संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 195, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८
[संस्कृत श्लोक - बायाँ स्तम्भ]
रामाभिषेकं विपुलं श्वो भविष्यति जानथ। श्रुत्वेत्थं मन्त्रिणः प्राहुस्तं नृपं प्रणिपत्य च॥ १० शोभनं ते मतं राजन् यदिदं परिभाषितम्। रामाभिषेकमस्माकं सर्वेषां च प्रियंकरम्॥ ११ इत्युक्तो दशरथस्तैस्तान् सर्वान् पुनरब्रवीत्। आनीयन्तां द्रुतं सर्वे सम्भारा मम शासनात्॥ १२ सर्वतः सारभूता च पुरी चेयं समन्ततः। अद्य शोभान्विता कार्या कर्तव्यं यागमण्डलम्॥ १३ इत्येवमुक्ता राज्ञा ते मन्त्रिणः शीघ्रकारिणः। तथैव चक्रुस्ते सर्वे पुनःपुनरुदीरिताः॥ १४ प्राप्तहर्षः स राजा च शुभं दिनमुदीक्षयन्। कौशल्या लक्ष्मणश्चैव सुमित्रा नागरो जनः॥ १५ रामाभिषेकमाकर्ण्य मुदं प्राप्यातिहर्षितः। श्वश्रूश्वशुरयोः सम्यक् शुश्रूषणपरा तु सा॥ १६ मुदान्विता सिता सीता भर्तुराकर्ण्य शोभनम्। श्वोभाविन्यभिषेके तु रामस्य विदितात्मनः॥ १७ दासी तु मन्थरानाम्नी कैकेय्याः कुब्जरूपिणी। स्वां स्वामिनीं तु कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत्॥ १८ शृणु राज्ञि महाभागे वचनं मम शोभनम्। त्वत्पतिस्तु महाराजस्तव नाशाय चोद्यतः॥ १९ रामोऽसौ कौसलीपुत्रः श्वो भविष्यति भूपतिः। वसुवाहनकोशादि राज्यं च सकलं शुभे॥ २० भविष्यत्यद्य रामस्य भरतस्य न किंचन। भरतोऽपि गतो दूरं मातुलस्य गृहं प्रति॥ २१ हा कष्टं मन्दभाग्यासि सापत्नयाद्दुःखिता भृशम्। सैवमाकर्ण्य कैकेयी कुब्जामिदमथाब्रवीत्॥ २२ पश्य मे दक्षतां कुब्जे अद्यैव त्वं विचक्षणे। यथा तु सकलं राज्यं भरतस्य भविष्यति॥ २३
[हिन्दी अनुवाद - दायाँ स्तम्भ]
जान लो कि कल बड़े समारोहके साथ श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक होगा'॥ ५-९१/२॥ यह सुनकर मन्त्रियोंने राजाको प्रणाम करके उनसे कहा—'राजन्! आपने हमारे समक्ष अपना जो यह विचार व्यक्त किया है, बहुत ही उत्तम है। श्रीरामका अभिषेक हम सभीके लिये प्रियकारक है'॥ १०-११॥ उनके यों कहनेपर राजा पुनः उन सब लोगोंसे बोले—'अच्छा, अब मेरी आज्ञासे अभिषेकके सभी सामान शीघ्र लाये जायँ और समस्त वसुधाकी सारभूता इस अयोध्यापुरीको भी आज ही सब ओरसे सुसज्जित कर देना चाहिये। साथ ही एक यज्ञमण्डपकी रचना भी परम आवश्यक है'॥ १२-१३॥ राजाके यों कहने और बार-बार प्रेरणा करनेपर उन सब शीघ्रकारी मन्त्रियोंने उनके कथनानुसार सब कार्य पूर्ण कर दिये। राजा इस शुभ दिनकी प्रतीक्षा करते हुए बड़े ही आनन्दित हुए। कौशल्या, सुमित्रा, लक्ष्मण तथा अन्य पुरवासी श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकका शुभ समाचार सुनकर आनन्दके मारे फूले नहीं समाये। सास-ससुरकी सेवामें भलीभाँति लगी रहनेवाली सीता भी अपने पतिके लिये इस शुभ संवादको सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुईं॥ १४-१६१/२॥ आत्मतत्त्वके ज्ञाता अथवा सबके मनकी बात जाननेवाले भगवान् श्रीरामका अभिषेक दूसरे ही दिन होनेवाला था। इसी बीचमें कैकेयीकी कुबड़ी दासी मन्थराने अपनी स्वामिनी कैकेयीके पास जाकर यह बात कही—'बड़भागिनी रानी! मैं एक बहुत अच्छी बात सुनाती हूँ, सुनो। तुम्हारे पति महाराज दशरथ अब तुम्हारा नाश करनेपर तुले हुए हैं। शुभे! वे जो कौशल्या-पुत्र राम हैं, कल ही राजा होंगे। धन, वाहन और कोश आदिके साथ यह सारा राज्य अब रामका हो जायगा; भरतका कुछ भी नहीं रहेगा। देखो, भाग्यकी बात; इस अवसरपर भरत भी बहुत दूर—अपने मामाके घर चले गये हैं। हाय! यह सब कितने कष्टकी बात है! तुम मन्दभागिनी हो। अब तुम्हें सौतकी ओरसे बहुत ही कष्ट उठाना पड़ेगा'॥ १७-२११/२॥ ऐसी बात सुनकर कैकेयीने कुब्जासे कहा—'बुद्धिमति कुब्जे! तू मेरी दक्षता तो देख—आज ही मैं ऐसा यत्न करती हूँ, जिससे यह सारा राज्य भरतका
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth