संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना १९९ भजमानां त्यजेद्यस्तु तस्य दोषो महान् भवेत्। | पुरुष सेवामें उपस्थित हुई रमणीका त्याग करता है, उसे इत्युक्तः शूर्पणखया रामस्तामाह पार्थिवः ॥ ३८ | बड़ा दोष लगता है'॥ ३३-३७½॥ | शूर्पणखाके यों कहनेपर पृथ्वीपति श्रीरामचन्द्रजीने कलत्रवानहं बाले कनीयांसं भजस्व मे। | उससे कहा—'बाले! मेरे तो स्त्री है। तुम मेरे छोटे भाईके इति श्रुत्वा ततः प्राह राक्षसी कामरूपिणी ॥ ३९ | पास जाओ।' उनकी बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण | करनेवाली उस राक्षसीने कहा—'राघव! मैं रति-कर्ममें अतीव निपुणा चाहं रतिकर्मणि राघव। | बहुत निपुण हूँ और यह सीता अनभिज्ञ है; अतः इसे त्यक्त्वैनामनभिज्ञां त्वं सीतां मां भज शोभनाम् ॥ ४० | त्यागकर मुझ सुन्दरीको ही स्वीकार करें'॥ ३८-४०॥ | उसकी यह बात सुनकर धर्मपरायण श्रीरामने कहा— इत्याकर्ण्य वचः प्राह रामस्तां धर्मतत्परः। | 'मैं परायी स्त्रीके साथ कोई सम्पर्क नहीं रखता। तुम परस्त्रियं न गच्छेऽहं त्वमितो गच्छ लक्ष्मणम् ॥ ४१ | यहाँसे लक्ष्मणके निकट जाओ। यहाँ वनमें उसकी स्त्री | नहीं है; अतः शायद वह तुम्हें स्वीकार कर लेगा।' उनके तस्य नात्र वने भार्या त्वामसौ संग्रहीष्यति। | यों कहनेपर शूर्पणखा पुनः कमलनयन श्रीरामसे बोली— इत्युक्ता सा पुनः प्राह रामं राजीवलोचनम् ॥ ४२ | 'अच्छा, आप एक ऐसा पत्र लिखकर दें, जिससे लक्ष्मण | मेरा भर्ता (भरण-पोषणका भार लेनेवाला) हो सके।' तब यथा स्याल्लक्ष्मणो भर्ता तथा त्वं देहि पत्रकम्। | बुद्धिमान् कमलनयन महाराज श्रीरामने 'बहुत अच्छा' तथैवमुक्त्वा मतिमान् रामः कमललोचनः ॥ ४३ | कहकर एक पत्र लिखा और उसे दे दिया। उसमें लिखा | था—'लक्ष्मण! तुम इसकी नाक काट लो; निस्संदेह ऐसा छिन्ध्यस्या नासिकामिति मोक्तव्या नात्र संशयः। | ही करना। यों ही न छोड़ना'॥ ४१-४४॥ इति रामो महाराजो लिख्य पत्रं प्रदत्तवान् ॥ ४४ | शूर्पणखा वह पत्र लेकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे गयी। | जाकर उसने महात्मा लक्ष्मणको उसी रूपमें वह पत्र सा गृहीत्वा तु तत्पत्रं गत्वा तस्मान्मुदान्विता। | दे दिया। उस कामरूपिणी राक्षसीको देखकर लक्ष्मणने गत्वा दत्तवती तद्वल्लक्ष्मणाय महात्मने ॥ ४५ | उससे कहा—'कलङ्किनी! ठहर, मैं श्रीरामचन्द्रजीकी | आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकता।' यों कहकर तां दृष्ट्वा लक्ष्मणः प्राह राक्षसीं कामरूपिणीम्। | बुद्धिमान् लक्ष्मणने उसे पकड़ लिया और एक चमचमाती न लङ्घ्यं राघववचो मया तिष्ठात्मकश्मले ॥ ४६ | हुई तलवार उठाकर तिलवृक्षके काण्ड (पोखो)-के | समान उसकी नाक और कान काट लिये॥ ४५-४७॥ तां प्रगृह्य ततः खड्गमुद्यम्य विमलं सुधीः। | नाक कट जानेपर वह बहुत दुःखी हो रोने तथा तेन तत्कर्णनासां तु चिच्छेद तिलकाण्डवत् ॥ ४७ | विलाप करने लगी—'हा! समस्त देवताओंका मान- | मर्दन करनेवाले मेरे भाई रावण! आज मुझपर महान् छिन्ननासा ततः सा तु रुरोद भृशदुःखिता। | कष्ट आ गया। हा भाई कुम्भकर्ण! मुझपर बड़ी भारी हा दशास्य मम भ्रातः सर्वदेवविमर्दक ॥ ४८ | विपत्ति आ पड़ी। हा गुणनिधे महामते विभीषण! मुझे | महान् दुःख देखना पड़ा'॥ ४८-४९॥ हा कष्टं कुम्भकर्णाद्यायाता मे चापदा परा। | इस प्रकार आर्तभावसे रोदन करती हुई वह हा हा कष्टं गुणनिधे विभीषण महामते ॥ ४९ | खर-दूषण और त्रिशिराके पास गयी तथा उनसे | अपने अपमानकी बात निवेदन करके बोली— इत्येवमार्ता रुदती सा गत्वा खरदूषणौ। | त्रिशिरसं च सा दृष्ट्वा निवेद्यात्मपराभवम् ॥ ५० | In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth