भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 318 में से

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पृष्ठ 218

अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २०७ ततो विनीतेन गुणान्वितेन तदनन्तर विनयशील और गुणी भाई लक्ष्मणके भ्रात्रा समेतो जगदेकनाथः । साथ जगदीश्वर भगवान् राम प्रियाके वियोगसे अत्यन्त प्रियावियोगेन सुदुःखितात्मा जगाम याम्यां स तु रामदेवः ॥ १३७ दुःखी हो वहाँसे दक्षिणकी ओर चल दिये ॥ १३७ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे एकोनपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीरामावतारविषयक' उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥ पचासवाँ अध्याय सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना; सीताकी खोज और हनुमान्का लङ्कागमन मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले-वालीसे वैर हो जानेके कारण वालिना कृतवैरोऽथ दुर्गवर्ती हरीश्वरः । उसके लिये दुर्गम स्थानमें रहनेवाले वानरराज सुग्रीवने सुग्रीवो दृष्टवान् दूराद्दृष्ट्वाऽऽह पवनात्मजम् ॥ १ दूरसे ही श्रीराम और लक्ष्मणको आते देखा और देखकर पवनकुमार हनुमान्जीसे कहा- 'ये दोनों किसके कस्येमौ सुधनुःपाणी चीरवल्कलधारिणौ । पुत्र हैं, जो हाथमें सुन्दर धनुष लिये, चीर एवं वल्कल- पश्यन्तौ सरसीं दिव्यां पद्मोत्पलसमावृताम् ॥ २ वस्त्र धारण किये, कमलों एवं उत्पलोंसे आच्छन्न इस दिव्य सरोवरको देख रहे हैं।' जान पड़ता है, ये दोनों नानारूपधरावेतौ तापसं वेषमास्थितौ । वालीके भेजे हुए बहुविधरूपधारी दूत हैं, जो इस समय वालिदूताविह प्राप्ताविति निश्चित्य सूर्यजः ॥ ३ तपस्वीका वेष धारण किये यहाँ आ पहुँचे हैं। यह निश्चय करके सूर्यकुमार सुग्रीव भयभीत हो गये और उत्पपात भयत्रस्तः ऋष्यमूकाद् वनान्तरम् । समस्त वानरोंके साथ ऋष्यमूक पर्वतसे कूदकर दूसरे वानरैः सहितः सर्वैरगस्त्याश्रममुत्तमम् ॥ ४ वनमें स्थित अगस्त्यमुनिके उत्तम आश्रमपर चले गये ॥ १-४ ॥ तत्र स्थित्वा स सुग्रीवः प्राह वायुसुतं पुनः । वहाँ स्थित होकर सुग्रीवने पुनः पवनकुमारसे कहा- हनूमन् पृच्छ शीघ्रं त्वं गच्छ तापसवेषधृक् ॥ ५ 'हनूमन् ! तुम भी तपस्वीका वेष धारण करके शीघ्र जाओ और पूछो कि 'वे कौन हैं? किसके पुत्र हैं? और किस कौ हि कस्य सुतौ जातौ किमर्थं तत्र संस्थितौ । लिये वहाँ ठहरे हुए हैं?' महाबुद्धिमान् वायुनन्दन ! ये सब ज्ञात्वा सत्यं मम ब्रूहि वायुपुत्र महामते ॥ ६ बातें सच-सच जानकर मुझसे बताओ' ॥ ५-६ ॥ उनके इस प्रकार कहनेपर हनुमान्जी संन्यासीके इत्युक्तो हनुमान् गत्वा पम्पातटमनुत्तमम् । रूपमें पम्पासरके उत्तम तटपर गये और भाई लक्ष्मणके भिक्षुरूपी स तं प्राह रामं भ्रात्रा समन्वितम् ॥ ७ साथ विद्यमान श्रीरामचन्द्रजीसे बोले- 'महामते ! आप कौन हैं? यहाँ कैसे आये हैं? इस जनशून्य घोर वनमें को भवानिह सम्प्राप्तस्तथ्यं ब्रूहि महामते । आप कहाँसे आ गये ? यहाँ आनेका क्या प्रयोजन है ?- अरण्ये निर्जने घोरे कुतस्त्वं किं प्रयोजनम् ॥ ८ ये सब बातें मेरे समक्ष ठीक-ठीक बताइये' ॥ ७-८ ॥

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