े और रथ आदि वाहनोंसे सम्पन्न हो, सेनाके साथ तुरन्त ही मिथिलामें पधारे। राजन्! जनकने भी राजा दशरथका भलीभाँति सत्कार किया। फिर विधिपूर्वक जिसके पाणिग्रहणकी शर्त पूरी की जा चुकी थी, उस अपनी कन्या सीताको रामके हाथमें दे दिया। तत्पश्चात् अपनी अन्य तीन कन्याओंको भी, जो परमसुन्दरी और आभूषणोंसे अलङ्कृत थीं, लक्ष्मण आदि तीन भाइयोंके साथ विधिपूर्वक ब्याह दिया ॥ १२७-१३१ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth