भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 318 में से

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पृष्ठ 201

१९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा किं कर्तव्यमिति स्थितः। महता तपसाऽऽनीता गुरुणा या हि वः पुरा॥ ९१ भगीरथेन या भूमिं सर्वपापहरा शुभा। नानामुनिजनैर्जुष्टा कूर्ममत्स्यसमाकुला॥ ९२ गङ्गा तुङ्गोर्मिमालाढ्या स्फटिकाभजलावहा। गुहोपनीतनावा तु तां गङ्गां स महाद्युतिः॥ ९३ उत्तीर्य भगवान् रामो भरद्वाजाश्रमं शुभम्। प्रयागे तु ततस्तस्मिन् स्नात्वा तीर्थे यथाविधि॥ ९४ लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा राघवः सीतया सह। भरद्वाजाश्रमे तत्र विश्रान्तस्तेन पूजितः॥ ९५ ततः प्रभाते विमले तमनुज्ञाप्य राघवः। भरद्वाजोक्तमार्गेण चित्रकूटं शनैर्ययौ॥ ९६ नानाद्रुमलताकीर्णं पुण्यतीर्थमनुत्तमम्। तापसं वेषमास्थाय जह्नुकन्यामतीत्य वै॥ ९७ गते रामे सभार्थे तु सह भ्रात्रा ससारथौ। अयोध्यामवसन् भूप नष्टशोभां सुदुःखिताः॥ ९८ नष्टसंज्ञो दशरथः श्रुत्वा वचनमप्रियम्। रामप्रवासजननं कैकेय्या मुखनिस्सृतम्॥ ९९ लब्धसंज्ञः क्षणाद्राजा रामरामेति चुक्रुशे। कैकेय्युवाच भूपालं भरतं चाभिषेचय॥ १०० सीतालक्ष्मणसंयुक्तो रामचन्द्रो वनं गतः। पुत्रशोकाभिसंतप्तो राजा दशरथस्तदा॥ १०१ विहाय देहं दुःखेन देवलोकं गतस्तदा। ततस्तस्य महापुर्यामयोध्यायामरिंदम॥ १०२ रुरुदुःखशोकार्त्ता जनाः सर्वे च योषितः। कौशल्या च सुमित्रा च कैकेयी कष्टकारिणी॥ १०३ भगवान् रामको देखते ही वह उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला—'भगवान्! मैं क्या सेवा करूँ'॥ ९० १/२॥ [यों कहकर गुहने सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका सादर पूजन एवं सत्कार किया। इसके बाद सबेरे सारथि और रथको लौटाकर वे गङ्गाजीके तटपर गये और पुनः कहने लगे—] राजन्! जिन्हें आपके पूर्वज महाराज भगीरथ पूर्वकालमें बड़ी तपस्या करके पृथ्वीपर ले आये थे, जो समस्त पापहारिणी और कल्याणकारिणी हैं, अनेकानेक मुनिजन जिनका सेवन करते हैं, जिनमें कूर्म और मत्स्य आदि जल-जन्तु भरे रहते हैं, जो ऊँची-ऊँची लहरोंसे सम्पन्न एवं स्फटिकमणिके समान स्वच्छ जल बहानेवाली हैं, उन पुण्यसलिला गङ्गाजीको गुहके द्वारा लायी हुई नावसे पार करके महान् कान्तिमान् भगवान् श्रीराम भरद्वाज मुनिके शुभ आश्रमपर गये॥ ९१-९३ १/२॥ वह आश्रम प्रयागमें था। श्रीरामचन्द्रजीने सीता तथा भाई लक्ष्मणके साथ उस प्रयागतीर्थमें विधिवत् स्नान करके, वहीं भरद्वाज ऋषिके आश्रममें उनसे सम्मान प्राप्तकर रात्रिमें विश्राम किया। फिर निर्मल प्रभातकाल होनेपर श्रीराम तपस्वीवेष धारणकर, भरद्वाज मुनिसे आज्ञा ले, उन्हींके बताये हुए मार्गसे गङ्गाके पार हो, धीरे-धीरे नाना प्रकारके वृक्ष और लताओंसे आच्छन्न परम उत्तम पावन तीर्थ चित्रकूटको गये॥ ९४-९७॥ राजन्! इधर सीता-लक्ष्मण और सारथिके सहित रामचन्द्रजीके चले जानेपर अयोध्यावासीजन बहुत दुःखी होकर शोभाशून्य अयोध्यानगरीमें रहने लगे। राजा दशरथ तो कैकेयीके मुखसे निर्गत श्रीरामको वनवास देनेवाले अप्रिय वचनको सुनते ही मूर्च्छित हो गये थे। कुछ देर बाद जब राजाको होश हुआ, तब वे उच्चस्वरसे 'राम! राम!' पुकारने लगे। तब कैकेयीने भूपालसे कहा— 'राम तो सीता और लक्ष्मणके साथ वनमें चले गये; अब आप भरतका राज्याभिषेक कीजिये।' यह सुनते ही राजा दशरथ पुत्रशोकसे संतप्त हो, दुःखके मारे शरीर त्यागकर देवलोकको चले गये॥ ९८-१०१ १/२॥ शत्रुदमन! तब उनकी महानगरी अयोध्यामें रहनेवाले सभी स्त्री-पुरुष दुःख और शोकसे पीड़ित हो विलाप करने लगे। कौशल्या, सुमित्रा तथा कष्टकारिणी In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth