भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 196

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८५ रामस्य वनवासश्च तथा यत्नं करोम्यहम्। हो जाय और रामका वनवास हो'॥ २२-२३१/२॥ इत्युक्त्वा मन्थरां सा तु उन्मुच्य स्वाङ्गभूषणम् ॥ २४ मन्थरासे यों कहकर कैकेयीने अपने अङ्गोंके आभूषण उतार दिये। सुन्दर वस्त्र और फूलोंके हार भी वस्त्रं पुष्पाणि चोन्मुच्य स्थूलवासोधराभवत्। उतार फेंके और मोटा वस्त्र पहन लिया। फिर निर्माल्य निर्माल्यपुष्पधृक्कष्टा कश्मलाङ्गी विरूपिणी ॥ २५ (पूजासे उतरे हुए) पुष्पोंको धारण किया, देहमें राख और धूल लपेट ली और कुरूप वेष बनाकर वह भस्मधूल्यादिनिर्दिग्धा भस्मधूल्या तथा श्रिते। शरीरमें कष्ट और मूर्च्छाका अनुभव करने लगी। वह भूभागे शान्तदीपे सा संध्याकाले सुदुःखिता ॥ २६ भामिनी ललाटमें श्वेत वस्त्र बाँध, संध्याके समय दीपक बुझा, अँधेरेमें ही राख और धूलसे भरे भूभागमें अत्यन्त ललाटे श्वेतचैलं तु बद्ध्वा सुष्वाप भामिनी। दुःखित हो लेट गयी ॥ २४-२६१/२॥ मन्त्रिभिः सह कार्याणि सम्मन्त्र्य सकलानि तु ॥ २७ इधर मन्त्रियोंके साथ सारे कार्योंके विषयमें मन्त्रणा करके, वसिष्ठ आदि ऋषियोंद्वारा पुण्याहवाचन, पुण्याहः स्वस्तिमाङ्गल्यैः स्थाप्य रामं तु मण्डले। स्वस्तिवाचन और मङ्गलपाठादि करवाकर, श्रीरामको ऋषिभिस्तु वसिष्ठाद्यैः सार्धं सम्भारमण्डपे ॥ २८ यज्ञ-सामग्रीसे युक्त मण्डपमें बिठाया और वृद्धि वृद्धिजागरणीयैश्च सर्वतस्तूर्यनादिते। (नान्दीश्राद्ध) एवं जागरण-सम्बन्धी कृत्यके लिये उपयुक्त गीतनृत्यसमाकीर्णे शङ्खकाहलनिःस्वनैः ॥ २९ तथा सब ओर शहनाई एवं शङ्ख, काहल आदिके शब्दोंसे निनादित एवं गान और नृत्यके कार्यक्रमोंसे पूर्ण स्वयं दशरथस्तत्र स्थित्वा प्रत्यागतः पुनः। उस मण्डपमें थोड़ी देरतक स्वयं भी ठहरकर राजा कैकेय्या वेश्मनो द्वारं जरद्भिः परिरक्षितम् ॥ ३० दशरथ वहाँसे लौट आये। राजा कैकेयीसे श्रीरामचन्द्रजीके अभिषेकका शुभ समाचार सुनानेकी इच्छासे कैकेयीके रामाभिषेकं कैकेयीं वक्तुकामः स पार्थिवः। भवनके दरवाजेपर पहुँचे, जहाँ बूढ़े सिपाही पहरा देते कैकेयीभवनं वीक्ष्य सान्धकारमथाब्रवीत् ॥ ३१ थे। कैकेयीके घरको अन्धकारयुक्त देख राजाने कहा ॥ २७-३१॥ अन्धकारमिदं कस्मादद्य ते मन्दिरे प्रिये। 'प्रिये ! आज तुम्हारे मन्दिरमें अन्धकार क्यों है ? रामाभिषेकं हर्षाय अन्त्यजा अपि मेनिरे ॥ ३२ आज तो इस नगरके चाण्डालोंने भी श्रीरामचन्द्रके अभिषेकको आनन्दजनक माना है। सभी लोग अपने गृहालंकरणं कुर्वन्त्यद्य लोका मनोहरम्। घरको सुन्दर ढंगसे सजा रहे हैं। तुमने अपने भवनको त्वयाद्य न कृतं कस्मादित्युक्त्वा च महीपतिः ॥ ३३ क्यों नहीं सुसज्जित किया?'-यों कहकर राजाने घरमें दीप प्रज्वलित कराये; फिर उसके भीतर प्रवेश किया। ज्वालयित्वा गृहे दीपान् प्रविवेश गृहं नृपः। वहाँ कैकेयी धरतीपर पड़ी सो रही थी। उसका प्रत्येक अशोभनाङ्गीं कैकेयीं स्वपन्तीं पतितां भुवि ॥ ३४ अङ्ग अशोभन जान पड़ता था। उसे इस अवस्थामें देख राजाने उठाकर हृदयसे लगाया और उसको प्रिय दृष्ट्वा दशरथः प्राह तस्याः प्रियमिदं त्विति। लगनेवाले ये वचन कहे - 'प्रिये ! मेरी उत्तम बात आश्लिष्योत्थाय तां राजा शृणु मे परमं वचः ॥ ३५ सुनो। सुन्दरि ! जो तुम्हारे प्रति अपनी मातासे भी अधिक प्रेम रखते हैं, उन्हीं श्रीरामचन्द्रका कल राज्याभिषेक स्वमातुरधिकां नित्यं यस्ते भक्तिं करोति वै। होगा' ॥ ३२-३६॥ तस्याभिषेकं रामस्य श्वो भविष्यति शोभने ॥ ३६ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth