भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 318 में से

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अध्याय ४७ ] श्रीरामवतारकी कथा - श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १८१ एवं कृतविवाहोऽसौ रामः कमललोचनः । भ्रातृभिर्मातृभिः सार्धं पित्रा बलवता सह ॥ १३२ दिनानि कतिचित्तत्र स्थितो विविधभोजनैः । ततोऽयोध्यापुरीं गन्तुमुत्सुकं ससुतं नृपम् । दृष्ट्वा दशरथं राजा सीतायाः प्रददौ वसु ॥ १३३ रत्नानि दिव्यानि बहूनि दत्त्वा रामाय वस्त्राण्यतिशोभनानि । हस्त्यश्वदासानपि कर्मयोग्यान् दासीजनांश्च प्रवराः स्त्रियश्च ॥ १३४ सीतां सुशीलां बहुरत्नभूषितां रथं समारोप्य सुतां सुरूपाम् । वेदादिघोषैर्बहुमङ्गलैश्च सम्प्रेषयामास स पार्थिवो बली ॥ १३५ प्रेषयित्वा सुतां दिव्यां नत्वा दशरथं नृपम् । विश्वामित्रं नमस्कृत्य जनकः संनिवृत्तवान् ॥ १३६ तस्य पत्न्यो महाभागाः शिक्षयित्वा सुतां तदा । भर्तृभक्तिं कुरु शुभे श्वश्रूणां श्वशुरस्य च ॥ १३७ श्वश्रूणामर्पयित्वा तां निवृत्ता विविशुः पुरम् । ततस्तु रामं गच्छन्तमयोध्यां प्रबलान्वितम् ॥ १३८ श्रुत्वा परशुरामो वै पन्थानं संरुरोध ह । तं दृष्ट्वा राजपुरुषाः सर्वे ते दीनमानसाः ॥ १३९ आसीद्दशरथश्चापि दुःखशोकपरिप्लुतः । सभार्यः सपरीवारो भार्गवस्य भयान्नृप ॥ १४० ततोऽब्रवीज्जनान् सर्वान् राजानं च सुदुःखितम् । वसिष्ठश्चोर्जिततपा ब्रह्मचारी महामुनिः ॥ १४१ वसिष्ठ उवाच युष्माभिरत्र रामार्थं न कार्यं दुःखमण्वपि ॥ १४२ पित्रा वा मातृभिर्वापि अन्यैर्भृत्यजनैरपि । अयं हि नृपते रामः साक्षाद्विष्णुस्तु ते गृहे ॥ १४३ जगतः पालनार्थाय जन्मप्राप्तो न संशयः । यस्य संकीर्त्य नामापि भवभीतिः प्रणश्यति ॥ १४४ ब्रह्म मूर्तं स्वयं यत्र भयादेस्तत्र का कथा । यत्र संकीर्त्यते रामकथामात्रमपि प्रभो ॥ १४५ नोपसर्गभयं तत्र नाकालमरणं नृणाम् । इस प्रकार विवाह कर लेनेके पश्चात् कमललोचन श्रीराम अपने भ्राताओं, माताओं और बलवान् पिताके साथ कुछ दिनोंतक नाना प्रकारके भोजनादिसे सत्कृत हो मिथिलापुरीमें रहे। फिर महाराज दशरथको अपने पुत्रोंके साथ अयोध्या जानेके लिये उत्कण्ठित देख राजा जनकने सीताके लिये बहुत-सा धन और दिव्य रत्न देकर श्रीरामके लिये अत्यन्त सुन्दर वस्त्र, क्रियाकुशल हाथी, घोड़े और दास दिये एवं दासीके रूपमें बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ भी अर्पित कीं। उन बलवान् भूपालने बहुत-से रत्नमय आभूषणोंद्वारा विभूषित सुन्दरी साध्वी पुत्री सीताको रथपर चढ़ाकर वेदध्वनि तथा अन्य माङ्गलिक शब्दोंके साथ विदा किया। अपनी दिव्य कन्या सीताको विदा कर राजा जनक दशरथजी तथा विश्वामित्र [एवं वसिष्ठ] मुनिको प्रणाम करके लौट आये। तब जनककी अति सौभाग्य-शालिनी रानियाँ भी अपनी कन्याओंको यह शिक्षा देकर कि 'शुभे ! तुम पतिकी भक्ति तथा सास-ससुरकी सेवा करना' उन्हें उनकी सासुओंको सौंप, नगरमें लौट आयीं ॥ १३२-१३७१/२ ॥ कहते हैं, तदनन्तर यह सुनकर कि 'राम अपनी प्रबल सेनाके साथ अयोध्यापुरीको लौट रहे हैं', परशुरामने उनका मार्ग रोक लिया। उन्हें देखकर सभी राजपुरुषोंका हृदय कातर हो गया। नरेश्वर ! परशुरामके भयसे राजा दशरथ भी अपनी स्त्री तथा परिवारके साथ दुःखी और शोकमग्न हो गये। तब उत्कृष्ट तपस्वी ब्रह्मचारी महामुनि वसिष्ठजी दुःखी राजा दशरथ तथा अन्य सब लोगोंसे बोले ॥ १३८-१४१ ॥ वसिष्ठजीने कहा - तुम लोगोंको यहाँ श्रीरामके लिये तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। पिता, माता, भाई अथवा अन्य भृत्यजन थोड़ा-सा भी खेद न करें। नरपाल ! ये श्रीरामचन्द्रजी साक्षात् भगवान् विष्णु हैं। समस्त जगत्की रक्षाके लिये ही इन्होंने तुम्हारे घरमें अवतार लिया है, इसमें संदेह नहीं है। जिनके नाममात्रका कीर्तन करनेसे संसाररूपी भय निवृत्त हो जाता है, वे परमेश्वर ही जहाँ साक्षात् मूर्तिमान् होकर विराजमान हैं, वहाँ भय आदिकी चर्चा भी कैसे की जा सकती है। प्रभो ! जहाँ श्रीरामचन्द्रजीकी कथामात्रका भी कीर्तन होता है, वहाँ मनुष्योंके लिये संक्रामक बीमारी और अकालमृत्युका भय नहीं होता ॥ १४२-१४५१/२ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth