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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

१८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८

१८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८


[संस्कृत श्लोक - बायाँ स्तम्भ]

रामाभिषेकं विपुलं श्वो भविष्यति जानथ। श्रुत्वेत्थं मन्त्रिणः प्राहुस्तं नृपं प्रणिपत्य च॥ १० शोभनं ते मतं राजन् यदिदं परिभाषितम्। रामाभिषेकमस्माकं सर्वेषां च प्रियंकरम्॥ ११ इत्युक्तो दशरथस्तैस्तान् सर्वान् पुनरब्रवीत्। आनीयन्तां द्रुतं सर्वे सम्भारा मम शासनात्॥ १२ सर्वतः सारभूता च पुरी चेयं समन्ततः। अद्य शोभान्विता कार्या कर्तव्यं यागमण्डलम्॥ १३ इत्येवमुक्ता राज्ञा ते मन्त्रिणः शीघ्रकारिणः। तथैव चक्रुस्ते सर्वे पुनःपुनरुदीरिताः॥ १४ प्राप्तहर्षः स राजा च शुभं दिनमुदीक्षयन्। कौशल्या लक्ष्मणश्चैव सुमित्रा नागरो जनः॥ १५ रामाभिषेकमाकर्ण्य मुदं प्राप्यातिहर्षितः। श्वश्रूश्वशुरयोः सम्यक् शुश्रूषणपरा तु सा॥ १६ मुदान्विता सिता सीता भर्तुराकर्ण्य शोभनम्। श्वोभाविन्यभिषेके तु रामस्य विदितात्मनः॥ १७ दासी तु मन्थरानाम्नी कैकेय्याः कुब्जरूपिणी। स्वां स्वामिनीं तु कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत्॥ १८ शृणु राज्ञि महाभागे वचनं मम शोभनम्। त्वत्पतिस्तु महाराजस्तव नाशाय चोद्यतः॥ १९ रामोऽसौ कौसलीपुत्रः श्वो भविष्यति भूपतिः। वसुवाहनकोशादि राज्यं च सकलं शुभे॥ २० भविष्यत्यद्य रामस्य भरतस्य न किंचन। भरतोऽपि गतो दूरं मातुलस्य गृहं प्रति॥ २१ हा कष्टं मन्दभाग्यासि सापत्नयाद्दुःखिता भृशम्। सैवमाकर्ण्य कैकेयी कुब्जामिदमथाब्रवीत्॥ २२ पश्य मे दक्षतां कुब्जे अद्यैव त्वं विचक्षणे। यथा तु सकलं राज्यं भरतस्य भविष्यति॥ २३


[हिन्दी अनुवाद - दायाँ स्तम्भ]

जान लो कि कल बड़े समारोहके साथ श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक होगा'॥ ५-९१/२॥ यह सुनकर मन्त्रियोंने राजाको प्रणाम करके उनसे कहा—'राजन्! आपने हमारे समक्ष अपना जो यह विचार व्यक्त किया है, बहुत ही उत्तम है। श्रीरामका अभिषेक हम सभीके लिये प्रियकारक है'॥ १०-११॥ उनके यों कहनेपर राजा पुनः उन सब लोगोंसे बोले—'अच्छा, अब मेरी आज्ञासे अभिषेकके सभी सामान शीघ्र लाये जायँ और समस्त वसुधाकी सारभूता इस अयोध्यापुरीको भी आज ही सब ओरसे सुसज्जित कर देना चाहिये। साथ ही एक यज्ञमण्डपकी रचना भी परम आवश्यक है'॥ १२-१३॥ राजाके यों कहने और बार-बार प्रेरणा करनेपर उन सब शीघ्रकारी मन्त्रियोंने उनके कथनानुसार सब कार्य पूर्ण कर दिये। राजा इस शुभ दिनकी प्रतीक्षा करते हुए बड़े ही आनन्दित हुए। कौशल्या, सुमित्रा, लक्ष्मण तथा अन्य पुरवासी श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकका शुभ समाचार सुनकर आनन्दके मारे फूले नहीं समाये। सास-ससुरकी सेवामें भलीभाँति लगी रहनेवाली सीता भी अपने पतिके लिये इस शुभ संवादको सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुईं॥ १४-१६१/२॥ आत्मतत्त्वके ज्ञाता अथवा सबके मनकी बात जाननेवाले भगवान् श्रीरामका अभिषेक दूसरे ही दिन होनेवाला था। इसी बीचमें कैकेयीकी कुबड़ी दासी मन्थराने अपनी स्वामिनी कैकेयीके पास जाकर यह बात कही—'बड़भागिनी रानी! मैं एक बहुत अच्छी बात सुनाती हूँ, सुनो। तुम्हारे पति महाराज दशरथ अब तुम्हारा नाश करनेपर तुले हुए हैं। शुभे! वे जो कौशल्या-पुत्र राम हैं, कल ही राजा होंगे। धन, वाहन और कोश आदिके साथ यह सारा राज्य अब रामका हो जायगा; भरतका कुछ भी नहीं रहेगा। देखो, भाग्यकी बात; इस अवसरपर भरत भी बहुत दूर—अपने मामाके घर चले गये हैं। हाय! यह सब कितने कष्टकी बात है! तुम मन्दभागिनी हो। अब तुम्हें सौतकी ओरसे बहुत ही कष्ट उठाना पड़ेगा'॥ १७-२११/२॥ ऐसी बात सुनकर कैकेयीने कुब्जासे कहा—'बुद्धिमति कुब्जे! तू मेरी दक्षता तो देख—आज ही मैं ऐसा यत्न करती हूँ, जिससे यह सारा राज्य भरतका


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अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८५ रामस्य वनवासश्च तथा यत्नं करोम्यहम्। हो जाय और रामका वनवास हो'॥ २२-२३१/२॥ इत्युक्त्वा मन्थरां सा तु उन्मुच्य स्वाङ्गभूषणम् ॥ २४ मन्थरासे यों कहकर कैकेयीने अपने अङ्गोंके आभूषण उतार दिये। सुन्दर वस्त्र और फूलोंके हार भी वस्त्रं पुष्पाणि चोन्मुच्य स्थूलवासोधराभवत्। उतार फेंके और मोटा वस्त्र पहन लिया। फिर निर्माल्य निर्माल्यपुष्पधृक्कष्टा कश्मलाङ्गी विरूपिणी ॥ २५ (पूजासे उतरे हुए) पुष्पोंको धारण किया, देहमें राख और धूल लपेट ली और कुरूप वेष बनाकर वह भस्मधूल्यादिनिर्दिग्धा भस्मधूल्या तथा श्रिते। शरीरमें कष्ट और मूर्च्छाका अनुभव करने लगी। वह भूभागे शान्तदीपे सा संध्याकाले सुदुःखिता ॥ २६ भामिनी ललाटमें श्वेत वस्त्र बाँध, संध्याके समय दीपक बुझा, अँधेरेमें ही राख और धूलसे भरे भूभागमें अत्यन्त ललाटे श्वेतचैलं तु बद्ध्वा सुष्वाप भामिनी। दुःखित हो लेट गयी ॥ २४-२६१/२॥ मन्त्रिभिः सह कार्याणि सम्मन्त्र्य सकलानि तु ॥ २७ इधर मन्त्रियोंके साथ सारे कार्योंके विषयमें मन्त्रणा करके, वसिष्ठ आदि ऋषियोंद्वारा पुण्याहवाचन, पुण्याहः स्वस्तिमाङ्गल्यैः स्थाप्य रामं तु मण्डले। स्वस्तिवाचन और मङ्गलपाठादि करवाकर, श्रीरामको ऋषिभिस्तु वसिष्ठाद्यैः सार्धं सम्भारमण्डपे ॥ २८ यज्ञ-सामग्रीसे युक्त मण्डपमें बिठाया और वृद्धि वृद्धिजागरणीयैश्च सर्वतस्तूर्यनादिते। (नान्दीश्राद्ध) एवं जागरण-सम्बन्धी कृत्यके लिये उपयुक्त गीतनृत्यसमाकीर्णे शङ्खकाहलनिःस्वनैः ॥ २९ तथा सब ओर शहनाई एवं शङ्ख, काहल आदिके शब्दोंसे निनादित एवं गान और नृत्यके कार्यक्रमोंसे पूर्ण स्वयं दशरथस्तत्र स्थित्वा प्रत्यागतः पुनः। उस मण्डपमें थोड़ी देरतक स्वयं भी ठहरकर राजा कैकेय्या वेश्मनो द्वारं जरद्भिः परिरक्षितम् ॥ ३० दशरथ वहाँसे लौट आये। राजा कैकेयीसे श्रीरामचन्द्रजीके अभिषेकका शुभ समाचार सुनानेकी इच्छासे कैकेयीके रामाभिषेकं कैकेयीं वक्तुकामः स पार्थिवः। भवनके दरवाजेपर पहुँचे, जहाँ बूढ़े सिपाही पहरा देते कैकेयीभवनं वीक्ष्य सान्धकारमथाब्रवीत् ॥ ३१ थे। कैकेयीके घरको अन्धकारयुक्त देख राजाने कहा ॥ २७-३१॥ अन्धकारमिदं कस्मादद्य ते मन्दिरे प्रिये। 'प्रिये ! आज तुम्हारे मन्दिरमें अन्धकार क्यों है ? रामाभिषेकं हर्षाय अन्त्यजा अपि मेनिरे ॥ ३२ आज तो इस नगरके चाण्डालोंने भी श्रीरामचन्द्रके अभिषेकको आनन्दजनक माना है। सभी लोग अपने गृहालंकरणं कुर्वन्त्यद्य लोका मनोहरम्। घरको सुन्दर ढंगसे सजा रहे हैं। तुमने अपने भवनको त्वयाद्य न कृतं कस्मादित्युक्त्वा च महीपतिः ॥ ३३ क्यों नहीं सुसज्जित किया?'-यों कहकर राजाने घरमें दीप प्रज्वलित कराये; फिर उसके भीतर प्रवेश किया। ज्वालयित्वा गृहे दीपान् प्रविवेश गृहं नृपः। वहाँ कैकेयी धरतीपर पड़ी सो रही थी। उसका प्रत्येक अशोभनाङ्गीं कैकेयीं स्वपन्तीं पतितां भुवि ॥ ३४ अङ्ग अशोभन जान पड़ता था। उसे इस अवस्थामें देख राजाने उठाकर हृदयसे लगाया और उसको प्रिय दृष्ट्वा दशरथः प्राह तस्याः प्रियमिदं त्विति। लगनेवाले ये वचन कहे - 'प्रिये ! मेरी उत्तम बात आश्लिष्योत्थाय तां राजा शृणु मे परमं वचः ॥ ३५ सुनो। सुन्दरि ! जो तुम्हारे प्रति अपनी मातासे भी अधिक प्रेम रखते हैं, उन्हीं श्रीरामचन्द्रका कल राज्याभिषेक स्वमातुरधिकां नित्यं यस्ते भक्तिं करोति वै। होगा' ॥ ३२-३६॥ तस्याभिषेकं रामस्य श्वो भविष्यति शोभने ॥ ३६ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८

१८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८ इत्युक्ता पार्थिवेनापि किंचिन्नोवाच सा शुभा । मुञ्चन्ती दीर्घमुष्णं च रोषोच्छ्वासं मुहुर्मुहुः ॥ ३७ तस्थावाश्लिष्य हस्ताभ्यां पार्थिवः प्राह रोषिताम् । किं ते कैकेयि दुःखस्य कारणं वद शोभने ॥ ३८ वस्त्राभरणरत्नादि यद्यदिच्छसि शोभने । तत्त्वं गृहीष्व निश्शङ्कं भाण्डारात् सुखिनी भव ॥ ३९ भाण्डारेण मम शुभे श्रोऽर्थसिद्धिर्भविष्यति । यदाभिषेकं सम्प्राप्ते रामे राजीवलोचने ॥ ४० भाण्डागारस्य मे द्वारं मया मुक्तं निरर्गलम् । भविष्यति पुनः पूर्णं रामे राज्यं प्रशासति ॥ ४१ बहु मानय रामस्य अभिषेकं महात्मनः । इत्युक्ता राजवर्येण कैकेयी पापलक्षणा ॥ ४२ कुमतिर्निर्घृणा दुष्टा कुब्जया शिक्षिताब्रवीत् । राजानं स्वपतिं वाक्यं क्रूरमत्यन्तनिष्ठुरम् ॥ ४३ रत्नादि सकलं यत्ते तन्ममैव न संशयः । देवासुरमहायुद्धे प्रीत्या यन्मे वरद्वयम् ॥ ४४ पुरा दत्तं त्वया राजंस्तदिदानीं प्रयच्छ मे । इत्युक्तः पार्थिवः प्राह कैकेयीमशुभां तदा ॥ ४५ अदत्तमप्यहं दास्ये तव नान्यस्य वा शुभे । किं मे प्रतिश्रुतं पूर्वं दत्तमेव मया तव ॥ ४६ शुभाङ्गी भव कल्याणि त्यज कोपमनर्थकम् । रामाभिषेकजं हर्षं भजोत्तिष्ठ सुखी भव ॥ ४७ इत्युक्ता राजवर्येण कैकेयी कलहप्रिया । उवाच परुषं वाक्यं राज्ञो मरणकारणम् ॥ ४८ वरद्वयं पूर्वदत्तं यदि दास्यसि मे विभो । श्वोभूते गच्छतु वनं रामोऽयं कोशलात्मजः ॥ ४९ द्वादशाब्दं निवसतु त्वद्वाक्याद्दण्डके वने । अभिषेकं च राज्यं च भरतस्य भविष्यति ॥ ५०

