भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 318 में से

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पृष्ठ 206

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १९५ इत्याकर्ण्य पुनः प्राह भरतं पुरतः स्थितम्। नृणां पितृसमो ज्येष्ठः स्वधर्ममनुवर्तिनाम् ॥ १५७ यथा न लङ्घ्यं वचनं मया पितृमुखेरितम्। तथा त्वया न लङ्घ्यं स्याद्वचनं मम सत्तम ॥ १५८ मत्समीपादितो गत्वा प्रजास्त्वं परिपालय। द्वादशाब्दिकमेतन्मे व्रतं पितृमुखेरितम् ॥ १५९ तदरण्ये चरित्वा तु आगमिष्यामि तेऽन्तिकम्। गच्छ तिष्ठ ममादेशे न दुःखं कर्तुमर्हसि ॥ १६० इत्युक्तो भरतः प्राह बाष्पपर्याकुलेक्षणः। यथा पिता तथा त्वं मे नात्र कार्या विचारणा ॥ १६१ तवादेशान्मया कार्यं देहि त्वं पादुके मम। नन्दिग्रामे वसिष्येऽहं पादुके द्वादशाब्दिकम् ॥ १६२ त्वद्वेषमेव मन्द्वेषं त्वद्व्रतं मे महाव्रतम्। त्वं द्वादशाब्दिकादूर्ध्वं यदि नायासि सत्तम ॥ १६३ ततो हविर्यथा चाग्नौ प्रधक्ष्यामि कलेवरम्। इत्येवं शपथं कृत्वा भरतो हि सुदुःखितः ॥ १६४ बहु प्रदक्षिणं कृत्वा नमस्कृत्य च राघवम्। पादुके शिरसा स्थाप्य भरतः प्रस्थितः शनैः ॥ १६५ स कुर्वन् भ्रातुरादेशं नन्दिग्रामे स्थितो वशी। तपस्वी नियताहारः शाकमूलफलाशनः ॥ १६६ जटाकलापं शिरसा च बिभ्रत् त्वचश्च वार्क्षीः किल वन्यभोजी। रामस्य वाक्यादरतो हृदि स्थितं बभार भूभारमनिन्दितात्मा ॥ १६७ यह सुनकर श्रीरामने अपने सामने खड़े हुए भरतसे पुनः कहा—'साधुश्रेष्ठ भरत ! अपने धर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंके लिये ज्येष्ठ भ्राता पिताके समान पूज्य है। जिस प्रकार मुझे पिताके मुखसे निकले हुए वचनका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये, वैसे ही तुम्हें भी मेरे वचनोंका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। अब तुम यहाँ मेरे निकटसे जाकर प्रजाजनका पालन करो। पिताके मुखसे कहा हुआ जो यह बारह वर्षोंके वनवासका व्रत मैंने स्वीकार किया है, उसका वनमें पालन करके मैं पुनः तुम्हारे पास आ जाऊँगा। जाओ, मेरी आज्ञाके पालनमें लग जाओ; तुम्हें खेद नहीं करना चाहिये' ॥ १५७-१६०॥ उनके यों कहनेपर भरतने आँखोंमें आँसू भरकर कहा—'भैया ! इसके सम्बन्धमें मुझे कोई विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है कि मेरे लिये जैसे पिताजी थे, वैसे ही आप हैं। अब मैं आपके आदेशके अनुसार ही कार्य करूँगा; किंतु आप अपनी दोनों चरणपादुकाएँ मुझे दे दें। मैं इन्हीं पादुकाओंका आश्रय ले नन्दिग्राममें निवास करूँगा और आपकी ही भाँति बारह वर्षोंतक व्रतका पालन करूँगा। अब आपके वेषके समान ही मेरा वेष होगा और आपका जो व्रत है, वही मेरा भी महान् व्रत होगा। साधुशिरोमणे! यदि आप बारह वर्षोंके व्रतका पालन करनेके बाद तुरंत नहीं पधारेंगे तो मैं अग्निमें हविष्यकी भाँति अपने शरीरको होम दूँगा।' अत्यन्त दुःखी भरतजीने इस प्रकार शपथ करके भगवान् रामकी अनेक बार प्रदक्षिणा की, बारंबार उन्हें प्रणाम किया और उनकी चरणपादुकाएँ अपने सिरपर रखकर वे वहाँसे धीरे-धीरे चल दिये ॥ १६१–१६५॥ भरतजी अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके, शाक और मूल-फलादिका नियमित आहार करते हुए, तपोनिष्ठ हो, भ्राताके आदेशका पालन करते हुए नन्दिग्राममें रहने लगे। विशुद्ध हृदयवाले भरतजी अपने सिरपर जटा धारण किये और अङ्गोंमें वल्कल पहने, वन्य फलोंका ही आहार करते थे। वे मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजीके वचनोंमें श्रद्धा रखनेके कारण अपने ऊपर पड़े पृथ्वीके शासनका भार ढोने लगे ॥ १६६-१६७॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे श्रीरामप्रादुर्भावे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें श्रीरामावतारविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_8_2_FrontPublic Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth