भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 318 में से

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पृष्ठ 207

१९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४९ उनचासवाँ अध्याय श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना; शूर्पणखाका अनादर; सीताहरण; जटायुवध और शबरीको दर्शन देना मार्कण्डेय उवाच गतेऽथ भरते तस्मिन् रामः कमललोचनः। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा भार्यया सीतया सह॥ १ शाकमूलफलाहारो विचचार महावने। कदाचिल्लक्ष्मणमृते रामदेवः प्रतापवान्॥ २ चित्रकूटवनोद्देशे वैदेह्युत्सङ्गमाश्रितः। सुष्वाप स मुहूर्तं तु ततः काको दुरात्मवान्॥ ३ सीताभिमुखमभ्येत्य विददार स्तनान्तरम्। विदार्य वृक्षमRole/ारुह्य स्थितोऽसौ वायसाधमः॥ ४ ततः प्रबुद्धो रामोऽसौ दृष्ट्वा रक्तं स्तनान्तरे। शोकाविष्टां तु सीतां तामुवाच कमलेक्षणः॥ ५ वद स्तनान्तरे भद्रे तव रक्तस्य कारणम्। इत्युक्ता सा च तं प्राह भर्तारं विनयान्विता॥ ६ पश्य राजेन्द्र वृक्षाग्रे वायसं दुष्टचेष्टितम्। अनेनैव कृतं कर्म सुप्ते त्वयि महामते॥ ७ रामोऽपि दृष्टवान् काकं तस्मिन् क्रोधमथाकरोत्। इषीकास्त्रं समाधाय ब्रह्मास्त्रेणाभिमन्त्रितम्॥ ८ काकमुद्दिश्य चिक्षेप सोऽप्यधावद्भयान्वितः। स त्विन्द्रस्य सुतो राजन्निन्द्रलोकं विवेश ह॥ ९ रामास्त्रं प्रज्वलद्दीप्तं तस्यानु प्रविवेश वै। विदितार्थश्च देवेन्द्रो देवैः सह समन्वितः॥ १० निष्कामयच्च तं दुष्टं राघवस्यापकारिणम्। ततोऽसौ सर्वदेवैस्तु देवलोकाद्वहिः कृतः॥ ११ पुनः सोऽप्यपतद्रामं राजानं शरणं गतः। पाहि राम महाबाहो अज्ञानादपकारिणम्॥ १२


हिन्दी अनुवाद

मार्कण्डेयजी कहते हैं— भरतजीके अयोध्या लौट जानेपर कमललोचन श्रीरामचन्द्रजी अपनी भार्या सीता और भाई लक्ष्मणके साथ शाक और मूल-फल आदिके आहारसे ही जीवन-निर्वाह करते हुए उस महान् वनमें विचरने लगे। एक दिन परम प्रतापी भगवान् राम लक्ष्मणको साथ न ले जाकर चित्रकूट पर्वतके वनमें सीताजीकी गोदमें कुछ देरतक सोये रहे। इतनेमें ही एक दुष्ट कौएने सीताके सम्मुख आ उनके स्तनोंके बीच चोंच मारकर घाव कर दिया। घाव करके वह अधम काक वृक्षपर जा बैठा॥ १-४॥ तदनन्तर जब कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीकी नींद खुली, तब उन्होंने देखा, सीताके स्तनोंसे रक्त बह रहा है और वे शोकमें डूबी हुई हैं। यह देख उन्होंने सीतासे पूछा—'कल्याणि! बताओ, तुम्हारे स्तनोंके बीचसे रक्त बहनेका क्या कारण है?' उनके यों कहनेपर सीताने अपने स्वामीसे विनयपूर्वक कहा—'राजेन्द्र! महामते! वृक्षकी शाखापर बैठे हुए इस दुष्ट कौएको देखिये; आपके सो जानेपर इसीने यह दुस्साहसपूर्ण कार्य किया है'॥ ५-७॥ रामचन्द्रजीने भी उस कौएको देखा और उसपर बहुत ही क्रोध किया। फिर सींकका बाण बनाकर उसे ब्रह्मास्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उस कौएको लक्ष्य करके चला दिया। यह देख वह भयभीत होकर भागा। राजन्! कहते हैं, वह काक वास्तवमें इन्द्रका पुत्र जयन्त था, अतः भागकर इन्द्रलोकमें घुस गया। उसके साथ ही श्रीरामचन्द्रजीके उस प्रज्वलित एवं देदीप्यमान बाणने भी उसका पीछा करते हुए इन्द्रलोकमें प्रवेश किया। यह सब वृत्तान्त जान, देवराज इन्द्रने देवताओंके साथ मिलकर विचार किया तथा श्रीरामचन्द्रजीका अपराध करनेवाले उस दुष्ट पुत्रको वहाँसे निकाल दिया। जब सब देवताओंने उसे देवलोकसे बाहर कर दिया, तब वह पुनः राजा श्रीरामचन्द्रजीकी ही शरणमें आया और बोला—'महाबाहो श्रीराम! मैंने अज्ञानवश अपराध किया है, मुझे बचाइये'॥ ८-१२॥


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