संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४९
[संस्कृत मूल]
शिलाभिश्च्छाद्य गत्वाञ्चशरभङ्गाश्रमं ततः । तं नत्वा तत्र विश्रम्य तत्कथातुष्टमानसः ॥ २५ तीक्ष्णाश्रममुपागम्य दृष्टवांस्तं महामुनिम्। तेनादिष्टेन मार्गेण गत्वागस्त्यं ददर्श ह॥ २६ खड्गं तु विमलं तस्मादवाप रघुनन्दनः । इषुधिं चाक्षयशरं चापं चैव तु वैष्णवम् ॥ २७ ततोऽगस्त्याश्रमाद्रामो भ्रातृभार्यासमन्वितः । गोदावर्याः समीपे तु पञ्चवट्यामुवास सः ॥ २८ ततो जटायुरभ्येत्य रामं कमललोचनम्। नत्वा स्वकुलमाख्याय स्थितवान् गृध्रनायकः ॥ २९ रामोऽपि तत्र तं दृष्ट्वा आत्मवृत्तं विशेषतः । कथयित्वा तु तं प्राह सीतां रक्ष महामते ॥ ३० इत्युक्तोऽसौ जटायुस्तु राममालिङ्ग्य सादरम् । कार्यार्थं तु गते रामे भ्रात्रा सह वनान्तरम् ॥ ३१ अहं रक्ष्यामि ते भार्यां स्थीयतामत्र शोभन। इत्युक्त्वा गतवान्रामं गृध्रराजः स्वमाश्रमम् ॥ ३२ समीपे दक्षिणे भागे नानापक्षिनिषेविते । वसन्तं राघवं तत्र सीतया सह सुन्दरम् ॥ ३३ मन्मथाकारसदृशं कथयन्तं महाकथाः । कृत्वा मायामयं रूपं लावण्यगुणसंयुतम् ॥ ३४ मदनाक्रान्तहृदया कदाचिद्रावणानुजा । गायन्ती सुस्वरं गीतं शनैरागत्य राक्षसी ॥ ३५ ददर्श राममासीनं कानने सीतया सह । अथ शूर्पणखा घोरा मायारूपधरा शुभा ॥ ३६ निश्शङ्का दुष्टचित्ता सा राघवं प्रत्यभाषत । भज मां कान्त कल्याणीं भजन्तीं कामिनीमिह ॥ ३७
[हिन्दी अनुवाद]
और शिलाओंसे ढँककर वे वहाँसे शरभङ्गमुनिके आश्रमपर गये। वहाँ उन मुनिको प्रणाम करके उनके आश्रमपर कुछ देरतक विश्राम किया और उनके साथ कथा-वार्ता करके वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए॥ २०-२५॥ वहाँसे सुतीक्ष्णमुनिके आश्रमपर जाकर श्रीरामने उन महर्षिका दर्शन किया और कहते हैं, उन्हींके बताये हुए मार्गसे जाकर वे अगस्त्यमुनिसे मिले। वहाँ श्रीरघुनाथजीने उनसे एक निर्मल खड्ग तथा वैष्णव धनुष प्राप्त किये और जिसमें रखा हुआ बाण कभी समाप्त न हो—ऐसा तरकस भी उपलब्ध किया। तत्पश्चात् सीता और लक्ष्मणके साथ वे अगस्त्य-आश्रमसे आगे जाकर गोदावरीके निकट पञ्चवटीमें रहने लगे। वहाँ जानेपर कमललोचन श्रीरामचन्द्रजीके पास गृध्रराज जटायु आये और उनसे अपने कुलका परिचय देकर खड़े हो गये। उन्हें वहाँ उपस्थित देख श्रीरामने भी अपना सारा वृत्तान्त विशेषरूपसे जनाया और कहा—‘महामते! तुम सीताकी रक्षा करते रहो'॥ २६-३०॥ श्रीरामके यों कहनेपर जटायुने आदरपूर्वक उनका आलिङ्गन किया और कहा—'श्रीराम! जब कभी कार्यवश अपने भाई लक्ष्मणके साथ आप किसी दूसरे वनमें चले जायँ, उस समय मैं ही आपकी भार्याकी रक्षा करूँगा; अतः सुन्दर! आप निश्चिन्त होकर यहाँ रहिये।' श्रीरामसे यों कहकर गृध्रराज पास ही दक्षिण भागमें स्थित अपने आश्रमपर चले आये, जो नाना पक्षियोंद्वारा सेवित था॥ ३१-३२ १/२ ॥ एक बार यह सुनकर कि कामदेवके समान सुन्दर श्रीरामचन्द्रजी नाना प्रकारकी महत्त्वपूर्ण कथाएँ कहते हुए अपनी भार्या सीताके साथ पञ्चवटीमें निवास कर रहे हैं, रावणकी छोटी बहिन राक्षसी शूर्पणखा मन-ही-मन कामसे पीड़ित हो गयी और लावण्य आदि गुणोंसे युक्त मायामय सुन्दर रूप बनाकर, मधुर स्वरमें गीत गाती हुई धीरे- धीरे वहाँ आयी। उसने वनमें सीताजीके साथ बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीको देखा। तब मायामय सुन्दर रूप धारण करनेवाली भयंकर राक्षसी दुष्टहृदया शूर्पणखाने निडर होकर श्रीरामसे कहा—‘प्रियतम! मैं आपको चाहनेवाली सुन्दरी दासी हूँ। आप मुझ सेविकाको स्वीकार करें। जो
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