राजाके इस प्रकार कहनेपर वह सुन्दरी कुछ भी न बोली। बारम्बार क्रोधपूर्वक केवल लम्बी-लम्बी गरम साँसें छोड़ती रही। राजा अपनी भुजाओंसे उसका आलिङ्गन करके बैठ गये और उस रूठी हुई कैकेयीसे बोले—'सुन्दरी कैकेयि! बताओ, तुम्हारे दुःखका क्या कारण है? शुभे! वस्त्र, आभूषण और रत्न आदि जिन-जिन वस्तुओंकी तुम्हें इच्छा हो, उन सबको बिना किसी आशङ्काके भण्डारघरसे ले लो; परंतु प्रसन्न हो जाओ। कल्याणि! कल जब श्रीरामका राज्याभिषेक सम्पन्न हो जायगा, उस समय उस भाण्डारसे मेरे मनोरथकी सिद्धि हो जायगी। इस समय तो मैंने भण्डारघरका द्वार उन्मुक्त कर रखा है। श्रीरामके राज्य-शासन करते समय वह फिर पूर्ण हो जायगा। प्रिये! महात्मा श्रीरामके राज्याभिषेकको तुम इस समय अधिक महत्त्व और सम्मान दो'॥ ३७-४११/२॥ महाराज दशरथके इस प्रकार कहनेपर कुब्जाके द्वारा पढ़ायी गयी पापिनी, दुर्बुद्धि, दयाहीना और दुष्टा कैकेयीने अपने पति महाराज दशरथसे अत्यन्त क्रूरतापूर्वक निष्ठुर वचन कहा—'महाराज! इसमें संदेह नहीं कि आपके जो रत्न आदि हैं, वे सब मेरे ही हैं; किंतु पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर आपने प्रसन्न हो मुझे जो दो वर दिये थे, उन्हें ही इस समय दीजिये'॥ ४२-४४१/२॥ यह सुनकर राजाने उस अशुभा कैकेयीसे कहा—'शुभे! और किसीकी बात तो मैं नहीं कहता, परंतु तुम्हारे लिये तो जिसे नहीं देनेको कहा है, वह वस्तु भी दे दूँगा। फिर जिसको देनेके लिये मैंने पहले प्रतिज्ञा कर ली है, वह वस्तु तो दी हुई ही समझो। कल्याणि! अब सुन्दर वेष धारण करो और यह व्यर्थका कोप छोड़ दो। उठो, श्रीरामके राज्याभिषेकके आनन्दोत्सवमें भाग लो और सुखी हो जाओ'॥ ४५-४७॥ नृपश्रेष्ठ दशरथके यों कहनेपर कलहप्रिया कैकेयीने ऐसी कठोर बात कही, जो आगे चलकर राजाकी मृत्युका कारण बन गयी। उसने कहा—'प्रभो! यदि आप पहलेके दिये हुए दोनों वर मुझे देना चाहते हों तो (पहला वर मैं यही माँगती हूँ कि) ये कौशल्यानन्दन श्रीराम कल सबेरा होते ही वनको चले जायँ और आपकी आज्ञासे ये बारह वर्षोतक दण्डकारण्यमें निवास करें तथा मेरा दूसरा अभीष्ट वर यह है कि अब राज्य और राज्याभिषेक भरतका होगा'॥ ४८-५०॥

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८७

इत्याकर्ण्य स कैकेय्या वचनं घोरमप्रियम्। कैकेयीके इस घोर अप्रिय वचनको सुनकर राजा पपात भुवि निस्संज्ञो राजा सापि विभूषिता ॥ ५१ दशरथ मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े और कैकेयीने (प्रसन्नतापूर्वक) अपने-आपको सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे रात्रिशेषं नयित्वा तु प्रभाते सा मुदावती। विभूषित कर लिया। शेष रात बिताकर प्रातःकाल कैकेयीने दूतं सुमन्त्रमाह्वैवं राम आनीयतामिति ॥ ५२ आनन्दित हो राजदूत सुमन्त्रसे कहा—'श्रीरामको यहाँ बुलाकर लाया जाय।' उस समय राम ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन रामस्तु कृतपुण्याहः कृतस्वस्त्ययनो द्विजैः। और स्वस्तिवाचन कराकर, शङ्ख और तूर्य आदि वाद्योंका यागमण्डपमध्यस्थः शङ्खतूर्यरवान्वितः ॥ ५३ शब्द सुनते हुए यज्ञमण्डपमें विराजमान थे ॥ ५१-५३ ॥

तमासाद्य ततो दूतः प्रणिपत्य पुरःस्थितः। दूत सुमन्त्र उस समय श्रीरामचन्द्रजीके पास पहुँचकर राम राम महाबाहो आज्ञापयति ते पिता ॥ ५४ उन्हें प्रणाम करके सामने खड़े हो गये और बोले—'राम ! महाबाहु श्रीराम ! तुम्हारे पिताजीका आदेश है, जल्दी उठो द्रुतमुत्तिष्ठ गच्छ त्वं यत्र तिष्ठति ते पिता। और जहाँ तुम्हारे पिता विद्यमान हैं, वहाँ चलो।' दूतके यों इत्युक्तस्तेन दूतेन शीघ्रमुत्थाय राघवः ॥ ५५ कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही उठे और ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले कैकेयीके भवनमें जा पहुँचे ॥ ५४-५५ १/२ ॥

अनुज्ञाप्य द्विजान् प्राप्तः कैकेय्या भवनं प्रति। श्रीरामको अपने भवनमें प्रवेश करते देख दयाहीना प्रविशन्तं गृहं रामं कैकेयी प्राह निर्घृणा ॥ ५६ कैकेयीने कहा—'वत्स ! तुम्हारे पिताका यह विचार मैं तुम्हें बता रही हूँ। महाबाहो ! तुम बारह वर्षोंतक वनमें पितुस्तव मतं वत्स इदं ते प्रब्रवीम्यहम्। जाकर रहो। वीर! वहाँ तपस्या करनेका निश्चय मनमें वने वस महाबाहो गत्वा त्वं द्वादशाब्दकम् ॥ ५७ लिये तुम आज ही चले जाओ। बेटा ! तुम्हें अपने मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरे वचनका अद्यैव गम्यतां वीर तपसे धृतमानसः । आदरपूर्वक पालन करो' ॥ ५६-५८ ॥ न चिन्त्यमन्यथा वत्स आदरात् कुरु मे वचः ॥ ५८

कैकेयीके मुखसे पिताका यह वचन सुनकर एतच्छ्रुत्वा पितुर्वाक्यं रामः कमलोचनः । कमलोचन श्रीरामने 'तथास्तु' कहकर पिताकी आज्ञा तथेत्याज्ञां गृहीत्वासौ नमस्कृत्य च तावुभौ ॥ ५९ शिरोधार्य की और उन दोनों—माता-पिताको प्रणाम करके उनके भवनसे निकलकर उन्होंने अपना धनुष निष्क्रम्य तद्गृहाद्रामो धनुरादाय वेश्मतः । सँभाला। फिर कौशल्या और सुमित्राको प्रणाम करके कौशल्यां च नमस्कृत्य सुमित्रां गन्तुमुद्यतः ॥ ६० वे घरसे जानेको तैयार हो गये ॥ ५९-६० ॥

तच्छ्रुत्वा तु ततः पौरा दुःखशोकपरिप्लुताः । यह समाचार सुनते ही समस्त पुरवासीजन दुःख- विव्यथुश्चाथ सौमित्रिः कैकेयीं प्रति रोषितः ॥ ६१ शोकमें डूब गये और बड़ी व्यथाका अनुभव करने लगे। इधर सुमित्राकुमार लक्ष्मण कैकेयीके प्रति कुपित ततस्तं राघवो दृष्ट्वा लक्ष्मणं रक्तलोचनम्। हो उठे। परम बुद्धिमान् धर्मज्ञ श्रीरामने लक्ष्मणको वारयामास धर्मज्ञो धर्मवाग्भिर्महामतिः ॥ ६२ क्रोधसे लाल आँखें किये देख धर्मयुक्त वचनोंद्वारा उन्हें शान्त किया। तत्पश्चात् वहाँ जो बड़े-बूढ़े उपस्थित थे, ततस्तु तत्र ये वृद्धास्तान् प्रणम्य मुनींश्च सः। उनको तथा मुनियोंको प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजी वनकी रामो रथं खिन्नसूतं प्रस्थानायारुरोह वै ॥ ६३ यात्राके लिये रथपर आरूढ़ हुए। उस रथका सारथि बहुत दुःखी था। उस समय राजकुमार श्रीरामने अपने आत्मीयं सकलं द्रव्यं ब्राह्मणेभ्यो नृपात्मजः। पासके समस्त द्रव्य और नाना प्रकारके वस्त्र अत्यन्त श्रद्धया परया दत्त्वा वस्त्राणि विविधानि च ॥ ६४ श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको दान कर दिये ॥ ६१-६४ ॥

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[ अध्याय ४८

[Page Header] १८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८


[Left Column: Sanskrit Shlokas] तिस्रः श्वश्रूः समामन्त्र्य श्वशुरं च विसंज्ञितम्। मुञ्चन्तमश्रुधाराणि नेत्रयोः शोकजानि च ॥ ६५ पश्यती सर्वतः सीता चारुरोह तथा रथम्। रथमारुह्य गच्छन्तं सीतया सह राघवम् ॥ ६६ दृष्ट्वा सुमित्रा वचनं लक्ष्मणं चाह दुःखिता। रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम् ॥ ६७ अयोध्यांमटवीं विद्धि व्रज ताभ्यां गुणाकर। मात्रैवमुक्तो धर्मात्मा स्तनक्षीरार्द्रदेहया ॥ ६८ तां नत्वा चारुयानं तमारुरोह स लक्ष्मणः। गच्छतो लक्ष्मणे भ्राता सीता चैव पतिव्रता ॥ ६९ रामस्य पृष्ठतो यातौ पुराद्बहीरौ महामते। विधिच्छिन्नाभिषेकं तं रामं राजीवलोचनम् ॥ ७० अयोध्याया विनिष्क्रान्तमनुयाताः पुरोहिताः। मन्त्रिणः पौरमुख्याश्च दुःखेन महतान्विताः ॥ ७१ तं च प्राप्य हि गच्छन्तं राममूचुरिदं वचः। राम राम महाबाहो गन्तुं नार्हसि शोभन ॥ ७२ राजन्नत्र निवर्तस्व विहायास्मान् क्व गच्छसि। इत्युक्तो राघवस्तैस्तु तानुवाच दृढव्रतः ॥ ७३ गच्छध्वं मन्त्रिणः पौरा गच्छध्वं च पुरोधसः। पित्रादेशं मया कार्यमभियास्यामि वै वनम् ॥ ७४ द्वादशाब्दं व्रतं चैतन्नीत्वाहं दण्डके वने। आगच्छामि पितुः पादं मातृणां द्रष्टुमञ्जसा ॥ ७५ इत्युक्त्वा ताञ्जगामाथ रामः सत्यपरायणः। तं गच्छन्तं पुनर्याताः पृष्ठतो दुःखिता जनाः ॥ ७६ पुनः प्राह स काकुत्स्थो गच्छध्वं नगरीमिमाम्। मातृश्च पितरं चैव शत्रुघ्नं नगरीमिमाम् ॥ ७७ प्रजाः समस्तास्तत्रस्था राज्यं भरतमेव च। पालयध्वं महाभागास्तपसे याम्यहं वनम् ॥ ७८


[Right Column: Hindi Translation] तदनन्तर सीताजी भी अपनी तीनों सासुओंसे तथा नेत्रोंसे शोकाश्रुकी धारा बहाते हुए संज्ञाशून्य श्वशुर महाराज दशरथसे आज्ञा ले सब ओर देखती हुई रथपर आरूढ़ हुईं। सीताके साथ श्रीरामचन्द्रको रथपर चढ़कर वनमें जाते देख सुमित्रा अत्यन्त दुःखित हो लक्ष्मणसे बोलीं— 'सद्गुणोंकी खान बेटा लक्ष्मण ! तुम आजसे श्रीरामको ही पिता दशरथ समझो, सीताको ही मेरा स्वरूप मानो तथा वनको ही अयोध्या जानो। उन दोनोंके साथ ही सेवाके लिये तुम भी जाओ' ॥ ६५-६७१/२ ॥ स्नेहवश जिनके स्तनोंसे दूध बहकर समस्त शरीरको भिगो रहा था, उन माता सुमित्राके इस प्रकार कहनेपर लक्ष्मण उन्हें प्रणाम करके स्वयं भी उस सुन्दर रथपर जा बैठे। महामते ! इस प्रकार नगरसे वनमें जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीके पीछे धीर-वीर भ्राता लक्ष्मण तथा सुस्थिर-हृदया पतिव्रता सीता—दोनों ही चले ॥ ६८-६९१/२ ॥ दुर्दैवने जिनके राज्याभिषेकको बीचमें ही छिन्न-भिन्न कर दिया था, वे कमलनयन श्रीराम जब अयोध्यापुरीसे निकले, उस समय पुरोहित, मन्त्री और प्रधान-प्रधान पुरवासी भी बहुत दुःखी होकर उनके पीछे-पीछे चले तथा वनकी ओर जाते हुए श्रीरामके निकट पहुँचकर उनसे यों बोले— 'राम ! राम ! महाबाहो ! तुम्हें वनमें नहीं जाना चाहिये। शोभाशाली नरेश्वर ! नगरको लौट चलो; हमें छोड़कर कहाँ जा रहे हो ?' ॥ ७०-७२१/२ ॥ उनके यों कहनेपर दृढ़प्रतिज्ञ श्रीराम उनसे बोले— 'मन्त्रियो ! पुरवासियो ! और पुरोहितगण ! आप लोग लौट जायें। मुझे अपने पिताजीकी आज्ञाका पालन करना है, इसलिये मैं वनमें अवश्य जाऊँगा। वहाँ दण्डकारण्यमें बारह वर्षोंतक वनवासके नियमको पूर्ण करनेके पश्चात् मैं पिता और माताओंके चरण-कमलोंका दर्शन करनेके लिये शीघ्र ही यहाँ लौट आऊँगा' ॥ ७३-७५ ॥ नगर-निवासियाेंसे यों कहकर सत्यपरायण श्रीराम आगे बढ़ गये। उन्हें जाते देख पुनः सब लोग दुःखी हो उनके पीछे-पीछे चलने लगे। तब ककुत्स्थनन्दन श्रीरामने फिर कहा—महाभागगण ! आपलोग इस अयोध्यापुरीको लौट जाइये और मेरे पिता-माताओंकी, भरत-शत्रुघ्नकी, इस अयोध्यानगरीकी, यहाँकि समस्त प्रजाजनोंकी तथा इस राज्यकी भी रक्षा कीजिये। मैं वनमें तपस्याके लिये जाता हूँ' ॥ ७६-७८ ॥


