भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 318 में से

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पृष्ठ 223

२१२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५० इत्युक्तो राघवस्तेन भ्रात्रा सुग्रीवमब्रवीत्। । भाई लक्ष्मणके इस प्रकार अनुरोध करनेपर आगच्छात्र महावीर सुग्रीव कुशलं तव॥ ६७ । श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवसे कहा—'महावीर सुग्रीव! यहाँ श्रुत्वैत्थं रामवचनं प्रसन्नं च नराधिपम्। । आओ। कहो, कुशल तो है न?' श्रीरामचन्द्रजीका ऐसा शिरस्यञ्जलिमाधाय सुग्रीवो राममब्रवीत्॥ ६८ । कथन सुनकर और उन नरेशको प्रसन्न जानकर सुग्रीवने तदा मे कुशलं राजन् सीतादेवी तव प्रभो। । सिरपर अञ्जलि जोड़ उनसे कहा—'राजन्! प्रभो! मेरी अन्विष्य तु यदा दत्ता मया भवति नान्यथा॥ ६९ । कुशल तो तभी होगी, जब मैं सीतादेवीको ढूँढ़कर इत्युक्ते वचने तेन हनूमान्मारुतात्मजः। । आपको अर्पित कर दूँ; नहीं तो नहीं'॥ ६७—६९॥ नत्वा रामं बभाषैनं सुग्रीवं कपिनायकम्॥ ७० । सुग्रीवने जब यह बात कही, तब पवनकुमार हनूमान्‌जी शृणु सुग्रीव मे वाक्यं राजायं दुःखितो भृशम्। । श्रीरामको नमस्कार करके कपिराज सुग्रीवसे बोले— सीतावियोगेन च सदा नाश्नाति च फलादिकम्॥ ७१ । 'सुग्रीव! आप मेरी बात सुनें। ये राजा श्रीरामचन्द्रजी अस्य दुःखेन सततं लक्ष्मणोऽयं सुदुःखितः। । सीताके वियोगसे सदा ही बहुत दुःखी रहते हैं, इसीलिये एतयोस्त्र यावस्था तां श्रुत्वा भरतोऽनुजः॥ ७२ । फल आदिका भी आहार नहीं करते। इन्हींके दुःखसे दुःखी भवति तद्दुःखाद्दुःखं प्राप्नोति तज्जनः। । ये लक्ष्मण भी सदा अत्यन्त दुःखित रहा करते हैं। इन यत एवमतो राजन् सीतान्वेषणमाचर॥ ७३ । दोनोंकी यहाँ जो अवस्था है, उसे सुनकर इनके छोटे इत्युक्ते वचने तत्र वायुपुत्रेण धीमता। । भाई भरत भी दुःखी होते हैं और उनके दुःखसे वहाँके जाम्बवानतितेजस्वी नत्वा रामं पुरःस्थितः॥ ७४ । सभी लोग दुःखमें पड़े रहते हैं। राजन्! चूँकि ऐसी स प्राह कपिराजं तं नीतिमान् नीतिमद्वचः। । स्थिति है, अतः आप बहुत शीघ्र सीताकी खोज यदुक्तं वायुपुत्रेण तत्तथेत्यवगच्छ भोः॥ ७५ । कराइये'॥ ७०—७३॥ यत्र क्वापि स्थिता सीता रामभार्या यशस्विनी। । बुद्धिमान् वायुनन्दनके यों कहनेपर अत्यन्त तेजस्वी पतिव्रता महाभागा वैदेही जनकात्मजा॥ ७६ । जाम्बवान् श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके सामने खड़े हो अद्यापि वृत्तसम्पन्ना इति मे मनसि स्थितम्। । गये। वे नीतिज्ञ थे, अतः कपिराज सुग्रीवसे नीतियुक्त न हि कल्याणचित्तायाः सीतायाः केनचिद्भुवि॥ ७७ । वचन बोले—'सुग्रीव! हनूमान्‌जीने जो कहा है, उसे पराभवोऽस्ति सुग्रीव प्रेषयाद्यैव वानरान्। । आप ठीक ही समझें। श्रीरामचन्द्रजीकी यशस्विनी भार्या इत्युक्तस्तेन सुग्रीवः प्रीतात्मा कपिनायकः॥ ७८ । विदेहकुलनन्दिनी जनककुमारी महाभागा पतिव्रता सीता पश्चिमायां दिशि तदा प्रेषयामास तान् कपीन्। । जहाँ-कहीं भी होंगी, आज भी सदाचारसे सम्पन्न होंगी— अन्वेष्टुं रामभार्यां तां महाबलपराक्रमः॥ ७९ । यह विचार मेरे मनमें निश्चितरूपसे जमा हुआ है। उत्तरस्यां दिशि तदा नियुतान् वानरानसौ। । सुग्रीव! सदा कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीमें ही मन प्रेषयामास धर्मात्मा सीतान्वेषणकर्मणि॥ ८० । लगाये रहनेवाली सीताजीका इस पृथ्वीपर किसीके द्वारा । भी पराभव नहीं हो सकता। इसलिये आप अभी । वानरोंको भेजें'॥ ७४—७७१/२॥ । जाम्बवान्‌के इस प्रकार कहनेपर महान् बल और । पराक्रमसे युक्त कपिराज सुग्रीवने प्रसन्न हो सीताकी । खोजके लिये बहुत-से वानरोंको पश्चिम दिशामें भेजा । तथा उन धर्मात्माने उत्तर दिशामें भी सीताको ढूँढ़नेके । निमित्त एक लाख वानरोंको उसी समय भेज दिया। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth