संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 197, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८ इत्युक्ता पार्थिवेनापि किंचिन्नोवाच सा शुभा । मुञ्चन्ती दीर्घमुष्णं च रोषोच्छ्वासं मुहुर्मुहुः ॥ ३७ तस्थावाश्लिष्य हस्ताभ्यां पार्थिवः प्राह रोषिताम् । किं ते कैकेयि दुःखस्य कारणं वद शोभने ॥ ३८ वस्त्राभरणरत्नादि यद्यदिच्छसि शोभने । तत्त्वं गृहीष्व निश्शङ्कं भाण्डारात् सुखिनी भव ॥ ३९ भाण्डारेण मम शुभे श्रोऽर्थसिद्धिर्भविष्यति । यदाभिषेकं सम्प्राप्ते रामे राजीवलोचने ॥ ४० भाण्डागारस्य मे द्वारं मया मुक्तं निरर्गलम् । भविष्यति पुनः पूर्णं रामे राज्यं प्रशासति ॥ ४१ बहु मानय रामस्य अभिषेकं महात्मनः । इत्युक्ता राजवर्येण कैकेयी पापलक्षणा ॥ ४२ कुमतिर्निर्घृणा दुष्टा कुब्जया शिक्षिताब्रवीत् । राजानं स्वपतिं वाक्यं क्रूरमत्यन्तनिष्ठुरम् ॥ ४३ रत्नादि सकलं यत्ते तन्ममैव न संशयः । देवासुरमहायुद्धे प्रीत्या यन्मे वरद्वयम् ॥ ४४ पुरा दत्तं त्वया राजंस्तदिदानीं प्रयच्छ मे । इत्युक्तः पार्थिवः प्राह कैकेयीमशुभां तदा ॥ ४५ अदत्तमप्यहं दास्ये तव नान्यस्य वा शुभे । किं मे प्रतिश्रुतं पूर्वं दत्तमेव मया तव ॥ ४६ शुभाङ्गी भव कल्याणि त्यज कोपमनर्थकम् । रामाभिषेकजं हर्षं भजोत्तिष्ठ सुखी भव ॥ ४७ इत्युक्ता राजवर्येण कैकेयी कलहप्रिया । उवाच परुषं वाक्यं राज्ञो मरणकारणम् ॥ ४८ वरद्वयं पूर्वदत्तं यदि दास्यसि मे विभो । श्वोभूते गच्छतु वनं रामोऽयं कोशलात्मजः ॥ ४९ द्वादशाब्दं निवसतु त्वद्वाक्याद्दण्डके वने । अभिषेकं च राज्यं च भरतस्य भविष्यति ॥ ५०
राजाके इस प्रकार कहनेपर वह सुन्दरी कुछ भी न बोली। बारम्बार क्रोधपूर्वक केवल लम्बी-लम्बी गरम साँसें छोड़ती रही। राजा अपनी भुजाओंसे उसका आलिङ्गन करके बैठ गये और उस रूठी हुई कैकेयीसे बोले—'सुन्दरी कैकेयि! बताओ, तुम्हारे दुःखका क्या कारण है? शुभे! वस्त्र, आभूषण और रत्न आदि जिन-जिन वस्तुओंकी तुम्हें इच्छा हो, उन सबको बिना किसी आशङ्काके भण्डारघरसे ले लो; परंतु प्रसन्न हो जाओ। कल्याणि! कल जब श्रीरामका राज्याभिषेक सम्पन्न हो जायगा, उस समय उस भाण्डारसे मेरे मनोरथकी सिद्धि हो जायगी। इस समय तो मैंने भण्डारघरका द्वार उन्मुक्त कर रखा है। श्रीरामके राज्य-शासन करते समय वह फिर पूर्ण हो जायगा। प्रिये! महात्मा श्रीरामके राज्याभिषेकको तुम इस समय अधिक महत्त्व और सम्मान दो'॥ ३७-४११/२॥ महाराज दशरथके इस प्रकार कहनेपर कुब्जाके द्वारा पढ़ायी गयी पापिनी, दुर्बुद्धि, दयाहीना और दुष्टा कैकेयीने अपने पति महाराज दशरथसे अत्यन्त क्रूरतापूर्वक निष्ठुर वचन कहा—'महाराज! इसमें संदेह नहीं कि आपके जो रत्न आदि हैं, वे सब मेरे ही हैं; किंतु पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर आपने प्रसन्न हो मुझे जो दो वर दिये थे, उन्हें ही इस समय दीजिये'॥ ४२-४४१/२॥ यह सुनकर राजाने उस अशुभा कैकेयीसे कहा—'शुभे! और किसीकी बात तो मैं नहीं कहता, परंतु तुम्हारे लिये तो जिसे नहीं देनेको कहा है, वह वस्तु भी दे दूँगा। फिर जिसको देनेके लिये मैंने पहले प्रतिज्ञा कर ली है, वह वस्तु तो दी हुई ही समझो। कल्याणि! अब सुन्दर वेष धारण करो और यह व्यर्थका कोप छोड़ दो। उठो, श्रीरामके राज्याभिषेकके आनन्दोत्सवमें भाग लो और सुखी हो जाओ'॥ ४५-४७॥ नृपश्रेष्ठ दशरथके यों कहनेपर कलहप्रिया कैकेयीने ऐसी कठोर बात कही, जो आगे चलकर राजाकी मृत्युका कारण बन गयी। उसने कहा—'प्रभो! यदि आप पहलेके दिये हुए दोनों वर मुझे देना चाहते हों तो (पहला वर मैं यही माँगती हूँ कि) ये कौशल्यानन्दन श्रीराम कल सबेरा होते ही वनको चले जायँ और आपकी आज्ञासे ये बारह वर्षोतक दण्डकारण्यमें निवास करें तथा मेरा दूसरा अभीष्ट वर यह है कि अब राज्य और राज्याभिषेक भरतका होगा'॥ ४८-५०॥