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अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८९ अथ लक्ष्मणमाहेदं वचनं राघवस्तदा। | तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने उस समय लक्ष्मणसे यह सीतामर्पय राजानं जनकं मिथिलेश्वरम् ॥ ७९ | बात कही—'लक्ष्मण! तुम सीताको ले जाकर मिथिलापति | राजा जनकको सौंप आओ और स्वयं पिता-माताके पितृमातृवशे तिष्ठ गच्छ लक्ष्मण याम्यहम्। | अधीन रहो। लौट जाओ, लक्ष्मण! मैं वनको अकेला ही इत्युक्तः प्राह धर्मात्मा लक्ष्मणे भ्रातृवत्सलः ॥ ८० | जाऊँगा।' उनके यों कहनेपर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा लक्ष्मणने | कहा—'प्रभो! करुणानिधान! आप मुझे ऐसी कठोर मैवमाज्ञापय विभो मामद्य करुणाकर। | आज्ञा न दीजिये। आप जहाँ भी जाना चाहते हैं, वहाँ मैं गन्तुमिच्छसि यत्र त्वमवश्यं तत्र याम्यहम् ॥ ८१ | अवश्य चलूँगा।' लक्ष्मणके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने | सीतासे कहा—'शोभने सीते! तुम मेरी आज्ञासे अपने इत्युक्तो लक्ष्मणेनासौ सीतां तामाह राघवः। | पिताके यहाँ चली जाओ अथवा माता कौशल्या और सीते गच्छ ममादेशात् पितरं प्रति शोभने ॥ ८२ | सुमित्राके भवनमें जाकर रहो। सुन्दरि! तुम तबतकके | लिये वहाँ लौट जाओ, जबतक कि मैं वनसे फिर यहाँ सुमित्राया गृहे चापि कौशल्यायाः सुमध्यमे। | आ न जाऊँ' ॥ ७९–८३ ॥ निवर्तस्व हि तावत्त्वं यावदागमनं मम ॥ ८३ | श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर सीता भी | हाथ जोड़कर बोली—'महाबाहो! हे शत्रुदमन! आप इत्युक्ता राघवेनापि सीता प्राह कृताञ्जलिः। | वनमें जहाँ जाकर निवास करेंगे, वहाँ चलकर मैं भी यत्र गत्वा वने वासं त्वं करोषि महाभुज ॥ ८४ | आपके ही साथ रहूँगी। राजन्! सत्यव्रतका पालन | करनेवाले आप पतिदेवका वियोग मैं क्षणभरके लिये तत्र गत्वा त्वया सार्धं वसाम्यहमरिंदम। | भी नहीं सह सकती; इसलिये प्रभो! मैं प्रार्थना करती वियोगं नो सहे राजंस्त्वया सत्यवता क्वचित् ॥ ८५ | हूँ, मुझपर दया करें। प्राणनाथ! आप जहाँ जाना चाहते | हैं, वहाँ मैं भी अवश्य ही चलूँगी' ॥ ८४–८६ ॥ अतस्त्वां प्रार्थयिष्यामि दयां कुरु मम प्रभो। | इसके बाद श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मेरे पीछे गन्तुमिच्छसि यत्र त्वमवश्यं तत्र याम्यहम् ॥ ८६ | बहुत-से पुरुष नाना प्रकारके वाहनोंपर चढ़कर आ गये | हैं तथा झुंड-की-झुंड स्त्रियाँ भी आ गयी हैं; तब नानायानैरुपगताञ्जनान् वीक्ष्य स पृष्ठतः। | धर्मवेत्ता श्रीरामने उन सबको साथ चलनेसे मना किया योषितां च गणान् रामो वारयामास धर्मवित् ॥ ८७ | और कहा—'पुरुषो! और स्त्रियो! आप सब लोग | लौटकर अयोध्यामें स्वच्छन्दतापूर्वक रहें। मैं तपस्याके निवृत्य स्थीयतां स्वैरमयोध्यायां जनाः स्त्रियः। | लिये चित्त एकाग्र करके दण्डकारण्यको जा रहा हूँ। गत्वाहं दण्डकारण्यं तपसे धृतमानसः ॥ ८८ | वहाँ कुछ ही वर्षोंतक रहनेके बाद मैं अपनी पत्नी सीता | और भाई लक्ष्मणके साथ यहाँ लौट आऊँगा, यह मैंने कतिपयाब्दादायास्ये नान्यथा सत्यमीरितम्। | सच्ची बात बतायी है। इसे अन्यथा नहीं मानना लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या च स्वभार्यया ॥ ८९ | चाहिये' ॥ ८७–८९ ॥ | इस प्रकार अयोध्यावासी लोगोंको लौटाकर जनान्निवर्त्य रामोऽसौ जगाम च गुहाश्रमम्। | श्रीरामने गुहके आश्रमपर पदार्पण किया। गुह स्वभावसे गुहस्तु रामभक्तोऽसौ स्वभावादेव वैष्णवः ॥ ९० | ही वैष्णव तथा श्रीरामचन्द्रजीका परम भक्त था। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८

१९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा किं कर्तव्यमिति स्थितः। महता तपसाऽऽनीता गुरुणा या हि वः पुरा॥ ९१ भगीरथेन या भूमिं सर्वपापहरा शुभा। नानामुनिजनैर्जुष्टा कूर्ममत्स्यसमाकुला॥ ९२ गङ्गा तुङ्गोर्मिमालाढ्या स्फटिकाभजलावहा। गुहोपनीतनावा तु तां गङ्गां स महाद्युतिः॥ ९३ उत्तीर्य भगवान् रामो भरद्वाजाश्रमं शुभम्। प्रयागे तु ततस्तस्मिन् स्नात्वा तीर्थे यथाविधि॥ ९४ लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा राघवः सीतया सह। भरद्वाजाश्रमे तत्र विश्रान्तस्तेन पूजितः॥ ९५ ततः प्रभाते विमले तमनुज्ञाप्य राघवः। भरद्वाजोक्तमार्गेण चित्रकूटं शनैर्ययौ॥ ९६ नानाद्रुमलताकीर्णं पुण्यतीर्थमनुत्तमम्। तापसं वेषमास्थाय जह्नुकन्यामतीत्य वै॥ ९७ गते रामे सभार्थे तु सह भ्रात्रा ससारथौ। अयोध्यामवसन् भूप नष्टशोभां सुदुःखिताः॥ ९८ नष्टसंज्ञो दशरथः श्रुत्वा वचनमप्रियम्। रामप्रवासजननं कैकेय्या मुखनिस्सृतम्॥ ९९ लब्धसंज्ञः क्षणाद्राजा रामरामेति चुक्रुशे। कैकेय्युवाच भूपालं भरतं चाभिषेचय॥ १०० सीतालक्ष्मणसंयुक्तो रामचन्द्रो वनं गतः। पुत्रशोकाभिसंतप्तो राजा दशरथस्तदा॥ १०१ विहाय देहं दुःखेन देवलोकं गतस्तदा। ततस्तस्य महापुर्यामयोध्यायामरिंदम॥ १०२ रुरुदुःखशोकार्त्ता जनाः सर्वे च योषितः। कौशल्या च सुमित्रा च कैकेयी कष्टकारिणी॥ १०३ भगवान् रामको देखते ही वह उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला—'भगवान्! मैं क्या सेवा करूँ'॥ ९० १/२॥ [यों कहकर गुहने सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका सादर पूजन एवं सत्कार किया। इसके बाद सबेरे सारथि और रथको लौटाकर वे गङ्गाजीके तटपर गये और पुनः कहने लगे—] राजन्! जिन्हें आपके पूर्वज महाराज भगीरथ पूर्वकालमें बड़ी तपस्या करके पृथ्वीपर ले आये थे, जो समस्त पापहारिणी और कल्याणकारिणी हैं, अनेकानेक मुनिजन जिनका सेवन करते हैं, जिनमें कूर्म और मत्स्य आदि जल-जन्तु भरे रहते हैं, जो ऊँची-ऊँची लहरोंसे सम्पन्न एवं स्फटिकमणिके समान स्वच्छ जल बहानेवाली हैं, उन पुण्यसलिला गङ्गाजीको गुहके द्वारा लायी हुई नावसे पार करके महान् कान्तिमान् भगवान् श्रीराम भरद्वाज मुनिके शुभ आश्रमपर गये॥ ९१-९३ १/२॥ वह आश्रम प्रयागमें था। श्रीरामचन्द्रजीने सीता तथा भाई लक्ष्मणके साथ उस प्रयागतीर्थमें विधिवत् स्नान करके, वहीं भरद्वाज ऋषिके आश्रममें उनसे सम्मान प्राप्तकर रात्रिमें विश्राम किया। फिर निर्मल प्रभातकाल होनेपर श्रीराम तपस्वीवेष धारणकर, भरद्वाज मुनिसे आज्ञा ले, उन्हींके बताये हुए मार्गसे गङ्गाके पार हो, धीरे-धीरे नाना प्रकारके वृक्ष और लताओंसे आच्छन्न परम उत्तम पावन तीर्थ चित्रकूटको गये॥ ९४-९७॥ राजन्! इधर सीता-लक्ष्मण और सारथिके सहित रामचन्द्रजीके चले जानेपर अयोध्यावासीजन बहुत दुःखी होकर शोभाशून्य अयोध्यानगरीमें रहने लगे। राजा दशरथ तो कैकेयीके मुखसे निर्गत श्रीरामको वनवास देनेवाले अप्रिय वचनको सुनते ही मूर्च्छित हो गये थे। कुछ देर बाद जब राजाको होश हुआ, तब वे उच्चस्वरसे 'राम! राम!' पुकारने लगे। तब कैकेयीने भूपालसे कहा— 'राम तो सीता और लक्ष्मणके साथ वनमें चले गये; अब आप भरतका राज्याभिषेक कीजिये।' यह सुनते ही राजा दशरथ पुत्रशोकसे संतप्त हो, दुःखके मारे शरीर त्यागकर देवलोकको चले गये॥ ९८-१०१ १/२॥ शत्रुदमन! तब उनकी महानगरी अयोध्यामें रहनेवाले सभी स्त्री-पुरुष दुःख और शोकसे पीड़ित हो विलाप करने लगे। कौशल्या, सुमित्रा तथा कष्टकारिणी In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १९१


[संस्कृत श्लोक]

परिवार्य मृतं तत्र रुरुदुस्ताः पतिं ततः । ततः पुरोहितस्तत्र वसिष्ठः सर्वधर्मवित् ॥ १०४ तैलद्रोण्यां विनिक्षिप्य मृतं राजकलेवरम् । दूतं वै प्रेषयामास सहमन्त्रिगणैः स्थितः ॥ १०५ स गत्वा यत्र भरतः शत्रुघ्नेन सह स्थितः । तत्र प्राप्य तथा वार्तां संनिवर्त्य नृपात्मजौ ॥ १०६ तावानीय ततः शीघ्रमयोध्यां पुनरागतः । क्रूराणि दृष्ट्वा भरतो निमित्तानि च वै पथि ॥ १०७ विपरीतं त्वयोध्यायामिति मेने स पार्थिवः । निश्शोभां निर्गतश्रीकां दुःखशोकान्वितां पुरीम् ॥ १०८ कैकेय्याग्निविनिर्दग्धामयोध्यां प्रविवेश सः । दुःखान्विता जनाः सर्वे तौ दृष्ट्वा रुरुदुर्भृशम् ॥ १०९ हा तात राम हा सीते लक्ष्मणेति पुनः पुनः । रुरोद भरतस्तत्र शत्रुघ्नश्च सुदुःखितः ॥ ११० कैकेय्यास्तत्क्षणाच्छ्रुत्वा चुक्रोध भरतस्तदा । दुष्टा त्वं दुष्टचित्ता च यया रामः प्रवासितः ॥ १११ लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा राघवः सीतया वनम् । साहसं किं कृतं दुष्टे त्वया सद्योऽल्पभाग्यया ॥ ११२ उद्वास्य सीतया रामं लक्ष्मणेन महात्मना । ममैव पुत्रं राजानं करोत्विति मतिस्तव ॥ ११३ दुष्टाया नष्टभाग्यायाः पुत्रोऽहं भाग्यवर्जितः । भ्रात्रा रामेण रहितो नाहं राज्यं करोमि वै ॥ ११४ यत्र रामो नरव्याघ्रः पद्मपत्रायतेक्षणः । धर्मज्ञः सर्वशास्त्रज्ञो मतिमान् बन्धुवत्सलः ॥ ११५ सीता च यत्र वैदेही नियमव्रतचारिणी । पतिव्रता महाभागा सर्वलक्षणसंयुता ॥ ११६


