भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 318 में से

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पृष्ठ 219

२०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० एवं वदन्तं तं प्राह लक्ष्मणो भ्रातुराज्ञया। इस प्रकार पूछते हुए हनुमान्जीसे अपने भाईकी आज्ञा प्रवक्ष्यामि निबोध त्वं रामवृत्तान्तमादितः॥ ९ पाकर लक्ष्मण बोले—'मैं श्रीरामचन्द्रजीका वृत्तान्त आदिसे ही वर्णन करता हूँ, सुनो। इस पृथिवीपर दशरथ नामके राजा दशरथो नाम बभूव भुवि विश्रुतः। राजा बहुत प्रसिद्ध थे। महाबुद्धे! ये मेरे बड़े भाई श्रीराम तस्य पुत्रो महाबुद्धे रामो ज्येष्ठो ममाग्रजः॥ १० उन्हीं महाराजके ज्येष्ठ पुत्र हैं। इनका राज्याभिषेक होने जा रहा था, किंतु (मेरी छोटी सौतेली माता) कैकेयीने उसे अस्याभिषेक आरब्धः कैकेय्या तु निवारितः। रोक दिया। फिर, पिताकी आज्ञाका पालन करते हुए ये पितुराज्ञामयं कुर्वन् रामो भ्राता ममाग्रजः॥ ११ मेरे बड़े भ्राता श्रीराम मेरे तथा अपनी धर्मपत्नी सीताके साथ घरसे निकल आये। वनमें आकर इन्होंने अनेकों मया सह विनिष्क्रम्य सीतया सह भार्यया। मुनियोंसे युक्त दण्डकारण्यमें प्रवेश किया। वहाँ जनस्थानमें प्रविष्टो दण्डकारण्यं नानामुनिसमाकुलम्॥ १२ निवास करते हुए इन महात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नी सीताको वनमें किसी पापीने हर लिया। उन सीताजीकी जनस्थाने निवस्तो रामस्यास्य महात्मनः। ही खोज करते हुए ये वीरवर कमलनयन श्रीराम यहाँ भार्या सीता तत्र वने केनापि पाप्मना हृता॥ १३ आये हैं, जिससे तुम्हें यहाँ इनका दर्शन हुआ है। बस, यही हमारा वृत्तान्त है, जो तुमसे बता दिया'॥ ९–१४॥ सीतामन्वेषयन् वीरो रामः कमललोचनः। इहायातस्त्वया दृष्ट इति वृत्तान्तमीरितम्॥ १४ महात्मा लक्ष्मणके वचन सुनकर उनपर विश्वास हो आनेके कारण वायुनन्दन हनुमान्ने अपने स्वरूपको प्रकट श्रुत्वा ततो वचस्तस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः। नहीं किया और रघुकुलनायक रामचन्द्रसे यह कहकर कि अव्यञ्जितात्मा विश्वासाद्धनूमान् मारुतात्मजः॥ १५ 'आप मेरे स्वामी हैं'—उन्हें सान्त्वना देते हुए अपने साथ सुग्रीवके पास ले आकर उन दोनों भाइयोंकी सुग्रीवसे त्वं मे स्वामी इति वदन् रामं रघुपतिं तदा। मित्रता करा दी। फिर श्रीरामचन्द्रजीके स्वरूपका परिचय आश्वास्यानीय सुग्रीवं तयोः सख्यमकारयत्॥ १६ प्राप्त हो जानेके कारण उनके चरण-कमलोंको सिरपर धारणकर वानरराज सुग्रीवने मधुर वाणीमें कहा—'राजेन्द्र! शिरस्यारोप्य पादाब्जं रामस्य विदितात्मनः। इसमें संदेह नहीं कि आजसे आप हमारे स्वामी हुए और सुग्रीवो वानरेन्द्रस्तु उवाच मधुराक्षरम्॥ १७ प्रभो! मैं समस्त वानरोंके साथ आपका सेवक हुआ। रघुनन्दन! आपका जो शत्रु है, वह आजसे मेरा भी शत्रु अद्यप्रभृति राजेन्द्र त्वं मे स्वामी न संशयः। है और जो आपका मित्र है, वह मेरा भी श्रेष्ठ मित्र है; अहं तु तव भृत्यश्च वानरैः सहितः प्रभो॥ १८ इतना ही नहीं, आपका जो दुःख है, वह मेरा भी है तथा आपकी प्रसन्नता ही मेरी भी प्रसन्नता है' यों कहकर त्वच्छत्रुर्मम शत्रुः स्यादद्यप्रभृति राघव। सुग्रीवने पुनः श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥ १५–१९१/२॥ मित्रं ते मम सन्मित्रं त्वद्दुःखं तन्ममापि च॥ १९ 'प्रभो! 'वाली' नामक मेरा ज्येष्ठ भाई है, जो त्वत्प्रीतिरेव मत्प्रीतिरित्युक्त्वा पुनराह तम्। महाबलवान् और बड़ा ही पराक्रमी है; किंतु वह वाली नाम मम ज्येष्ठो महाबलपराक्रमः॥ २० हृदयका अत्यन्त दुष्ट है। उसने कामासक्त होकर मेरी भार्याका अपहरण कर लिया है। पुरुषश्रेष्ठ! इस समय भार्यापहारी दुष्टात्मा मदनासक्तमानसः। आपके सिवा दूसरा कोई वालीको मारनेवाला नहीं है। त्वामृते पुरुषव्याघ्र नास्ति हन्ताद्य वालिनम्॥ २१ राजकुमार! पुराणवेत्ताओंने कहा है कि जो ताड़के इन सात वृक्षोंको एक साथ ही काट डालेगा, वही वालीका युगपत्सप्ततालांस्तु तरून् यो वै वधिष्यति। वध कर सकेगा'॥ २०–२२॥ स तं वधिष्यतीत्युक्तं पुराणज्ञैर्नृपात्मज॥ २२ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth