भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 318 में से

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पृष्ठ 204

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १९३ भरतो राममन्वेष्टुं राममार्गेण सत्तमः। तमायान्तं महासैनं रामस्यानुविरोधिनम्॥ १३० मत्वा तं भरतं शत्रुं रामभक्तो गुहस्तदा। स्वं सैन्यं वर्तुलं कृत्वा संनद्धः कवची रथी॥ १३१ महाबलपरीवारो रुरोध भरतं पथि॥ १३२ सभ्रातृकं सभार्यं मे रामं स्वामिनमुत्तमम्। प्रापयस्त्वं वनं दुष्ट साम्प्रतं हन्तुमिच्छसि॥ १३३ गमिष्यसि दुरात्मंस्त्वं सेनया सह दुर्मते। इत्युक्तो भरतस्तत्र गुहेन नृपनन्दनः॥ १३४ तमुवाच विनीतात्मा रामायाथ कृताञ्जलिः। यथा त्वं रामभक्तोऽसि तथाहमपि भक्तिमान्॥ १३५ प्रोषिते मयि कैकेय्या कृतमेतन्महामते। रामस्यानयनार्थाय व्रजाम्यद्य महामते॥ १३६ सत्यपूर्वं गमिष्यामि पन्थानं देहि मे गुह। इति विश्वासमानीय जाह्नवीं तेन तारितः॥ १३७ नौकावृन्दैरनेकैस्तु स्नात्वासौ जाह्नवीजले। भरद्वाजाश्रमं प्राप्तो भरतस्तं महामुनिम्॥ १३८ प्रणम्य शिरसा तस्मै यथावृत्तमुवाच ह। भरद्वाजोऽपि तं प्राह कालेन कृतमीदृशम्॥ १३९ दुःखं न तावत् कर्तव्यं रामार्थेऽपि त्वयाधुना। वर्तते चित्रकूटोऽसौ रामः सत्यपराक्रमः॥ १४० त्वयि तत्र गते वापि प्रायोऽसौ नागमिष्यति। तथापि तत्र गच्छ त्वं यदसौ वक्ति तत्कुरु॥ १४१ रामस्तु सीतया सार्धं वनखण्डे स्थितः शुभे। लक्ष्मणस्तु महावीर्यो दुष्टालोकनतत्परः॥ १४२ ले) श्रीरामचन्द्रजीका अन्वेषण करनेके लिये जिस मार्गसे वे गये थे, उसी मार्गसे चले। उस समय भरत (और शत्रुघ्न)-को इतनी बड़ी सेनाके साथ आते देख, उन्हें श्रीरामचन्द्रजीका विरोधी शत्रु समझकर रामभक्त गुहने युद्धके लिये सुसज्जित हो, अपनी सेना गोलाकार खड़ी की और कवच धारणकर, रथारूढ़ हो, उस विशाल सेनासे घिरे हुए उसने मार्गमें भरतको रोक दिया। उसने कहा—'दुष्ट! दुरात्मन्! दुर्बुद्धे! तूने मेरे श्रेष्ठ स्वामी श्रीरामको भाई और पत्नीसहित वनमें तो भिजवा ही दिया; क्या अब उन्हें मारना भी चाहते हो, जो (इतनी बड़ी) सेनाके साथ वहाँ जा रहे हो?'॥ १२९-१३३ १/२ ॥ गुहके यों कहनेपर राजकुमार भरत श्रीरामके उद्देश्यसे हाथ जोड़कर विनययुक्त होकर उससे बोले—'गुह! जैसे तुम श्रीरामचन्द्रजीके भक्त हो, वैसे ही मैं भी उनमें भक्ति रखता हूँ। महामते! मैं नगरसे बाहर (मामाके घर) चला गया था, उस समय कैकेयीने यह अनर्थ कर डाला। महाबुद्धे! आज मैं श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये जा रहा हूँ। तुमसे यह सत्य बात बताकर वहाँ जाना चाहता हूँ। तुम मुझे मार्ग दे दो'॥ १३४-१३६ १/२ ॥ इस प्रकार विश्वास दिलानेपर गुह उन्हें गङ्गातटपर ले आया और झुंड-की-झुंड नौकाएँ मँगाकर उनके द्वारा उन सबको पार कर दिया। फिर गङ्गाजीके जलमें स्नान करके भरतजी भरद्वाजमुनिके आश्रमपर पहुँचे और उन महामुनिके चरणोंमें मस्तक झुका, प्रणाम करके उन्होंने उनसे अपना यथार्थ वृत्तान्त कह सुनाया॥ १३७-१३८ १/२ ॥ भरद्वाजजीने भी उनसे कहा—'भरत! कालके ही प्रभावसे ऐसा काण्ड घटित हुआ है। अब तुम्हें श्रीरामके लिये भी खेद नहीं करना चाहिये। सत्यपराक्रमी वे श्रीरामचन्द्रजी इस समय चित्रकूटमें हैं। वहाँ तुम्हारे जानेपर भी वे प्रायः नहीं आ सकेंगे; तथापि तुम वहाँ जाओ और जैसे वे कहें, वैसे ही करो। श्रीरामचन्द्रजी सीताके साथ एक सुन्दर वनखण्डमें निवास करते हैं और महान् पराक्रमी लक्ष्मण दुष्ट जीवोंपर दृष्टि रखते हैं—उनकी रक्षामें तत्पर रहते हैं'॥ १३९-१४२ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_8_1_Front... Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

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