[हिन्दी अनुवाद]

कैकेयी भी अपने मृत पतिको चारों ओरसे घेरकर रोने लगीं ॥ १०२-१०३ १/२ ॥ तब सब धर्मोंको जाननेवाले पुरोहित वसिष्ठजीने वहाँ आकर सबको शान्त किया और राजाके मृत शरीरको तेलसे भरी हुई नौकामें रखवाकर, मन्त्रिगणोंके साथ विचार करके, भरत-शत्रुघ्नको बुलानेके लिये दूत भेजा। वह दूत जहाँ शत्रुघ्नके साथ भरतजी थे, वहाँ गया और जितना उसे बताया गया था, उतना ही संदेश सुनाकर, उन दोनों राजकुमारोंको वहाँसे लौटाकर, उन्हें साथ ले, शीघ्र ही अयोध्यामें लौट आया। राजा भरत मार्गमें घोर अपशकुन देख मन-ही-मन यह जान गये कि 'अयोध्यामें कोई विपरीत घटना घटित हुई है।' फिर जो कैकेयीरूपी अग्निसे दग्ध होकर शोभाहीन, निस्तेज और दुःख-शोकसे परिपूर्ण हो गयी थी, उस अयोध्यापुरीमें भरतजीने प्रवेश किया। उस समय भरत और शत्रुघ्नको देख सभी लोग दुःखी हो 'हा तात! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!' इस प्रकार बारम्बार पुकारते हुए बहुत विलाप करने लगे। यह देख भरत और शत्रुघ्न भी दुःखी होकर रोने लगे ॥ १०४-११० ॥ उस समय कैकेयीके मुखसे तत्काल सारा वृत्तान्त सुनकर भरतजी उसके ऊपर बहुत ही कुपित हुए और बोले—'अरी! तू तो बड़ी दुष्टा है। तेरे चित्तमें दुष्टतापूर्ण विचार भरा हुआ है। हाय! जिसने श्रीरामको वनवास दे दिया, जिसके कारण भाई लक्ष्मण और देवी सीताके साथ श्रीरघुनाथजीको वनमें जानेको विवश होना पड़ा, उससे बढ़कर दुष्टा कौन स्त्री होगी? अरी दुष्टे! ओ मन्दभागिनी! तूने तत्काल ऐसा दुस्साहस कैसे किया? तूने सोचा होगा कि महात्मा लक्ष्मण और साध्वी सीताके साथ रामको घरसे निकालकर महाराजा दशरथ मेरे ही पुत्रको राजा बना देंगे। (धिक्कार है तेरी इस कुबुद्धिको!) आह! मैं कितना भाग्यहीन हूँ, जो तुझ-जैसी अभागिनी दुष्टा स्त्रीका पुत्र हुआ। किंतु तू निश्चय जान, मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामसे अलग रहकर राज्य नहीं करूँगा। जहाँ मनुष्योंमें श्रेष्ठ, धर्मज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता, बुद्धिमान् तथा भाइयोंपर स्नेह रखनेवाले पूज्य भ्राता कमलदललोचन श्रीरामचन्द्रजी गये हैं, जहाँ नियम और व्रतका आचरण करनेवाली, समस्त शुभलक्षणोंसे युक्त, अत्यन्त सौभाग्य-शालिनी पतिव्रता विदेहराजकुमारी सीताजी विद्यमान हैं

१९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८

१९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८

लक्ष्मणश्च महावीर्यो गुणवान् भ्रातृवत्सलः। तत्र यास्यामि कैकेयि महत्पापं त्वया कृतम्॥ ११७

राम एव मम भ्राता ज्येष्ठो मतिमतां वरः। स एव राजा दुष्टात्मे भृत्योऽहं तस्य वै सदा ॥ ११८

इत्युक्त्वा मातरं तत्र रुरोद भृशदुःखितः। हा राजन् पृथिवीपाल मां विहाय सुदुःखितम् ॥ ११९

क्व गतोऽस्यद्य वै तात किं करोमीह तद्वद । भ्राता पित्रा समः क्वास्ते ज्येष्ठो मे करुणाकरः ॥ १२०

सीता च मातृतुल्या मे क्व गतो लक्ष्मणश्च ह। इत्येवं विलपन्तं तं भरतं मन्त्रिभिः सह ॥ १२१

वसिष्ठो भगवानाह कालकर्मविभागवित्। उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्स त्वं न शोकं कर्तुमर्हसि ॥ १२२

कर्मकालवशादेव पिता ते स्वर्गमास्थितः। तस्य संस्कारकार्याणि कर्माणि कुरु शोभन ॥ १२३

रामोऽपि दुष्टनाशाय शिष्टानां पालनाय च। अवतीर्णो जगत्स्वामी स्वांशेन भुवि माधवः ॥ १२४

प्रायस्तत्रास्ति रामेण कर्तव्यं लक्ष्मणेन च । यत्रासौ भगवान् वीरः कर्मणा तेन चोदितः ॥ १२५

तत्कृत्वा पुनरायाति रामः कमललोचनः। इत्युक्तो भरतस्तेन वसिष्ठेन महात्मना ॥ १२६

संस्कारं लम्भयामास विधिदृष्टेन कर्मणा । अग्निहोत्राग्निना दग्ध्वा पितुर्देहं विधानतः ॥ १२७

स्नात्वा सरय्वाः सलिले कृत्वा तस्योदकक्रियाम्। शत्रुघ्नेन सह श्रीमान्मातृभिर्बान्धवैः सह ॥ १२८

तस्यौर्ध्वदेहिकं कृत्वा मन्त्रिणा मन्त्रिनायकः। हस्त्यश्वरथपत्तीभिः सह प्रायान्महामतिः ॥ १२९


और जहाँ भाईमें भक्ति रखनेवाले, सद्गुणसम्पन्न, महान् पराक्रमी लक्ष्मणजी गये हैं, वहीं मैं भी जाऊँगा। कैकेयि ! तूने रामको वनवास देकर महान् पाप किया है। दुष्टहृदये ! बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं, वे ही राजा होनेके अधिकारी हैं। मैं तो सदा उनका दास हूँ' ॥ १११-११८॥

मातासे यों कहकर भरतजी अत्यन्त दुःखी हो, वहाँ फूट-फूटकर रोने लगे और विलाप करने लगे—'हा राजन् ! हा वसुधाप्रतिपालक ! हा तात ! मुझ अत्यन्त दुःखी बालकको छोड़कर आप कहाँ चले गये ? बताइये, मैं अब यहाँ क्या करूँ ? पिताके तुल्य दया करनेवाले मेरे ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम कहाँ हैं ? माताके समान पूजनीया सीता कहाँ हैं और मेरा प्यारा भाई लक्ष्मण कहाँ चला गया ?' ॥ ११९-१२०१/२ ॥

भरतको इस प्रकार विलाप करते देख काल और कर्मके विभागको जाननेवाले भगवान् वसिष्ठजी मन्त्रियोंके साथ वहाँ आकर बोले—'बेटा ! उठो, उठो; तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। भद्र ! काल और कर्मके वशीभूत होकर ही तुम्हारे पिता स्वर्गवासी हुए हैं; अब तुम उनके अन्त्येष्टिसंस्कार आदि कर्म करो। भगवान् श्रीराम साक्षात् लक्ष्मीपति नारायण हैं। वे जगदीश्वर दुष्टोंका नाश और साधुपुरुषोंका पालन करनेके लिये ही अपने अंशसे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं। वनमें श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा बहुत-से कार्य होनेवाले हैं। वहाँ वीरवर कमललोचन श्रीरामचन्द्रजी उन्हीं कर्तव्यकर्मोंसे प्रेरित होकर रहेंगे और उन्हें पूर्ण करके यहाँ लौट आयेंगे' ॥ १२१-१२५१/२ ॥

उन महात्मा वसिष्ठजीके यों कहनेपर भरतजीने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पिताका और्ध्वदेहिक संस्कार किया। उस समय उन्होंने अग्निहोत्रकी अग्निसे पिताके शवका विधिपूर्वक दाह किया। फिर सरयूके जलमें स्नान करके श्रीमान् भरतने भाई शत्रुघ्न, सब माताओं तथा अन्य बन्धुजनोंके साथ परलोकगत पिताके लिये तिलसहित जलकी अञ्जलि दी॥ १२६-१२८॥

इस प्रकार पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार करके मन्त्रियोंके अधिपति साधुश्रेष्ठ महाबुद्धिमान् भरतजी अपने मन्त्रियों तथा हाथी, घोड़े, रथ एवं पैदल, सेनाओंके साथ (माताओं तथा बन्धुजनोंको भी साथ

