भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 318 में से

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पृष्ठ 200

अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८९ अथ लक्ष्मणमाहेदं वचनं राघवस्तदा। | तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने उस समय लक्ष्मणसे यह सीतामर्पय राजानं जनकं मिथिलेश्वरम् ॥ ७९ | बात कही—'लक्ष्मण! तुम सीताको ले जाकर मिथिलापति | राजा जनकको सौंप आओ और स्वयं पिता-माताके पितृमातृवशे तिष्ठ गच्छ लक्ष्मण याम्यहम्। | अधीन रहो। लौट जाओ, लक्ष्मण! मैं वनको अकेला ही इत्युक्तः प्राह धर्मात्मा लक्ष्मणे भ्रातृवत्सलः ॥ ८० | जाऊँगा।' उनके यों कहनेपर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा लक्ष्मणने | कहा—'प्रभो! करुणानिधान! आप मुझे ऐसी कठोर मैवमाज्ञापय विभो मामद्य करुणाकर। | आज्ञा न दीजिये। आप जहाँ भी जाना चाहते हैं, वहाँ मैं गन्तुमिच्छसि यत्र त्वमवश्यं तत्र याम्यहम् ॥ ८१ | अवश्य चलूँगा।' लक्ष्मणके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने | सीतासे कहा—'शोभने सीते! तुम मेरी आज्ञासे अपने इत्युक्तो लक्ष्मणेनासौ सीतां तामाह राघवः। | पिताके यहाँ चली जाओ अथवा माता कौशल्या और सीते गच्छ ममादेशात् पितरं प्रति शोभने ॥ ८२ | सुमित्राके भवनमें जाकर रहो। सुन्दरि! तुम तबतकके | लिये वहाँ लौट जाओ, जबतक कि मैं वनसे फिर यहाँ सुमित्राया गृहे चापि कौशल्यायाः सुमध्यमे। | आ न जाऊँ' ॥ ७९–८३ ॥ निवर्तस्व हि तावत्त्वं यावदागमनं मम ॥ ८३ | श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर सीता भी | हाथ जोड़कर बोली—'महाबाहो! हे शत्रुदमन! आप इत्युक्ता राघवेनापि सीता प्राह कृताञ्जलिः। | वनमें जहाँ जाकर निवास करेंगे, वहाँ चलकर मैं भी यत्र गत्वा वने वासं त्वं करोषि महाभुज ॥ ८४ | आपके ही साथ रहूँगी। राजन्! सत्यव्रतका पालन | करनेवाले आप पतिदेवका वियोग मैं क्षणभरके लिये तत्र गत्वा त्वया सार्धं वसाम्यहमरिंदम। | भी नहीं सह सकती; इसलिये प्रभो! मैं प्रार्थना करती वियोगं नो सहे राजंस्त्वया सत्यवता क्वचित् ॥ ८५ | हूँ, मुझपर दया करें। प्राणनाथ! आप जहाँ जाना चाहते | हैं, वहाँ मैं भी अवश्य ही चलूँगी' ॥ ८४–८६ ॥ अतस्त्वां प्रार्थयिष्यामि दयां कुरु मम प्रभो। | इसके बाद श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मेरे पीछे गन्तुमिच्छसि यत्र त्वमवश्यं तत्र याम्यहम् ॥ ८६ | बहुत-से पुरुष नाना प्रकारके वाहनोंपर चढ़कर आ गये | हैं तथा झुंड-की-झुंड स्त्रियाँ भी आ गयी हैं; तब नानायानैरुपगताञ्जनान् वीक्ष्य स पृष्ठतः। | धर्मवेत्ता श्रीरामने उन सबको साथ चलनेसे मना किया योषितां च गणान् रामो वारयामास धर्मवित् ॥ ८७ | और कहा—'पुरुषो! और स्त्रियो! आप सब लोग | लौटकर अयोध्यामें स्वच्छन्दतापूर्वक रहें। मैं तपस्याके निवृत्य स्थीयतां स्वैरमयोध्यायां जनाः स्त्रियः। | लिये चित्त एकाग्र करके दण्डकारण्यको जा रहा हूँ। गत्वाहं दण्डकारण्यं तपसे धृतमानसः ॥ ८८ | वहाँ कुछ ही वर्षोंतक रहनेके बाद मैं अपनी पत्नी सीता | और भाई लक्ष्मणके साथ यहाँ लौट आऊँगा, यह मैंने कतिपयाब्दादायास्ये नान्यथा सत्यमीरितम्। | सच्ची बात बतायी है। इसे अन्यथा नहीं मानना लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या च स्वभार्यया ॥ ८९ | चाहिये' ॥ ८७–८९ ॥ | इस प्रकार अयोध्यावासी लोगोंको लौटाकर जनान्निवर्त्य रामोऽसौ जगाम च गुहाश्रमम्। | श्रीरामने गुहके आश्रमपर पदार्पण किया। गुह स्वभावसे गुहस्तु रामभक्तोऽसौ स्वभावादेव वैष्णवः ॥ ९० | ही वैष्णव तथा श्रीरामचन्द्रजीका परम भक्त था। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth