संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना; १९७
इति ब्रुवन्तं तं प्राह रामः कमललोचनः । अमोघं च ममैवास्त्रमङ्गमेकं प्रयच्छ वै ॥ १३
ततो जीवसि दुष्ट त्वमपकारो महान् कृतः । इत्युक्तोऽसौ स्वकं नेत्रमेकमस्त्राय दत्तवान् ॥ १४
अस्त्रं तन्नेत्रमेकं तु भस्मीकृत्य समाययौ। ततः प्रभृति काकानां सर्वेषामेकनेत्रता ॥ १५
चक्षुषैकेन पश्यन्ति हेतुना तेन पार्थिव। उषित्वा तत्र सुचिरं चित्रकूट से राघवः ॥ १६
जगाम दण्डकारण्यं नानामुनिनिषेवितम्। सभ्रातृकः सभार्यश्च तापसं वेषमास्थितः ॥ १७
धनुःपर्वसुपाणिश्च सेषुधिश्च महाबलः। ततो ददर्श तत्रस्थानम्बुभक्षान्महामुनीन् ॥ १८
अश्मकुट्टाननेकांश्च दन्तोलूखलिनस्तथा। पञ्चाग्निमध्यगानन्यान्न्यानुग्रतपश्वरान् ॥ १९
तान् दृष्ट्वा प्रणिपत्योच्चै रामस्तैश्चाभिनन्दितः। ततोऽखिलं वनं दृष्ट्वा रामः साक्षाज्जनार्दनः ॥ २०
भ्रातृभार्यासहायश्च सम्प्रतस्थे महामतिः। दर्शयित्वा तु सीतायै वनं कुसुमिसं शुभम् ॥ २१
नानाश्चर्यसमायुक्तं शनैर्गच्छन् स दृष्टवान्। कृष्णाङ्गं रक्तनेत्रं तु स्थूलशैलसमानकम् ॥ २२
शुभ्रदंष्ट्रं महाबाहुं संध्याघनशिरोरुहम्। मेघस्वनं सापराधं शरं संधाय राघवः ॥ २३
विव्याध राक्षसं क्रोधाल्लक्ष्मणेन सह प्रभुः। अन्यैरवध्यं हत्वा तं गिरिगर्ते महातनुम् ॥ २४
हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार कहते हुए जयन्तसे कमललोचन श्रीरामने कहा—'अरे दुष्ट! मेरा अस्त्र अमोघ है, अतः इसके लिये अपना कोई एक अङ्ग दे दे; तभी तू जीवित रह सकता है; क्योंकि तूने बहुत बड़ा अपराध किया है।' उनके यों कहनेपर उसने श्रीरामके उस बाणके लिये अपना एक नेत्र दे दिया। उसके एक नेत्रको भस्म करके वह अस्त्र लौट आया। उसी समयसे सभी कौए एक नेत्रवाले हो गये। राजन्! इसी कारण वे एक आँखसे ही देखते हैं ॥ १३–१५½ ॥
श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई और पत्नीके साथ चिरकालतक चित्रकूटपर निवास करनेके अनन्तर वहाँसे अनेक मुनिजनोंद्वारा सेवित दण्डकारण्यको चल दिये। उस समय वे तपस्वी वेषमें थे, उनके हाथमें धनुष और बाण थे तथा पीठपर तरकस बँधा था। वहाँ जानेपर महाबलवान् श्रीरामने उस वनमें रहनेवाले बड़े-बड़े मुनियोंका दर्शन किया, जिनमेंसे कई लोग केवल जलका आहार करनेवाले थे। कितने ही दन्तहीन होनेसे पत्थरपर कूट-पीसकर आहार ग्रहण करते, इसलिये 'अश्मकुट्ट' कहलाते थे। कुछ तपस्वी दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेनेवाले होनेसे 'दन्तोलूखली' कहे जाते थे। कुछ पाँच अग्नियोंके बीचमें बैठकर तप करते थे और कुछ महात्मा इससे भी उग्र तपस्यामें तत्पर थे। उनका दर्शन करके श्रीरामने उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और उन्होंने भी उनका अभिनन्दन किया ॥ १६–१९½ ॥
तत्पश्चात् साक्षात् विष्णुरूप महामति भगवान् श्रीराम वहाँके समस्त वनका अवलोकन करके अपनी भार्या और भाईके साथ आगे बढ़े। वे सीताजीको फूलोंसे सुशोभित तथा नाना आश्चयोंसे युक्त सुन्दर वन दिखाते हुए जिस समय धीरे-धीरे जा रहे थे, उसी समय उन्होंने सामने एक राक्षस देखा, जिसका शरीर काला और नेत्र लाल थे। वह पर्वतके समान स्थूल था। उसकी दाढ़ें चमकीली, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और केश संध्याकालिक मेघके समान लाल थे। वह घनघोर गर्जना करता हुआ सदा दूसरोंका अपकार किया करता था। उसे देखते ही लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीने धनुषपर बाण चढ़ाया तथा उस घोर राक्षसको, जो दूसरोंसे नहीं मारा जा सकता था, बींधकर मार डाला। इस प्रकार उसका वध करके उन्होंने उस महाकाय राक्षसकी लाशको पर्वतके खड्डेमें डाल दिया ॥ २०-२४ ॥
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