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १९३ भरतो राममन्वेष्टुं राममार्गेण सत्तमः। तमायान्तं महासैनं रामस्यानुविरोधिनम्॥ १३० मत्वा तं भरतं शत्रुं रामभक्तो गुहस्तदा। स्वं सैन्यं वर्तुलं कृत्वा संनद्धः कवची रथी॥ १३१ महाबलपरीवारो रुरोध भरतं पथि॥ १३२ सभ्रातृकं सभार्यं मे रामं स्वामिनमुत्तमम्। प्रापयस्त्वं वनं दुष्ट साम्प्रतं हन्तुमिच्छसि॥ १३३ गमिष्यसि दुरात्मंस्त्वं सेनया सह दुर्मते। इत्युक्तो भरतस्तत्र गुहेन नृपनन्दनः॥ १३४ तमुवाच विनीतात्मा रामायाथ कृताञ्जलिः। यथा त्वं रामभक्तोऽसि तथाहमपि भक्तिमान्॥ १३५ प्रोषिते मयि कैकेय्या कृतमेतन्महामते। रामस्यानयनार्थाय व्रजाम्यद्य महामते॥ १३६ सत्यपूर्वं गमिष्यामि पन्थानं देहि मे गुह। इति विश्वासमानीय जाह्नवीं तेन तारितः॥ १३७ नौकावृन्दैरनेकैस्तु स्नात्वासौ जाह्नवीजले। भरद्वाजाश्रमं प्राप्तो भरतस्तं महामुनिम्॥ १३८ प्रणम्य शिरसा तस्मै यथावृत्तमुवाच ह। भरद्वाजोऽपि तं प्राह कालेन कृतमीदृशम्॥ १३९ दुःखं न तावत् कर्तव्यं रामार्थेऽपि त्वयाधुना। वर्तते चित्रकूटोऽसौ रामः सत्यपराक्रमः॥ १४० त्वयि तत्र गते वापि प्रायोऽसौ नागमिष्यति। तथापि तत्र गच्छ त्वं यदसौ वक्ति तत्कुरु॥ १४१ रामस्तु सीतया सार्धं वनखण्डे स्थितः शुभे। लक्ष्मणस्तु महावीर्यो दुष्टालोकनतत्परः॥ १४२ ले) श्रीरामचन्द्रजीका अन्वेषण करनेके लिये जिस मार्गसे वे गये थे, उसी मार्गसे चले। उस समय भरत (और शत्रुघ्न)-को इतनी बड़ी सेनाके साथ आते देख, उन्हें श्रीरामचन्द्रजीका विरोधी शत्रु समझकर रामभक्त गुहने युद्धके लिये सुसज्जित हो, अपनी सेना गोलाकार खड़ी की और कवच धारणकर, रथारूढ़ हो, उस विशाल सेनासे घिरे हुए उसने मार्गमें भरतको रोक दिया। उसने कहा—'दुष्ट! दुरात्मन्! दुर्बुद्धे! तूने मेरे श्रेष्ठ स्वामी श्रीरामको भाई और पत्नीसहित वनमें तो भिजवा ही दिया; क्या अब उन्हें मारना भी चाहते हो, जो (इतनी बड़ी) सेनाके साथ वहाँ जा रहे हो?'॥ १२९-१३३ १/२ ॥ गुहके यों कहनेपर राजकुमार भरत श्रीरामके उद्देश्यसे हाथ जोड़कर विनययुक्त होकर उससे बोले—'गुह! जैसे तुम श्रीरामचन्द्रजीके भक्त हो, वैसे ही मैं भी उनमें भक्ति रखता हूँ। महामते! मैं नगरसे बाहर (मामाके घर) चला गया था, उस समय कैकेयीने यह अनर्थ कर डाला। महाबुद्धे! आज मैं श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये जा रहा हूँ। तुमसे यह सत्य बात बताकर वहाँ जाना चाहता हूँ। तुम मुझे मार्ग दे दो'॥ १३४-१३६ १/२ ॥ इस प्रकार विश्वास दिलानेपर गुह उन्हें गङ्गातटपर ले आया और झुंड-की-झुंड नौकाएँ मँगाकर उनके द्वारा उन सबको पार कर दिया। फिर गङ्गाजीके जलमें स्नान करके भरतजी भरद्वाजमुनिके आश्रमपर पहुँचे और उन महामुनिके चरणोंमें मस्तक झुका, प्रणाम करके उन्होंने उनसे अपना यथार्थ वृत्तान्त कह सुनाया॥ १३७-१३८ १/२ ॥ भरद्वाजजीने भी उनसे कहा—'भरत! कालके ही प्रभावसे ऐसा काण्ड घटित हुआ है। अब तुम्हें श्रीरामके लिये भी खेद नहीं करना चाहिये। सत्यपराक्रमी वे श्रीरामचन्द्रजी इस समय चित्रकूटमें हैं। वहाँ तुम्हारे जानेपर भी वे प्रायः नहीं आ सकेंगे; तथापि तुम वहाँ जाओ और जैसे वे कहें, वैसे ही करो। श्रीरामचन्द्रजी सीताके साथ एक सुन्दर वनखण्डमें निवास करते हैं और महान् पराक्रमी लक्ष्मण दुष्ट जीवोंपर दृष्टि रखते हैं—उनकी रक्षामें तत्पर रहते हैं'॥ १३९-१४२ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_8_1_Front... Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८ इत्युक्तो भरतस्तत्र भरद्वाजेन धीमता। उत्तीर्य यमुनां यातश्चित्रकूटं महानगम्॥ १४३ स्थितोऽसौ दृष्टवान्दूरात्सधूलीं चोत्तरां दिशम्। रामाय कथयित्वाऽऽस तदादेशात्तु लक्ष्मणः॥ १४४ वृक्षमारुह्य मेधावी वीक्षमाणः प्रयत्नतः। स ततो दृष्टवान् हृष्टामायान्तीं महतीं चमूम्॥ १४५ हस्त्यश्वरथसंयुक्तां दृष्ट्वा राममथाब्रवीत्। हे भ्रातस्त्वं महाबाहो सीतापाश्र्वे स्थिरो भव॥ १४६ भूपोऽस्ति बलवान् कश्चिद्धस्त्यश्वरथपत्तिभिः। इत्याकर्ण्य वचस्तस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः॥ १४७ रामस्तमब्रवीद्वीरो वीरं सत्यपराक्रमः। प्रायेण भरतोऽस्माकं द्रष्टुमायाति लक्ष्मण॥ १४८ इत्येवं वदतस्तस्य रामस्य विदितात्मनः। आरात्संस्थाप्य सेनां तां भरतो विनयान्वितः॥ १४९ ब्राह्मणैर्मन्त्रिभिः सार्धं रुदन्नागत्य पादयोः। रामस्य निपपाताथ वैदेह्या लक्ष्मणस्य च॥ १५० मन्त्रिणो मातृवर्गश्च स्निग्धबन्धुसुहृज्जनाः। परिवार्य ततो रामं रुरुदुः शोककातराः॥ १५१ स्वर्यातं पितरं ज्ञात्वा ततो रामो महामतिः। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्याथ समन्वितः॥ १५२ स्नात्वा मलापहे तीर्थे दत्त्वा च सलिलाञ्जलिम्। मात्रादीनभिवाद्याथ रामो दुःखसमन्वितः॥ १५३ उवाच भरतं राजन् दुःखेन महतान्वितम्। अयोध्यां गच्छ भरत इतः शीघ्रं महामते॥ १५४ राज्ञा विहीनां नगरीं अनाथां परिपालय। इत्युक्तो भरतः प्राह रामं राजीवलोचनम्॥ १५५ त्वामृते पुरुषव्याघ्र न यास्येऽहमितो ध्रुवम्। यत्र त्वं तत्र यास्यामि वैदेही लक्ष्मणो यथा॥ १५६ बुद्धिमान् भरद्वाजजीके यों कहनेपर भरतजी यमुना पार करके महान् पर्वत चित्रकूटपर गये। वहाँ खड़े हुए लक्ष्मणजीने दूरसे उत्तर दिशामें धूल उड़ती देख श्रीरामचन्द्रजीको सूचित किया। फिर उनकी आज्ञासे वृक्षपर चढ़कर बुद्धिमान् लक्ष्मणजी प्रयत्नपूर्वक उधर देखने लगे। तब उन्हें वहाँ बहुत बड़ी सेना आती दिखायी दी, जो हर्ष एवं उत्साहसे भरी जान पड़ती थी। हाथी, घोड़े और रथोंसे युक्त उस सेनाको देखकर लक्ष्मणजी श्रीरामसे बोले—'भैया! तुम सीताके पास स्थिरतापूर्वक बैठे रहो। महाबाहो! कोई महाबली राजा हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसे युक्त चतुरङ्गिणी सेनाके साथ आ रहा है'॥ १४३-१४६१/२॥ महात्मा लक्ष्मणके ऐसे वचन सुनकर सत्यपराक्रमी वीरवर श्रीराम अपने उस वीर भ्रातासे बोले—'लक्ष्मण! मुझे तो प्रायः यही जान पड़ता है कि भरत ही हम लोगोंसे मिलनेके लिये आ रहे हैं।' विदितात्मा भगवान् श्रीराम जिस समय यों कह रहे थे, उसी समय विनयशील भरतजी वहाँ पहुँचे और सेनाको कुछ दूरीपर ठहराकर स्वयं ब्राह्मणों और मन्त्रियोंके साथ निकट आ, सीता और लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामके चरणोंपर रोते हुए गिर पड़े। फिर मन्त्री, माताएँ, स्नेही बन्धु तथा मित्रगण श्रीरामको चारों ओरसे घेरकर शोकमग्न हो रोने लगे॥ १४७-१५१॥ तदनन्तर महामति श्रीरामने अपने पिताके स्वर्गगामी होनेका समाचार पाकर भ्राता लक्ष्मण और जानकीके साथ वहाँके पापनाशक तीर्थमें स्नान करके जलाञ्जलि दी। राजन्! फिर माता आदि गुरुजनोंको प्रणाम करके रामचन्द्रजी दुःखी हो अत्यन्त खेदमें पड़े हुए भरतसे बोले—'महामते भरत! तुम अब यहाँसे शीघ्र अयोध्याको चले जाओ और राजासे हीन हुई उस अनाथ नगरीका पालन करो।' उनके यों कहनेपर भरतने कमलनयन रामसे कहा—'पुरुषश्रेष्ठ! यह निश्चय है कि मैं आपको साथ लिये बिना यहाँसे नहीं जाऊँगा। जहाँ आप जायँगे, वहीं सीता-लक्ष्मणकी भाँति मैं भी चलूँगा'॥ १५२-१५६॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth3 Narsingpuran_Section_8_1_Back

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १९५ इत्याकर्ण्य पुनः प्राह भरतं पुरतः स्थितम्। नृणां पितृसमो ज्येष्ठः स्वधर्ममनुवर्तिनाम् ॥ १५७ यथा न लङ्घ्यं वचनं मया पितृमुखेरितम्। तथा त्वया न लङ्घ्यं स्याद्वचनं मम सत्तम ॥ १५८ मत्समीपादितो गत्वा प्रजास्त्वं परिपालय। द्वादशाब्दिकमेतन्मे व्रतं पितृमुखेरितम् ॥ १५९ तदरण्ये चरित्वा तु आगमिष्यामि तेऽन्तिकम्। गच्छ तिष्ठ ममादेशे न दुःखं कर्तुमर्हसि ॥ १६० इत्युक्तो भरतः प्राह बाष्पपर्याकुलेक्षणः। यथा पिता तथा त्वं मे नात्र कार्या विचारणा ॥ १६१ तवादेशान्मया कार्यं देहि त्वं पादुके मम। नन्दिग्रामे वसिष्येऽहं पादुके द्वादशाब्दिकम् ॥ १६२ त्वद्वेषमेव मन्द्वेषं त्वद्व्रतं मे महाव्रतम्। त्वं द्वादशाब्दिकादूर्ध्वं यदि नायासि सत्तम ॥ १६३ ततो हविर्यथा चाग्नौ प्रधक्ष्यामि कलेवरम्। इत्येवं शपथं कृत्वा भरतो हि सुदुःखितः ॥ १६४ बहु प्रदक्षिणं कृत्वा नमस्कृत्य च राघवम्। पादुके शिरसा स्थाप्य भरतः प्रस्थितः शनैः ॥ १६५ स कुर्वन् भ्रातुरादेशं नन्दिग्रामे स्थितो वशी। तपस्वी नियताहारः शाकमूलफलाशनः ॥ १६६ जटाकलापं शिरसा च बिभ्रत् त्वचश्च वार्क्षीः किल वन्यभोजी। रामस्य वाक्यादरतो हृदि स्थितं बभार भूभारमनिन्दितात्मा ॥ १६७ यह सुनकर श्रीरामने अपने सामने खड़े हुए भरतसे पुनः कहा—'साधुश्रेष्ठ भरत ! अपने धर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंके लिये ज्येष्ठ भ्राता पिताके समान पूज्य है। जिस प्रकार मुझे पिताके मुखसे निकले हुए वचनका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये, वैसे ही तुम्हें भी मेरे वचनोंका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। अब तुम यहाँ मेरे निकटसे जाकर प्रजाजनका पालन करो। पिताके मुखसे कहा हुआ जो यह बारह वर्षोंके वनवासका व्रत मैंने स्वीकार किया है, उसका वनमें पालन करके मैं पुनः तुम्हारे पास आ जाऊँगा। जाओ, मेरी आज्ञाके पालनमें लग जाओ; तुम्हें खेद नहीं करना चाहिये' ॥ १५७-१६०॥ उनके यों कहनेपर भरतने आँखोंमें आँसू भरकर कहा—'भैया ! इसके सम्बन्धमें मुझे कोई विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है कि मेरे लिये जैसे पिताजी थे, वैसे ही आप हैं। अब मैं आपके आदेशके अनुसार ही कार्य करूँगा; किंतु आप अपनी दोनों चरणपादुकाएँ मुझे दे दें। मैं इन्हीं पादुकाओंका आश्रय ले नन्दिग्राममें निवास करूँगा और आपकी ही भाँति बारह वर्षोंतक व्रतका पालन करूँगा। अब आपके वेषके समान ही मेरा वेष होगा और आपका जो व्रत है, वही मेरा भी महान् व्रत होगा। साधुशिरोमणे! यदि आप बारह वर्षोंके व्रतका पालन करनेके बाद तुरंत नहीं पधारेंगे तो मैं अग्निमें हविष्यकी भाँति अपने शरीरको होम दूँगा।' अत्यन्त दुःखी भरतजीने इस प्रकार शपथ करके भगवान् रामकी अनेक बार प्रदक्षिणा की, बारंबार उन्हें प्रणाम किया और उनकी चरणपादुकाएँ अपने सिरपर रखकर वे वहाँसे धीरे-धीरे चल दिये ॥ १६१–१६५॥ भरतजी अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके, शाक और मूल-फलादिका नियमित आहार करते हुए, तपोनिष्ठ हो, भ्राताके आदेशका पालन करते हुए नन्दिग्राममें रहने लगे। विशुद्ध हृदयवाले भरतजी अपने सिरपर जटा धारण किये और अङ्गोंमें वल्कल पहने, वन्य फलोंका ही आहार करते थे। वे मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजीके वचनोंमें श्रद्धा रखनेके कारण अपने ऊपर पड़े पृथ्वीके शासनका भार ढोने लगे ॥ १६६-१६७॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे श्रीरामप्रादुर्भावे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें श्रीरामावतारविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_8_2_FrontPublic Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४९

१९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४९ उनचासवाँ अध्याय श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना; शूर्पणखाका अनादर; सीताहरण; जटायुवध और शबरीको दर्शन देना मार्कण्डेय उवाच गतेऽथ भरते तस्मिन् रामः कमललोचनः। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा भार्यया सीतया सह॥ १ शाकमूलफलाहारो विचचार महावने। कदाचिल्लक्ष्मणमृते रामदेवः प्रतापवान्॥ २ चित्रकूटवनोद्देशे वैदेह्युत्सङ्गमाश्रितः। सुष्वाप स मुहूर्तं तु ततः काको दुरात्मवान्॥ ३ सीताभिमुखमभ्येत्य विददार स्तनान्तरम्। विदार्य वृक्षमRole/ारुह्य स्थितोऽसौ वायसाधमः॥ ४ ततः प्रबुद्धो रामोऽसौ दृष्ट्वा रक्तं स्तनान्तरे। शोकाविष्टां तु सीतां तामुवाच कमलेक्षणः॥ ५ वद स्तनान्तरे भद्रे तव रक्तस्य कारणम्। इत्युक्ता सा च तं प्राह भर्तारं विनयान्विता॥ ६ पश्य राजेन्द्र वृक्षाग्रे वायसं दुष्टचेष्टितम्। अनेनैव कृतं कर्म सुप्ते त्वयि महामते॥ ७ रामोऽपि दृष्टवान् काकं तस्मिन् क्रोधमथाकरोत्। इषीकास्त्रं समाधाय ब्रह्मास्त्रेणाभिमन्त्रितम्॥ ८ काकमुद्दिश्य चिक्षेप सोऽप्यधावद्भयान्वितः। स त्विन्द्रस्य सुतो राजन्निन्द्रलोकं विवेश ह॥ ९ रामास्त्रं प्रज्वलद्दीप्तं तस्यानु प्रविवेश वै। विदितार्थश्च देवेन्द्रो देवैः सह समन्वितः॥ १० निष्कामयच्च तं दुष्टं राघवस्यापकारिणम्। ततोऽसौ सर्वदेवैस्तु देवलोकाद्वहिः कृतः॥ ११ पुनः सोऽप्यपतद्रामं राजानं शरणं गतः। पाहि राम महाबाहो अज्ञानादपकारिणम्॥ १२


