संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १९१
[संस्कृत श्लोक]
परिवार्य मृतं तत्र रुरुदुस्ताः पतिं ततः । ततः पुरोहितस्तत्र वसिष्ठः सर्वधर्मवित् ॥ १०४ तैलद्रोण्यां विनिक्षिप्य मृतं राजकलेवरम् । दूतं वै प्रेषयामास सहमन्त्रिगणैः स्थितः ॥ १०५ स गत्वा यत्र भरतः शत्रुघ्नेन सह स्थितः । तत्र प्राप्य तथा वार्तां संनिवर्त्य नृपात्मजौ ॥ १०६ तावानीय ततः शीघ्रमयोध्यां पुनरागतः । क्रूराणि दृष्ट्वा भरतो निमित्तानि च वै पथि ॥ १०७ विपरीतं त्वयोध्यायामिति मेने स पार्थिवः । निश्शोभां निर्गतश्रीकां दुःखशोकान्वितां पुरीम् ॥ १०८ कैकेय्याग्निविनिर्दग्धामयोध्यां प्रविवेश सः । दुःखान्विता जनाः सर्वे तौ दृष्ट्वा रुरुदुर्भृशम् ॥ १०९ हा तात राम हा सीते लक्ष्मणेति पुनः पुनः । रुरोद भरतस्तत्र शत्रुघ्नश्च सुदुःखितः ॥ ११० कैकेय्यास्तत्क्षणाच्छ्रुत्वा चुक्रोध भरतस्तदा । दुष्टा त्वं दुष्टचित्ता च यया रामः प्रवासितः ॥ १११ लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा राघवः सीतया वनम् । साहसं किं कृतं दुष्टे त्वया सद्योऽल्पभाग्यया ॥ ११२ उद्वास्य सीतया रामं लक्ष्मणेन महात्मना । ममैव पुत्रं राजानं करोत्विति मतिस्तव ॥ ११३ दुष्टाया नष्टभाग्यायाः पुत्रोऽहं भाग्यवर्जितः । भ्रात्रा रामेण रहितो नाहं राज्यं करोमि वै ॥ ११४ यत्र रामो नरव्याघ्रः पद्मपत्रायतेक्षणः । धर्मज्ञः सर्वशास्त्रज्ञो मतिमान् बन्धुवत्सलः ॥ ११५ सीता च यत्र वैदेही नियमव्रतचारिणी । पतिव्रता महाभागा सर्वलक्षणसंयुता ॥ ११६
[हिन्दी अनुवाद]
कैकेयी भी अपने मृत पतिको चारों ओरसे घेरकर रोने लगीं ॥ १०२-१०३ १/२ ॥ तब सब धर्मोंको जाननेवाले पुरोहित वसिष्ठजीने वहाँ आकर सबको शान्त किया और राजाके मृत शरीरको तेलसे भरी हुई नौकामें रखवाकर, मन्त्रिगणोंके साथ विचार करके, भरत-शत्रुघ्नको बुलानेके लिये दूत भेजा। वह दूत जहाँ शत्रुघ्नके साथ भरतजी थे, वहाँ गया और जितना उसे बताया गया था, उतना ही संदेश सुनाकर, उन दोनों राजकुमारोंको वहाँसे लौटाकर, उन्हें साथ ले, शीघ्र ही अयोध्यामें लौट आया। राजा भरत मार्गमें घोर अपशकुन देख मन-ही-मन यह जान गये कि 'अयोध्यामें कोई विपरीत घटना घटित हुई है।' फिर जो कैकेयीरूपी अग्निसे दग्ध होकर शोभाहीन, निस्तेज और दुःख-शोकसे परिपूर्ण हो गयी थी, उस अयोध्यापुरीमें भरतजीने प्रवेश किया। उस समय भरत और शत्रुघ्नको देख सभी लोग दुःखी हो 'हा तात! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!' इस प्रकार बारम्बार पुकारते हुए बहुत विलाप करने लगे। यह देख भरत और शत्रुघ्न भी दुःखी होकर रोने लगे ॥ १०४-११० ॥ उस समय कैकेयीके मुखसे तत्काल सारा वृत्तान्त सुनकर भरतजी उसके ऊपर बहुत ही कुपित हुए और बोले—'अरी! तू तो बड़ी दुष्टा है। तेरे चित्तमें दुष्टतापूर्ण विचार भरा हुआ है। हाय! जिसने श्रीरामको वनवास दे दिया, जिसके कारण भाई लक्ष्मण और देवी सीताके साथ श्रीरघुनाथजीको वनमें जानेको विवश होना पड़ा, उससे बढ़कर दुष्टा कौन स्त्री होगी? अरी दुष्टे! ओ मन्दभागिनी! तूने तत्काल ऐसा दुस्साहस कैसे किया? तूने सोचा होगा कि महात्मा लक्ष्मण और साध्वी सीताके साथ रामको घरसे निकालकर महाराजा दशरथ मेरे ही पुत्रको राजा बना देंगे। (धिक्कार है तेरी इस कुबुद्धिको!) आह! मैं कितना भाग्यहीन हूँ, जो तुझ-जैसी अभागिनी दुष्टा स्त्रीका पुत्र हुआ। किंतु तू निश्चय जान, मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामसे अलग रहकर राज्य नहीं करूँगा। जहाँ मनुष्योंमें श्रेष्ठ, धर्मज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता, बुद्धिमान् तथा भाइयोंपर स्नेह रखनेवाले पूज्य भ्राता कमलदललोचन श्रीरामचन्द्रजी गये हैं, जहाँ नियम और व्रतका आचरण करनेवाली, समस्त शुभलक्षणोंसे युक्त, अत्यन्त सौभाग्य-शालिनी पतिव्रता विदेहराजकुमारी सीताजी विद्यमान हैं