संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 205, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८ इत्युक्तो भरतस्तत्र भरद्वाजेन धीमता। उत्तीर्य यमुनां यातश्चित्रकूटं महानगम्॥ १४३ स्थितोऽसौ दृष्टवान्दूरात्सधूलीं चोत्तरां दिशम्। रामाय कथयित्वाऽऽस तदादेशात्तु लक्ष्मणः॥ १४४ वृक्षमारुह्य मेधावी वीक्षमाणः प्रयत्नतः। स ततो दृष्टवान् हृष्टामायान्तीं महतीं चमूम्॥ १४५ हस्त्यश्वरथसंयुक्तां दृष्ट्वा राममथाब्रवीत्। हे भ्रातस्त्वं महाबाहो सीतापाश्र्वे स्थिरो भव॥ १४६ भूपोऽस्ति बलवान् कश्चिद्धस्त्यश्वरथपत्तिभिः। इत्याकर्ण्य वचस्तस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः॥ १४७ रामस्तमब्रवीद्वीरो वीरं सत्यपराक्रमः। प्रायेण भरतोऽस्माकं द्रष्टुमायाति लक्ष्मण॥ १४८ इत्येवं वदतस्तस्य रामस्य विदितात्मनः। आरात्संस्थाप्य सेनां तां भरतो विनयान्वितः॥ १४९ ब्राह्मणैर्मन्त्रिभिः सार्धं रुदन्नागत्य पादयोः। रामस्य निपपाताथ वैदेह्या लक्ष्मणस्य च॥ १५० मन्त्रिणो मातृवर्गश्च स्निग्धबन्धुसुहृज्जनाः। परिवार्य ततो रामं रुरुदुः शोककातराः॥ १५१ स्वर्यातं पितरं ज्ञात्वा ततो रामो महामतिः। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्याथ समन्वितः॥ १५२ स्नात्वा मलापहे तीर्थे दत्त्वा च सलिलाञ्जलिम्। मात्रादीनभिवाद्याथ रामो दुःखसमन्वितः॥ १५३ उवाच भरतं राजन् दुःखेन महतान्वितम्। अयोध्यां गच्छ भरत इतः शीघ्रं महामते॥ १५४ राज्ञा विहीनां नगरीं अनाथां परिपालय। इत्युक्तो भरतः प्राह रामं राजीवलोचनम्॥ १५५ त्वामृते पुरुषव्याघ्र न यास्येऽहमितो ध्रुवम्। यत्र त्वं तत्र यास्यामि वैदेही लक्ष्मणो यथा॥ १५६ बुद्धिमान् भरद्वाजजीके यों कहनेपर भरतजी यमुना पार करके महान् पर्वत चित्रकूटपर गये। वहाँ खड़े हुए लक्ष्मणजीने दूरसे उत्तर दिशामें धूल उड़ती देख श्रीरामचन्द्रजीको सूचित किया। फिर उनकी आज्ञासे वृक्षपर चढ़कर बुद्धिमान् लक्ष्मणजी प्रयत्नपूर्वक उधर देखने लगे। तब उन्हें वहाँ बहुत बड़ी सेना आती दिखायी दी, जो हर्ष एवं उत्साहसे भरी जान पड़ती थी। हाथी, घोड़े और रथोंसे युक्त उस सेनाको देखकर लक्ष्मणजी श्रीरामसे बोले—'भैया! तुम सीताके पास स्थिरतापूर्वक बैठे रहो। महाबाहो! कोई महाबली राजा हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसे युक्त चतुरङ्गिणी सेनाके साथ आ रहा है'॥ १४३-१४६१/२॥ महात्मा लक्ष्मणके ऐसे वचन सुनकर सत्यपराक्रमी वीरवर श्रीराम अपने उस वीर भ्रातासे बोले—'लक्ष्मण! मुझे तो प्रायः यही जान पड़ता है कि भरत ही हम लोगोंसे मिलनेके लिये आ रहे हैं।' विदितात्मा भगवान् श्रीराम जिस समय यों कह रहे थे, उसी समय विनयशील भरतजी वहाँ पहुँचे और सेनाको कुछ दूरीपर ठहराकर स्वयं ब्राह्मणों और मन्त्रियोंके साथ निकट आ, सीता और लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामके चरणोंपर रोते हुए गिर पड़े। फिर मन्त्री, माताएँ, स्नेही बन्धु तथा मित्रगण श्रीरामको चारों ओरसे घेरकर शोकमग्न हो रोने लगे॥ १४७-१५१॥ तदनन्तर महामति श्रीरामने अपने पिताके स्वर्गगामी होनेका समाचार पाकर भ्राता लक्ष्मण और जानकीके साथ वहाँके पापनाशक तीर्थमें स्नान करके जलाञ्जलि दी। राजन्! फिर माता आदि गुरुजनोंको प्रणाम करके रामचन्द्रजी दुःखी हो अत्यन्त खेदमें पड़े हुए भरतसे बोले—'महामते भरत! तुम अब यहाँसे शीघ्र अयोध्याको चले जाओ और राजासे हीन हुई उस अनाथ नगरीका पालन करो।' उनके यों कहनेपर भरतने कमलनयन रामसे कहा—'पुरुषश्रेष्ठ! यह निश्चय है कि मैं आपको साथ लिये बिना यहाँसे नहीं जाऊँगा। जहाँ आप जायँगे, वहीं सीता-लक्ष्मणकी भाँति मैं भी चलूँगा'॥ १५२-१५६॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth3 Narsingpuran_Section_8_1_Back