हिन्दी अनुवाद

मार्कण्डेयजी कहते हैं— भरतजीके अयोध्या लौट जानेपर कमललोचन श्रीरामचन्द्रजी अपनी भार्या सीता और भाई लक्ष्मणके साथ शाक और मूल-फल आदिके आहारसे ही जीवन-निर्वाह करते हुए उस महान् वनमें विचरने लगे। एक दिन परम प्रतापी भगवान् राम लक्ष्मणको साथ न ले जाकर चित्रकूट पर्वतके वनमें सीताजीकी गोदमें कुछ देरतक सोये रहे। इतनेमें ही एक दुष्ट कौएने सीताके सम्मुख आ उनके स्तनोंके बीच चोंच मारकर घाव कर दिया। घाव करके वह अधम काक वृक्षपर जा बैठा॥ १-४॥ तदनन्तर जब कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीकी नींद खुली, तब उन्होंने देखा, सीताके स्तनोंसे रक्त बह रहा है और वे शोकमें डूबी हुई हैं। यह देख उन्होंने सीतासे पूछा—'कल्याणि! बताओ, तुम्हारे स्तनोंके बीचसे रक्त बहनेका क्या कारण है?' उनके यों कहनेपर सीताने अपने स्वामीसे विनयपूर्वक कहा—'राजेन्द्र! महामते! वृक्षकी शाखापर बैठे हुए इस दुष्ट कौएको देखिये; आपके सो जानेपर इसीने यह दुस्साहसपूर्ण कार्य किया है'॥ ५-७॥ रामचन्द्रजीने भी उस कौएको देखा और उसपर बहुत ही क्रोध किया। फिर सींकका बाण बनाकर उसे ब्रह्मास्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उस कौएको लक्ष्य करके चला दिया। यह देख वह भयभीत होकर भागा। राजन्! कहते हैं, वह काक वास्तवमें इन्द्रका पुत्र जयन्त था, अतः भागकर इन्द्रलोकमें घुस गया। उसके साथ ही श्रीरामचन्द्रजीके उस प्रज्वलित एवं देदीप्यमान बाणने भी उसका पीछा करते हुए इन्द्रलोकमें प्रवेश किया। यह सब वृत्तान्त जान, देवराज इन्द्रने देवताओंके साथ मिलकर विचार किया तथा श्रीरामचन्द्रजीका अपराध करनेवाले उस दुष्ट पुत्रको वहाँसे निकाल दिया। जब सब देवताओंने उसे देवलोकसे बाहर कर दिया, तब वह पुनः राजा श्रीरामचन्द्रजीकी ही शरणमें आया और बोला—'महाबाहो श्रीराम! मैंने अज्ञानवश अपराध किया है, मुझे बचाइये'॥ ८-१२॥


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अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना; १९७


इति ब्रुवन्तं तं प्राह रामः कमललोचनः । अमोघं च ममैवास्त्रमङ्गमेकं प्रयच्छ वै ॥ १३

ततो जीवसि दुष्ट त्वमपकारो महान् कृतः । इत्युक्तोऽसौ स्वकं नेत्रमेकमस्त्राय दत्तवान् ॥ १४

अस्त्रं तन्नेत्रमेकं तु भस्मीकृत्य समाययौ। ततः प्रभृति काकानां सर्वेषामेकनेत्रता ॥ १५

चक्षुषैकेन पश्यन्ति हेतुना तेन पार्थिव। उषित्वा तत्र सुचिरं चित्रकूट से राघवः ॥ १६

जगाम दण्डकारण्यं नानामुनिनिषेवितम्। सभ्रातृकः सभार्यश्च तापसं वेषमास्थितः ॥ १७

धनुःपर्वसुपाणिश्च सेषुधिश्च महाबलः। ततो ददर्श तत्रस्थानम्बुभक्षान्महामुनीन् ॥ १८

अश्मकुट्टाननेकांश्च दन्तोलूखलिनस्तथा। पञ्चाग्निमध्यगानन्यान्न्यानुग्रतपश्वरान् ॥ १९

तान् दृष्ट्वा प्रणिपत्योच्चै रामस्तैश्चाभिनन्दितः। ततोऽखिलं वनं दृष्ट्वा रामः साक्षाज्जनार्दनः ॥ २०

भ्रातृभार्यासहायश्च सम्प्रतस्थे महामतिः। दर्शयित्वा तु सीतायै वनं कुसुमिसं शुभम् ॥ २१

नानाश्चर्यसमायुक्तं शनैर्गच्छन् स दृष्टवान्। कृष्णाङ्गं रक्तनेत्रं तु स्थूलशैलसमानकम् ॥ २२

शुभ्रदंष्ट्रं महाबाहुं संध्याघनशिरोरुहम्। मेघस्वनं सापराधं शरं संधाय राघवः ॥ २३

विव्याध राक्षसं क्रोधाल्लक्ष्मणेन सह प्रभुः। अन्यैरवध्यं हत्वा तं गिरिगर्ते महातनुम् ॥ २४


हिन्दी अनुवाद

इस प्रकार कहते हुए जयन्तसे कमललोचन श्रीरामने कहा—'अरे दुष्ट! मेरा अस्त्र अमोघ है, अतः इसके लिये अपना कोई एक अङ्ग दे दे; तभी तू जीवित रह सकता है; क्योंकि तूने बहुत बड़ा अपराध किया है।' उनके यों कहनेपर उसने श्रीरामके उस बाणके लिये अपना एक नेत्र दे दिया। उसके एक नेत्रको भस्म करके वह अस्त्र लौट आया। उसी समयसे सभी कौए एक नेत्रवाले हो गये। राजन्! इसी कारण वे एक आँखसे ही देखते हैं ॥ १३–१५½ ॥

श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई और पत्नीके साथ चिरकालतक चित्रकूटपर निवास करनेके अनन्तर वहाँसे अनेक मुनिजनोंद्वारा सेवित दण्डकारण्यको चल दिये। उस समय वे तपस्वी वेषमें थे, उनके हाथमें धनुष और बाण थे तथा पीठपर तरकस बँधा था। वहाँ जानेपर महाबलवान् श्रीरामने उस वनमें रहनेवाले बड़े-बड़े मुनियोंका दर्शन किया, जिनमेंसे कई लोग केवल जलका आहार करनेवाले थे। कितने ही दन्तहीन होनेसे पत्थरपर कूट-पीसकर आहार ग्रहण करते, इसलिये 'अश्मकुट्ट' कहलाते थे। कुछ तपस्वी दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेनेवाले होनेसे 'दन्तोलूखली' कहे जाते थे। कुछ पाँच अग्नियोंके बीचमें बैठकर तप करते थे और कुछ महात्मा इससे भी उग्र तपस्यामें तत्पर थे। उनका दर्शन करके श्रीरामने उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और उन्होंने भी उनका अभिनन्दन किया ॥ १६–१९½ ॥

तत्पश्चात् साक्षात् विष्णुरूप महामति भगवान् श्रीराम वहाँके समस्त वनका अवलोकन करके अपनी भार्या और भाईके साथ आगे बढ़े। वे सीताजीको फूलोंसे सुशोभित तथा नाना आश्चयोंसे युक्त सुन्दर वन दिखाते हुए जिस समय धीरे-धीरे जा रहे थे, उसी समय उन्होंने सामने एक राक्षस देखा, जिसका शरीर काला और नेत्र लाल थे। वह पर्वतके समान स्थूल था। उसकी दाढ़ें चमकीली, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और केश संध्याकालिक मेघके समान लाल थे। वह घनघोर गर्जना करता हुआ सदा दूसरोंका अपकार किया करता था। उसे देखते ही लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीने धनुषपर बाण चढ़ाया तथा उस घोर राक्षसको, जो दूसरोंसे नहीं मारा जा सकता था, बींधकर मार डाला। इस प्रकार उसका वध करके उन्होंने उस महाकाय राक्षसकी लाशको पर्वतके खड्डेमें डाल दिया ॥ २०-२४ ॥


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१९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४९

१९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४९


[संस्कृत मूल]

शिलाभिश्च्छाद्य गत्वाञ्चशरभङ्गाश्रमं ततः । तं नत्वा तत्र विश्रम्य तत्कथातुष्टमानसः ॥ २५ तीक्ष्णाश्रममुपागम्य दृष्टवांस्तं महामुनिम्। तेनादिष्टेन मार्गेण गत्वागस्त्यं ददर्श ह॥ २६ खड्गं तु विमलं तस्मादवाप रघुनन्दनः । इषुधिं चाक्षयशरं चापं चैव तु वैष्णवम् ॥ २७ ततोऽगस्त्याश्रमाद्रामो भ्रातृभार्यासमन्वितः । गोदावर्याः समीपे तु पञ्चवट्यामुवास सः ॥ २८ ततो जटायुरभ्येत्य रामं कमललोचनम्। नत्वा स्वकुलमाख्याय स्थितवान् गृध्रनायकः ॥ २९ रामोऽपि तत्र तं दृष्ट्वा आत्मवृत्तं विशेषतः । कथयित्वा तु तं प्राह सीतां रक्ष महामते ॥ ३० इत्युक्तोऽसौ जटायुस्तु राममालिङ्ग्य सादरम् । कार्यार्थं तु गते रामे भ्रात्रा सह वनान्तरम् ॥ ३१ अहं रक्ष्यामि ते भार्यां स्थीयतामत्र शोभन। इत्युक्त्वा गतवान्रामं गृध्रराजः स्वमाश्रमम् ॥ ३२ समीपे दक्षिणे भागे नानापक्षिनिषेविते । वसन्तं राघवं तत्र सीतया सह सुन्दरम् ॥ ३३ मन्मथाकारसदृशं कथयन्तं महाकथाः । कृत्वा मायामयं रूपं लावण्यगुणसंयुतम् ॥ ३४ मदनाक्रान्तहृदया कदाचिद्रावणानुजा । गायन्ती सुस्वरं गीतं शनैरागत्य राक्षसी ॥ ३५ ददर्श राममासीनं कानने सीतया सह । अथ शूर्पणखा घोरा मायारूपधरा शुभा ॥ ३६ निश्शङ्का दुष्टचित्ता सा राघवं प्रत्यभाषत । भज मां कान्त कल्याणीं भजन्तीं कामिनीमिह ॥ ३७


[हिन्दी अनुवाद]

और शिलाओंसे ढँककर वे वहाँसे शरभङ्गमुनिके आश्रमपर गये। वहाँ उन मुनिको प्रणाम करके उनके आश्रमपर कुछ देरतक विश्राम किया और उनके साथ कथा-वार्ता करके वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए॥ २०-२५॥ वहाँसे सुतीक्ष्णमुनिके आश्रमपर जाकर श्रीरामने उन महर्षिका दर्शन किया और कहते हैं, उन्हींके बताये हुए मार्गसे जाकर वे अगस्त्यमुनिसे मिले। वहाँ श्रीरघुनाथजीने उनसे एक निर्मल खड्ग तथा वैष्णव धनुष प्राप्त किये और जिसमें रखा हुआ बाण कभी समाप्त न हो—ऐसा तरकस भी उपलब्ध किया। तत्पश्चात् सीता और लक्ष्मणके साथ वे अगस्त्य-आश्रमसे आगे जाकर गोदावरीके निकट पञ्चवटीमें रहने लगे। वहाँ जानेपर कमललोचन श्रीरामचन्द्रजीके पास गृध्रराज जटायु आये और उनसे अपने कुलका परिचय देकर खड़े हो गये। उन्हें वहाँ उपस्थित देख श्रीरामने भी अपना सारा वृत्तान्त विशेषरूपसे जनाया और कहा—‘महामते! तुम सीताकी रक्षा करते रहो'॥ २६-३०॥ श्रीरामके यों कहनेपर जटायुने आदरपूर्वक उनका आलिङ्गन किया और कहा—'श्रीराम! जब कभी कार्यवश अपने भाई लक्ष्मणके साथ आप किसी दूसरे वनमें चले जायँ, उस समय मैं ही आपकी भार्याकी रक्षा करूँगा; अतः सुन्दर! आप निश्चिन्त होकर यहाँ रहिये।' श्रीरामसे यों कहकर गृध्रराज पास ही दक्षिण भागमें स्थित अपने आश्रमपर चले आये, जो नाना पक्षियोंद्वारा सेवित था॥ ३१-३२ १/२ ॥ एक बार यह सुनकर कि कामदेवके समान सुन्दर श्रीरामचन्द्रजी नाना प्रकारकी महत्त्वपूर्ण कथाएँ कहते हुए अपनी भार्या सीताके साथ पञ्चवटीमें निवास कर रहे हैं, रावणकी छोटी बहिन राक्षसी शूर्पणखा मन-ही-मन कामसे पीड़ित हो गयी और लावण्य आदि गुणोंसे युक्त मायामय सुन्दर रूप बनाकर, मधुर स्वरमें गीत गाती हुई धीरे- धीरे वहाँ आयी। उसने वनमें सीताजीके साथ बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीको देखा। तब मायामय सुन्दर रूप धारण करनेवाली भयंकर राक्षसी दुष्टहृदया शूर्पणखाने निडर होकर श्रीरामसे कहा—‘प्रियतम! मैं आपको चाहनेवाली सुन्दरी दासी हूँ। आप मुझ सेविकाको स्वीकार करें। जो


