भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 318 में से

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पृष्ठ 220

अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २०९ तत्प्रियार्थं हि रामोऽपि श्रीमांश्छित्त्वा महातरून्। [यह सुनकर] श्रीमान् रामचन्द्रजीने भी सुग्रीवका अर्धकृष्टेन बाणेन युगपद्रघुनन्दनः ॥ २३ प्रिय करनेके लिये आधे खींचे हुए बाणसे ही उन सात महावृक्षोंको एक ही साथ काट डाला। उन महावृक्षोंका विद्ध्वा महातरून् रामः सुग्रीवं प्राह पार्थिवम्। भेदन करके श्रीरामने राजा सुग्रीवसे कहा- 'सूर्यनन्दन वालिना गच्छ युध्यस्व कृतचिह्नो रखेः सुत ॥ २४ सुग्रीव ! मेरे पहचाननेके लिये अपने शरीरमें कोई चिह्न धारण करके तुम जाओ और वालीके साथ युद्ध करो।' इत्युक्तः कृतचिह्नोऽयं युद्धं चक्रेऽथ वालिना। उनके यों कहनेपर सुग्रीवने चिह्न धारणकर वालीके साथ रामोऽपि तत्र गत्वाथ शरेणैकेन वालिनम् ॥ २५ युद्ध किया और श्रीरामने भी वहाँ जाकर एक ही बाणसे वालीको बींध दिया। इससे पराक्रमी वाली पृथ्वीपर गिरा विव्याध वीर्यवान् वाली पपात च ममार च। और मर गया। तब श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त डरे हुए वालि- वित्रस्तं वालिपुत्रं तु अङ्गदं विनयान्वितम् ॥ २६ कुमार अङ्गदको, जो बहुत ही विनयी और संग्राममें रणशौण्डं यौवराज्ये नियुक्त्वा राघवस्तदा। कुशल था, युवराजपदपर अभिषिक्त करके ताराको सुग्रीव- तां च तारां तथा दत्त्वा रामश्च रविसूनवे ॥ २७ की सेवामें अर्पित कर दिया। तत्पश्चात् कमलनयन धर्मात्मा सुग्रीवं प्राह धर्मात्मा रामः कमललोचनः । श्रीराम सुग्रीवसे बोले- 'तुम वानरोंके राज्यकी देख-भाल राज्यमन्वेष्य स्वं त्वं कपीनां पुनराव्रज ॥ २८ कर लो, फिर मेरे पास आना और कपीश्वर ! सीताकी खोज करानेका शीघ्र ही यत्न करना' ॥ २३-२८१/२ ॥ त्वं सीतान्वेषणे यत्नं कुरु शीघ्रं हरीश्वर। उनके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर सुग्रीवने लक्ष्मणसहित इत्युक्तः प्राह सुग्रीवो रामं लक्ष्मणसंयुतम् ॥ २९ श्रीरामचन्द्रजीसे कहा- 'रघुनन्दन ! इस समय महान् वर्षाकाल आ पहुँचा है; इन्द्रके वर्षा करते रहनेपर इस वनमें प्रावृट्कालो महान् प्राप्तः साम्प्रतं रघुनन्दन। वानरोंका चलना-फिरना न हो सकेगा। राजेन्द्र ! वर्षा वानराणां गतिर्नास्ति वने वर्षति वासवे ॥ ३० बीतने और शरत्काल आ जानेपर मैं समस्त दिशाओंमें अपने वानर दूतोंको भेजूँगा।' यह कहकर वानरराज सुग्रीवने गते तस्मिंस्तु राजेन्द्र प्राप्ते शरदि निर्मले । श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया और पम्पापुरमें प्रवेश करके चारान् सम्प्रेषयिष्यामि वानरान्दिक्षु राघव ॥ ३१ वे ताराके साथ रमण करने लगे ॥ २९-३२ ॥ इत्युक्त्वा रामचन्द्रं स तं प्रणम्य कपीश्वरः । इधर महामति श्रीरामचन्द्रजी भी अपने भाई लक्ष्मणके पम्पापुरं प्रविश्याथ रेमे तारासमन्वितः ॥ ३२ साथ उस महावनमें 'नीलकण्ठ' नामक पर्वतकी चोटीपर विधिपूर्वक रहने लगे। (सीताके वियोगमें) उनका वर्षाकाल रामोऽपि विधिवद्भ्रात्रा शैलसानौ महावने । बड़ी कठिनाईसे बीता। जब शरत्काल उपस्थित हुआ, निवासं कृतवान् शैले नीलकण्ठे महामतिः ॥ ३३ तब श्रीरामचन्द्रजीने सीताके वियोगसे व्यथित हो सुमित्रानन्दन लक्ष्मणसे इस विषयमें वार्तालाप किया। प्रावृट्काले गते कृच्छ्रात् प्राप्ते शरदि राघवः । उस समयतक वहाँ न आकर सुग्रीवने अपनी पूर्व- सीतावियोगाद्व्यथितः सौमित्रिं प्राह लक्ष्मणम् ॥ ३४ प्रतिज्ञाका उल्लङ्घन किया था। इसलिये भ्रातृवत्सल उल्लङ्घितस्तु समयः सुग्रीवेण ततो रुषा। ककुत्स्थनन्दन श्रीरामने लक्ष्मणसे क्रोधपूर्वक कहा- लक्ष्मणं प्राह काकुत्स्थो भ्रातरं भ्रातृवत्सलः ॥ ३५