भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 198

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८७

इत्याकर्ण्य स कैकेय्या वचनं घोरमप्रियम्। कैकेयीके इस घोर अप्रिय वचनको सुनकर राजा पपात भुवि निस्संज्ञो राजा सापि विभूषिता ॥ ५१ दशरथ मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े और कैकेयीने (प्रसन्नतापूर्वक) अपने-आपको सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे रात्रिशेषं नयित्वा तु प्रभाते सा मुदावती। विभूषित कर लिया। शेष रात बिताकर प्रातःकाल कैकेयीने दूतं सुमन्त्रमाह्वैवं राम आनीयतामिति ॥ ५२ आनन्दित हो राजदूत सुमन्त्रसे कहा—'श्रीरामको यहाँ बुलाकर लाया जाय।' उस समय राम ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन रामस्तु कृतपुण्याहः कृतस्वस्त्ययनो द्विजैः। और स्वस्तिवाचन कराकर, शङ्ख और तूर्य आदि वाद्योंका यागमण्डपमध्यस्थः शङ्खतूर्यरवान्वितः ॥ ५३ शब्द सुनते हुए यज्ञमण्डपमें विराजमान थे ॥ ५१-५३ ॥

तमासाद्य ततो दूतः प्रणिपत्य पुरःस्थितः। दूत सुमन्त्र उस समय श्रीरामचन्द्रजीके पास पहुँचकर राम राम महाबाहो आज्ञापयति ते पिता ॥ ५४ उन्हें प्रणाम करके सामने खड़े हो गये और बोले—'राम ! महाबाहु श्रीराम ! तुम्हारे पिताजीका आदेश है, जल्दी उठो द्रुतमुत्तिष्ठ गच्छ त्वं यत्र तिष्ठति ते पिता। और जहाँ तुम्हारे पिता विद्यमान हैं, वहाँ चलो।' दूतके यों इत्युक्तस्तेन दूतेन शीघ्रमुत्थाय राघवः ॥ ५५ कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही उठे और ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले कैकेयीके भवनमें जा पहुँचे ॥ ५४-५५ १/२ ॥

अनुज्ञाप्य द्विजान् प्राप्तः कैकेय्या भवनं प्रति। श्रीरामको अपने भवनमें प्रवेश करते देख दयाहीना प्रविशन्तं गृहं रामं कैकेयी प्राह निर्घृणा ॥ ५६ कैकेयीने कहा—'वत्स ! तुम्हारे पिताका यह विचार मैं तुम्हें बता रही हूँ। महाबाहो ! तुम बारह वर्षोंतक वनमें पितुस्तव मतं वत्स इदं ते प्रब्रवीम्यहम्। जाकर रहो। वीर! वहाँ तपस्या करनेका निश्चय मनमें वने वस महाबाहो गत्वा त्वं द्वादशाब्दकम् ॥ ५७ लिये तुम आज ही चले जाओ। बेटा ! तुम्हें अपने मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरे वचनका अद्यैव गम्यतां वीर तपसे धृतमानसः । आदरपूर्वक पालन करो' ॥ ५६-५८ ॥ न चिन्त्यमन्यथा वत्स आदरात् कुरु मे वचः ॥ ५८

कैकेयीके मुखसे पिताका यह वचन सुनकर एतच्छ्रुत्वा पितुर्वाक्यं रामः कमलोचनः । कमलोचन श्रीरामने 'तथास्तु' कहकर पिताकी आज्ञा तथेत्याज्ञां गृहीत्वासौ नमस्कृत्य च तावुभौ ॥ ५९ शिरोधार्य की और उन दोनों—माता-पिताको प्रणाम करके उनके भवनसे निकलकर उन्होंने अपना धनुष निष्क्रम्य तद्गृहाद्रामो धनुरादाय वेश्मतः । सँभाला। फिर कौशल्या और सुमित्राको प्रणाम करके कौशल्यां च नमस्कृत्य सुमित्रां गन्तुमुद्यतः ॥ ६० वे घरसे जानेको तैयार हो गये ॥ ५९-६० ॥

तच्छ्रुत्वा तु ततः पौरा दुःखशोकपरिप्लुताः । यह समाचार सुनते ही समस्त पुरवासीजन दुःख- विव्यथुश्चाथ सौमित्रिः कैकेयीं प्रति रोषितः ॥ ६१ शोकमें डूब गये और बड़ी व्यथाका अनुभव करने लगे। इधर सुमित्राकुमार लक्ष्मण कैकेयीके प्रति कुपित ततस्तं राघवो दृष्ट्वा लक्ष्मणं रक्तलोचनम्। हो उठे। परम बुद्धिमान् धर्मज्ञ श्रीरामने लक्ष्मणको वारयामास धर्मज्ञो धर्मवाग्भिर्महामतिः ॥ ६२ क्रोधसे लाल आँखें किये देख धर्मयुक्त वचनोंद्वारा उन्हें शान्त किया। तत्पश्चात् वहाँ जो बड़े-बूढ़े उपस्थित थे, ततस्तु तत्र ये वृद्धास्तान् प्रणम्य मुनींश्च सः। उनको तथा मुनियोंको प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजी वनकी रामो रथं खिन्नसूतं प्रस्थानायारुरोह वै ॥ ६३ यात्राके लिये रथपर आरूढ़ हुए। उस रथका सारथि बहुत दुःखी था। उस समय राजकुमार श्रीरामने अपने आत्मीयं सकलं द्रव्यं ब्राह्मणेभ्यो नृपात्मजः। पासके समस्त द्रव्य और नाना प्रकारके वस्त्र अत्यन्त श्रद्धया परया दत्त्वा वस्त्राणि विविधानि च ॥ ६४ श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको दान कर दिये ॥ ६१-६४ ॥

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