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अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना १९९ भजमानां त्यजेद्यस्तु तस्य दोषो महान् भवेत्। | पुरुष सेवामें उपस्थित हुई रमणीका त्याग करता है, उसे इत्युक्तः शूर्पणखया रामस्तामाह पार्थिवः ॥ ३८ | बड़ा दोष लगता है'॥ ३३-३७½॥ | शूर्पणखाके यों कहनेपर पृथ्वीपति श्रीरामचन्द्रजीने कलत्रवानहं बाले कनीयांसं भजस्व मे। | उससे कहा—'बाले! मेरे तो स्त्री है। तुम मेरे छोटे भाईके इति श्रुत्वा ततः प्राह राक्षसी कामरूपिणी ॥ ३९ | पास जाओ।' उनकी बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण | करनेवाली उस राक्षसीने कहा—'राघव! मैं रति-कर्ममें अतीव निपुणा चाहं रतिकर्मणि राघव। | बहुत निपुण हूँ और यह सीता अनभिज्ञ है; अतः इसे त्यक्त्वैनामनभिज्ञां त्वं सीतां मां भज शोभनाम् ॥ ४० | त्यागकर मुझ सुन्दरीको ही स्वीकार करें'॥ ३८-४०॥ | उसकी यह बात सुनकर धर्मपरायण श्रीरामने कहा— इत्याकर्ण्य वचः प्राह रामस्तां धर्मतत्परः। | 'मैं परायी स्त्रीके साथ कोई सम्पर्क नहीं रखता। तुम परस्त्रियं न गच्छेऽहं त्वमितो गच्छ लक्ष्मणम् ॥ ४१ | यहाँसे लक्ष्मणके निकट जाओ। यहाँ वनमें उसकी स्त्री | नहीं है; अतः शायद वह तुम्हें स्वीकार कर लेगा।' उनके तस्य नात्र वने भार्या त्वामसौ संग्रहीष्यति। | यों कहनेपर शूर्पणखा पुनः कमलनयन श्रीरामसे बोली— इत्युक्ता सा पुनः प्राह रामं राजीवलोचनम् ॥ ४२ | 'अच्छा, आप एक ऐसा पत्र लिखकर दें, जिससे लक्ष्मण | मेरा भर्ता (भरण-पोषणका भार लेनेवाला) हो सके।' तब यथा स्याल्लक्ष्मणो भर्ता तथा त्वं देहि पत्रकम्। | बुद्धिमान् कमलनयन महाराज श्रीरामने 'बहुत अच्छा' तथैवमुक्त्वा मतिमान् रामः कमललोचनः ॥ ४३ | कहकर एक पत्र लिखा और उसे दे दिया। उसमें लिखा | था—'लक्ष्मण! तुम इसकी नाक काट लो; निस्संदेह ऐसा छिन्ध्यस्या नासिकामिति मोक्तव्या नात्र संशयः। | ही करना। यों ही न छोड़ना'॥ ४१-४४॥ इति रामो महाराजो लिख्य पत्रं प्रदत्तवान् ॥ ४४ | शूर्पणखा वह पत्र लेकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे गयी। | जाकर उसने महात्मा लक्ष्मणको उसी रूपमें वह पत्र सा गृहीत्वा तु तत्पत्रं गत्वा तस्मान्मुदान्विता। | दे दिया। उस कामरूपिणी राक्षसीको देखकर लक्ष्मणने गत्वा दत्तवती तद्वल्लक्ष्मणाय महात्मने ॥ ४५ | उससे कहा—'कलङ्किनी! ठहर, मैं श्रीरामचन्द्रजीकी | आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकता।' यों कहकर तां दृष्ट्वा लक्ष्मणः प्राह राक्षसीं कामरूपिणीम्। | बुद्धिमान् लक्ष्मणने उसे पकड़ लिया और एक चमचमाती न लङ्घ्यं राघववचो मया तिष्ठात्मकश्मले ॥ ४६ | हुई तलवार उठाकर तिलवृक्षके काण्ड (पोखो)-के | समान उसकी नाक और कान काट लिये॥ ४५-४७॥ तां प्रगृह्य ततः खड्गमुद्यम्य विमलं सुधीः। | नाक कट जानेपर वह बहुत दुःखी हो रोने तथा तेन तत्कर्णनासां तु चिच्छेद तिलकाण्डवत् ॥ ४७ | विलाप करने लगी—'हा! समस्त देवताओंका मान- | मर्दन करनेवाले मेरे भाई रावण! आज मुझपर महान् छिन्ननासा ततः सा तु रुरोद भृशदुःखिता। | कष्ट आ गया। हा भाई कुम्भकर्ण! मुझपर बड़ी भारी हा दशास्य मम भ्रातः सर्वदेवविमर्दक ॥ ४८ | विपत्ति आ पड़ी। हा गुणनिधे महामते विभीषण! मुझे | महान् दुःख देखना पड़ा'॥ ४८-४९॥ हा कष्टं कुम्भकर्णाद्यायाता मे चापदा परा। | इस प्रकार आर्तभावसे रोदन करती हुई वह हा हा कष्टं गुणनिधे विभीषण महामते ॥ ४९ | खर-दूषण और त्रिशिराके पास गयी तथा उनसे | अपने अपमानकी बात निवेदन करके बोली— इत्येवमार्ता रुदती सा गत्वा खरदूषणौ। | त्रिशिरसं च सा दृष्ट्वा निवेद्यात्मपराभवम् ॥ ५० | In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१

२०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१ राममाह जनस्थाने भ्रात्रा सह महाबलम्। ज्ञात्वा ते राघवं क्रुद्धाः प्रेषयामासूरूर्जितान्॥ ५१ चतुर्दशसहस्राणि राक्षसानां बलीयसाम्। अग्रे निजग्मुस्तेनैव रक्षसां नायकास्त्रयः॥ ५२ रावणेन नियुक्तास्ते पुरैव तु महाबलाः। महाबलपरीवारा जनस्थानमुपागताः॥ ५३ क्रोधेन महताऽऽविष्टा दृष्ट्वा तां छिन्ननासिकाम्। रुदतीमश्रुदिग्धाङ्गीं भगिनीं रावणस्य तु॥ ५४ रामोऽपि तद्वलं दृष्ट्वा राक्षसानां बलीयसाम्। संस्थाप्य लक्ष्मणं तत्र सीताया रक्षणं प्रति॥ ५५ गत्वा तु प्रहितैस्तत्र राक्षसैर्बलदर्पितैः। चतुर्दशसहस्रं तु राक्षसानां महाबलम्॥ ५६ क्षणेन निहतं तेन शरैरग्निशिखोपमैः। खरश्च निहतस्तेन दूषणश्च महाबलः॥ ५७ त्रिशिराश्च महारोषाद् रणे रामेण पातितः। हत्वा तान् राक्षसान् दुष्टान् रामश्चाश्रममाविशत्॥ ५८ शूर्पणखा च रुदती रावणान्तिकमागता। छिन्ननासां च तां दृष्ट्वा रावणो भगिनीं तदा॥ ५९ मारीचं प्राह दुर्बुद्धिः सीताहरणकर्मणि। पुष्पकेण विमानेन गत्वाहं त्वं च मातुल॥ ६० जनस्थानसमीपे तु स्थित्वा तत्र ममाज्ञया। सौवर्णमृगरूपं त्वमास्थाय तु शनैः शनैः॥ ६१ गच्छ त्वं तत्र कार्यार्थं यत्र सीता व्यवस्थिता। दृष्ट्वा सा मृगपोतं त्वां सौवर्णं त्वयि मातुल॥ ६२ स्पृहां करिष्यते रामं प्रेषयिष्यति बन्धने। तद्वाक्यात्तत्र गच्छन्तं धावस्व गहने वने॥ ६३ लक्ष्मणस्यापकर्षार्थं वक्तव्यं वागुदीरणम्। ततः पुष्पकमारुह्य मायारूपेण चाप्यहम्॥ ६४ तां सीतामहरानेष्ये तस्यामासक्तमानसः। त्वमपि स्वेच्छया पश्चादागमिष्यसि शोभन॥ ६५ 'महाबली श्रीराम इस समय जनस्थानमें अपने भाई लक्ष्मणके साथ रहते हैं।' श्रीरामका पता पाकर वे तीनों बहुत ही कुपित हुए और उनके साथ युद्धके लिये उन्होंने चौदह हजार प्रतापी एवं बलवान् राक्षसोंको भेजा तथा वे तीनों निशाचर-नायक स्वयं भी उस सेनाके साथ आगे-आगे चले। उन महाबलवान् राक्षसोंको रावणने वहाँ पहलेसे ही नियुक्त कर रखा था। वे बहुत बड़ी सेनाके साथ जनस्थानमें आये। रावणकी बहिन शूर्पणखा नाक कट जानेसे बहुत रो रही थी। उसके सारे अङ्ग आँसुओंसे भीग गये थे। उसकी वह दुर्दशा देख वे खर-दूषण आदि राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे थे॥ ५०-५४॥ श्रीरामने भी बलवान् राक्षसोंकी उस सेनाको देख लक्ष्मणको सीताकी रक्षामें उसी स्थानमें रोक दिया और अपने साथ युद्धके लिये वहाँ भेजे गये उन बलाभिमानी राक्षसोंके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। अग्निकी ज्वालाके समान दीप्तिमान् बाणोंद्वारा उन्होंने चौदह हजार राक्षसोंकी प्रबल सेनाको क्षणभरमें मार गिराया। साथ ही खर और महाबली दूषणका भी वध किया। इसी प्रकार त्रिशिराको भी श्रीरामने अत्यन्त रोषपूर्वक रणक्षेत्रमें मार गिराया। इस तरह उन सभी दुष्ट राक्षसोंका वध करके श्रीरामचन्द्रजी अपने आश्रममें लौट आये॥ ५५-५८॥ तब शूर्पणखा रोती हुई रावणके पास आयी। दुर्बुद्धि रावणने अपनी बहिनकी नाक कटी देख सीताको हर लानेके उद्देश्यसे मारीचसे कहा—'मामा! हम और तुम पुष्पकविमानसे चलकर जनस्थानके पास ठहरें। वहाँसे तुम मेरी आज्ञाके अनुसार सोनेके मृगका वेष धारणकर धीरे-धीरे मेरा कार्य सिद्ध करनेके लिये उस स्थानपर जाना, जहाँ सीता रहती है। मामा! वह जब तुम्हें सुवर्णमय मृगशावकके रूपमें देखेगी, तब तुम्हें लेनेकी इच्छा करेगी और श्रीरामको तुम्हें बाँध लानेके लिये भेजेगी। जब सीताकी बात मानकर वे तुम्हें बाँधने चलें, तब तुम उनके सामनेसे गहन वनमें भाग जाना। फिर लक्ष्मणको भी उधर ही खींचनेके लिये उच्चस्वरसे [हा भाई लक्ष्मण! इस प्रकार] कातर वचन बोलना। तत्पश्चात् मैं भी मायामय वेष बनाकर, पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो, उस असहाया सीताको हर लाऊँगा; क्योंकि मेरा मन उसमें आसक्त हो गया है। फिर भद्र! तुम भी स्वेच्छानुसार चले आना'॥ ५९-६५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०१ इत्युक्ते रावणेनाथ मारीचो वाक्यमब्रवीत्। त्वमेव गच्छ पापिष्ठ नाहं गच्छामि तत्र वै ॥ ६६ पुरैवानेन रामेण व्यथितोऽहं मुनेर्मखे। इत्युक्तवति मारीचे रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ६७ मारीचं हन्तुमारेभे मारीचोऽप्याह रावणम्। तव हस्तवधाद्वीर रामेण मरणं वरम् ॥ ६८ अहं गमिष्यामि तत्र यत्र त्वं नेतुमिच्छसि । अथ पुष्पकमारुह्य जनस्थानमुपागतः ॥ ६९ मारीचस्तत्र सौवर्णं मृगमास्थाय चाग्रतः। जगाम यत्र सा सीता वर्तते जनकात्मजा ॥ ७० सौवर्णं मृगपोतं तु दृष्ट्वा सीता यशस्विनी। भाविकर्मवशाद्राममुवाच पतिमात्मनः ॥ ७१ गृहीत्वा देहि सौवर्णं मृगपोतं नृपात्मज। अयोध्यायां तु मद्गेहे क्रीडनार्थमिदं मम ॥ ७२ तयैवमुक्तो रामस्तु लक्ष्मणं स्थाप्य तत्र वै। रक्षणार्थं तु सीताया गतोऽसौ मृगपृष्ठतः ॥ ७३ रामेण चानुयातोऽसौ अभ्यधावद्वने मृगः। ततः शरेण विव्याध रामस्तं मृगपोतकम् ॥ ७४ हा लक्ष्मणेति चोक्त्वासौ निपपात महीतले। मारीचः पर्वताकारस्तेन नष्टो बभूव सः ॥ ७५ आकर्ण्य रुदतः शब्दं सीता लक्ष्मणमब्रवीत्। गच्छ लक्ष्मण पुत्र त्वं यत्रायं शब्द उत्थितः ॥ ७६ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य तत्त्वं वै रुदतः श्रूयते ध्वनिः। प्रायो रामस्य संदेहं लक्षयेऽहं महात्मनः ॥ ७७ इत्युक्तः स तथा प्राह लक्ष्मणस्तामनिन्दिताम्। न हि रामस्य संदेहो न भयं विद्यते क्वचित् ॥ ७८ रावणके यों समझानेपर मारीचने कहा—'अरे पापिष्ठ! तुम्हीं जाओ, मैं वहाँ नहीं जाऊँगा। मैं तो विश्वामित्रमुनिके यज्ञमें पहले ही श्रीरामके हाथों भारी कष्ट उठा चुका हूँ।' मारीचके यों कहनेपर रावण क्रोधसे मूर्च्छित हो उसे मार डालनेको उद्यत हो गया। तब मारीचने उससे कहा—'वीर! तुम्हारे हाथसे वध हो, इसकी अपेक्षा तो श्रीरामके हाथसे ही मरना अच्छा है। तुम मुझे जहाँ ले चलना चाहते हो, वहाँ अब मैं अवश्य चलूँगा' ॥ ६६-६८१/२ ॥ यह सुनकर वह पुष्पकविमानपर आरूढ हो उसके साथ जनस्थानके निकट आया। वहाँ पहुँचकर मारीच सुवर्णमय मृगका रूप धारणकर, जहाँ जनकनन्दिनी सीता विद्यमान थीं, वहाँ उनके सामने गया। उस सुवर्णमय मृगकिशोरको देखकर यशस्विनी सीता भावी कर्मके वशीभूत हो अपने पति भगवान् श्रीरामसे बोलीं—'राजपुत्र! आप उस सुवर्णमय मृगशावकको पकड़कर मेरे लिये ला दीजिये। यह अयोध्यामें मेरे महलके भीतर क्रीड़ा-विनोदके लिये रहेगा' ॥ ६९-७२ ॥ सीताके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनकी रक्षाके लिये लक्ष्मणको वहाँ रख दिया और स्वयं उस मृगके पीछे चले। श्रीरामके पीछा करनेपर वह मृग वनकी ओर भागा, तब श्रीरामने उस मृगशावकको बाणसे बींध डाला। मारीच 'हा! लक्ष्मण!'—यों कहकर पर्वताकार शरीरसे पृथ्वीपर गिरा और प्राणहीन हो गया। रोते हुए मारीचके उस आर्तनादको सुनकर सीताने लक्ष्मणसे कहा—'वत्स लक्ष्मण! जहाँसे यह आवाज आयी है, वहीं तुम भी जाओ। निश्चय ही तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राताके रोदनका शब्द कानोंमें आ रहा है, मुझे प्रायः महात्मा श्रीरामका जीवन संशयमें पड़ा दिखायी देता है' ॥ ७३-७७ ॥ सीताकी यह बात सुनकर उन अनिन्दिता देवीसे लक्ष्मणने कहा—'देवि! श्रीरामके लिये कोई संदेहकी बात नहीं है, उन्हें कहीं भी भय नहीं है।' In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

२०२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४९ इति ब्रुवाणं तं सीता भाविकर्मबलाद्धृतम्। यों कहते हुए लक्ष्मणसे उस समय विदेहकुमारी सीताने लक्ष्मणं प्राह वैदेही विरुद्धवचनं तदा॥ ७९ कुछ विरुद्ध वचन कहा, जो भवितव्यताकी प्रेरणासे उनके मुखसे सहसा निकल पड़ा था। वे बोलीं—'मैं मृते रामे तु मामिच्छन्न्रतस्त्वं न गमिष्यसि। जानती हूँ, तुम श्रीरामके मर जानेपर मुझे अपनी बनाना इत्युक्तः स विनीतात्मा असहन्नप्रियं वचः॥ ८० चाहते हो; इसीसे इस समय वहाँ नहीं जा रहे हो।' सीताके यों कहनेपर विनयशील राजकुमार लक्ष्मण जगाम राममन्वेष्टुं तदा पार्थिवनन्दनः। उस अप्रिय वचनको न सह सके और तत्काल ही संन्यासवेषमास्थाय रावणोऽपि दुरात्मवान्॥ ८१ श्रीरामचन्द्रजीकी खोजमें चल पड़े॥ ७८—८०१/२॥ इसी समय दुरात्मा रावण भी संन्यासीका वेष बनाकर स सीतापाश्र्वमासाद्य वचनं चेदमुक्तवान्। सीताके पास आया और यों बोला—'देवि! अयोध्यासे आगतो भरतः श्रीमानयोध्याया महामतिः॥ ८२ महाबुद्धिमान् भरतजी आये हैं। वे श्रीरामचन्द्रजीके साथ बातचीत करके वहीं काननमें ठहरे हुए हैं। श्रीरामचन्द्रजीने रामेण सह सम्भाष्य स्थितवांस्तत्र कानने। मुझे तुम्हें बुलानेके लिये यहाँ भेजा है। तुम इस विमानपर मां च प्रेषितवान् रामो विमानमिदमारुह॥ ८३ चढ़ चलो। भरतजीने मनाकर श्रीरामको अयोध्या चलनेके लिये राजी कर लिया है, अतः वे अयोध्या जा रहे हैं। अयोध्यां याति रामस्तु भरतेन प्रसादितः। वैदेहि! तुम्हारी क्रीडा—विनोदके लिये उन्होंने उस मृग- मृगबालं तु वैदेहि क्रीडार्थं ते गृहीतवान्॥ ८४ शावकको भी पकड़ लिया है। अहो! तुमने इस विशाल वनमें बहुत दिनोंतक ऐसा महान् कष्ट उठाया है। अब क्लेशितासि महारण्ये बहुकालं त्वमीदृशम्। तुम्हारे स्वामी सुन्दर मुखवाले श्रीरामचन्द्रजी तथा उनके सम्प्राप्तराज्यस्ते भर्ता रामः स रुचिराननः॥ ८५ विनयशील भाई लक्ष्मण भी राज्यग्रहण कर चुके हैं। अतः तुम उनके पास चलनेके लिये इस विमानपर चढ़ लक्ष्मणश्च विनीतात्मा विमानमिदमारुह। जाओ'॥ ८१—८५१/२॥ इत्युक्ता सा तथा गत्वा नीता तेन महात्मना॥ ८६ उसके यों कहनेपर उसकी कपटपूर्ण बातोंसे प्रेरित हो सती सीता वह सब सत्य मानकर उस तथाकथित आरुरोह विमानं तु छद्मना प्रेरिता सती। महात्माके साथ विमानके निकट गयीं और उसपर आरूढ तज्जगाम ततः शीघ्रं विमानं दक्षिणां दिशम्॥ ८७ हो गयीं। तब वह विमान शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी ओर चल पड़ा। यह देख सीता अत्यन्त शोकसे पीड़ित ततः सीता सुदुःखार्ता विललाप सुदुःखिता। हो, अत्यन्त दुःखसे विलाप करने लगीं। यद्यपि सीता विमाने खेऽपि रोदन्त्याश्चक्रे स्पर्शं न राक्षसः॥ ८८ आकाशमें उसके अपने ही विमानपर बैठी थीं, तथापि रावणने वहाँ रोती हुई सीताका स्पर्श नहीं किया। अब रावणः स्वेन रूपेण बभूवाथ महातनुः। रावण अपने असली रूपमें आ गया। उसका शरीर बहुत दशग्रीवं महाकायं दृष्ट्वा सीता सुदुःखिता॥ ८९ बड़ा हो गया। दस मस्तकवाले उस विशालकाय राक्षसपर दृष्टि पड़ते ही सीता अत्यन्त दुःखमें डूब गयीं और हा राम वञ्चिताद्याहं केनापिच्छद्मरूपिणा। विलाप करने लगीं—'हाय राम! किसी कपटवेषधारी रक्षसा घोररूपेण त्रायस्वेति भयार्दिता॥ ९० भयानक राक्षसने आज मुझे धोखा दिया है, मैं भयसे पीड़ित हो रही हूँ; मुझे बचाओ। हे महाबाहु लक्ष्मण! हे लक्ष्मण महाबाहो मां हि दुष्टेन रक्षसा। मुझे दुष्ट राक्षस हरकर लिये जा रहा है। मैं भयसे व्याकुल द्रुतमागत्य रक्षस्व नीयमानामथाकुलाम्॥ ९१ हूँ तुम जल्दी आकर मुझ असहायाकी रक्षा करो'॥ ८६—९१॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०३ एवं प्रलपमानायाः सीतायास्तन्महत्स्वनम्। इस प्रकार उच्चस्वरसे विलाप करती हुई सीताके उस आकर्ण्य गृध्रराजस्तु जटायुस्तत्र चागतः॥ ९२ महान् आर्तनादको सुनकर गृध्रराज जटायु वहाँ आ पहुँचे (और बोले-) 'अरे दुष्टात्मा रावण! ठहर जा; तू तिष्ठ रावण दुष्टात्मन् मुञ्च मुञ्चात्र मैथिलीम्। सीताको छोड़ दे, छोड़ दे।' यह कहकर पराक्रमी जटायु इत्युक्त्वा युयुधे तेन जटायुस्तत्र वीर्यवान्॥ ९३ उसके साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने अपने दोनों पंखोंसे रावणकी छातीमें चोट की। उनको इस प्रकार प्रहार करते पक्षाभ्यां ताडयामास जटायुस्तस्य वक्षसि। देख रावणने समझ लिया कि 'यह पक्षी बड़ा बलवान् ताडयन्तं तु तं मत्वा बलवानिति रावणः॥ ९४ है।' जब जटायुके मुख और चोंचकी मारसे वह बहुत पीड़ित हो गया, तब उस दुष्टने बड़े वेगसे 'चन्द्रहास' तुण्डचञ्चुप्रहारैस्तु भृशं तेन प्रपीडितः। नामक विशाल खड्ग उठाया और उससे धर्मात्मा जटायुपर तत उत्थाप्य वेगेन चन्द्रहासमसिं महत्॥ ९५ घातक प्रहार किया। इससे उनकी चेतना क्षीण हो गयी और वे पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ९२-९६॥ जघान तेन दुष्टात्मा जटायुं धर्मचारिणम्। निपपात महीपृष्ठे जटायुः क्षीणचेतनः॥ ९६ उस समय उन्होंने रावणसे कहा- 'अरे दुष्टात्मन्! ओ नीच राक्षस ! मुझे तूने नहीं मारा है। मैं तो तेरे उवाच च दशग्रीवं दुष्टात्मन् न त्वया हतः। 'चन्द्रहास' नामक खड्गके प्रभावसे मारा गया हूँ। अरे चन्द्रहासस्य वीर्येण हतोऽहं राक्षसाधम ॥ ९७ मूर्ख ! तेरे सिवा दूसरा कौन शस्त्रधारी योद्धा होगा, जो किसी निहत्थेपर हथियार चलायेगा ? अरे दुष्ट राक्षस ! निरायुधं को हनेन्मूढ सायुधस्त्वामृते जनः। तू यह जान ले कि सीताका हर ले जाना तेरी मौत सीतापहरणं विद्धि मृत्युस्ते दुष्ट राक्षस ॥ ९८ है। दुष्टात्मा रावण ! निस्संदेह श्रीरामचन्द्रजी तेरा वध कर डालेंगे' ॥ ९७-९८१/२ ॥ दुष्ट रावण रामस्त्वां वधिष्यति न संशयः। रुदती दुःखशोकार्ता जटायुं प्राह मैथिली ॥ ९९ जटायुके मारे जानेसे अत्यन्त दुःख और शोकसे पीड़ित हुई मिथिलेशकुमारी सीता उनसे रोकर बोलीं- मत्कृते मरणं यस्मात्त्वया प्राप्तं द्विजोत्तम । 'हे पक्षिराज! तुमने मेरे लिये मृत्युका वरण किया है, तस्माद्रामप्रसादेन विष्णुलोकमवाप्स्यसि ॥ १०० इसलिये तुम श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे विष्णुलोकको प्राप्त होओगे। खगश्रेष्ठ! जबतक श्रीरामचन्द्रजीसे तुम्हारी यावद्रामेण सङ्गस्ते भविष्यति महाद्विज। भेंट न हो, तबतक तुम्हारे प्राण शरीरमें ही रहें।' उन तावत्तिष्ठन्तु ते प्राणा इत्युक्त्वा तु खगोत्तमम् ॥ १०१ पक्षिराजसे यों कहकर अत्यन्त दुःखिनी सीताने अपने शरीरसे धारण किये हुए समस्त आभूषणोंको उतारा ततस्तान्यर्पितान्यङ्गाद्भूषणानि विमुच्य सा। और शीघ्रतापूर्वक वस्त्रमें बाँधकर कहा- 'तुम सब- शीघ्रं निबध्य वस्त्रेण रामहस्तं गमिष्यथ ॥ १०२ के-सब श्रीरामके हाथमें पहुँच जाओगे।' और तब उन्हें भूमिपर गिरा दिया ॥ ९९-१०२१/२॥ इत्युक्त्वा पातयामास भूमौ सीता सुदुःखिता। एवं हृत्वा स सीतां तु जटायुं पात्य भूतले ॥ १०३ इस प्रकार सीताको हरकर तथा जटायुको धराशायी In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth