भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 224

अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१३


पूर्वस्यां दिशि कपींश्च कपिराजः प्रतापवान् । प्रेषयामास रामस्य सुभार्यान्वेषणाय वै ॥ ८१

इति तान् प्रेषयामास वानरान् वानराधिपः । सुग्रीवो वालिपुत्रं तमङ्गदं प्राह बुद्धिमान् ॥ ८२

त्वं गच्छ दक्षिणं देशं सीतान्वेषणकर्मणि । जाम्बवांश्च हनूमांश्च मैन्दो द्विविद एव च ॥ ८३

नीलाद्याश्चैव हरयो महाबलपराक्रमाः। अनुयास्यन्ति गच्छन्तं त्वामद्य मम शासनात् ॥ ८४

अचिरादेव यूयं तां दृष्ट्वा सीतां यशस्विनीम् । स्थानतो रूपतश्चैव शीलतश्च विशेषतः ॥ ८५

केन नीता च कुत्रास्ते ज्ञात्वात्रागच्छ पुत्रक । इत्युक्तः कपिराजेन पितृव्येण महात्मना ॥ ८६

अङ्गदस्तूर्णमुत्थाय तस्याज्ञां शिरसा दधे । इत्युक्ते दूरतः स्थाप्य वानरानथ जाम्बवान् ॥ ८७

रामं च लक्ष्मणं चैव सुग्रीवं मारुतात्मजम्। एकतः स्थाप्य तानाह नीतिमान् नीतिमद्वचः ॥ ८८

श्रूयतां वचनं मेऽद्य सीतान्वेषणकर्मणि । श्रुत्वा च तद्गृहाण त्वं रोचते यन्नृपात्मज ॥ ८९

रावणेन जनस्थानान्नीयमाना तपस्विनी। जटायुषा तु सा दृष्टा शक्त्या युद्धं प्रकुर्वता ॥ ९०

भूषणानि च दृष्टानि तया क्षिप्तानि तेन वै। तान्यस्माभिः प्रदृष्टानि सुग्रीवायार्पितानि च ॥ ९१

जटायुवाक्याद्राजेन्द्र सत्यमित्यवधारय । एतस्मात्कारणात्सीता नीता तेनैव रक्षसा ॥ ९२

रावणेन महाबाहो लङ्कायां वर्तते तु सा । त्वां स्मरन्ती तु तत्रस्था त्वद्दुःखेन सुदुःखिता ॥ ९३

रक्षन्ती यत्नतो वृत्तं तत्रापि जनकात्मजा । त्वद्ध्यानेनैव स्वान् प्राणान्धारयन्ती शुभानना ॥ ९४


[हिन्दी अनुवाद]

इसी प्रकार प्रतापी वानरराजने पूर्व दिशामें भी रामकी श्रेष्ठ भार्या सीताका अन्वेषण करनेके लिये बहुत-से वानर भेजे। बुद्धिमान् वानरराज सुग्रीवने इस प्रकार वानरोंको भेज लेनेके बाद वालिकुमार अङ्गदसे कहा—'अङ्गद ! तुम सीताकी खोज करनेके लिये दक्षिण दिशामें जाओ। मेरी आज्ञासे आज तुम्हारे चलते समय तुम्हारे साथ जाम्बवान्, हनूमान्, मैन्द, द्विविद और नील आदि महाबली एवं महापराक्रमी वानर जायँगे। बेटा! तुम सभी लोग बहुत शीघ्र जाकर यशस्विनी सीताका दर्शन करो और यह भी पता लगाओ, 'वे कैसे स्थानमें हैं, किस रूपमें हैं ? विशेषतः उनका आचरण कैसा है ? कौन उन्हें ले गया है ? तथा उसने उन्हें कहाँ रखा है ?'—यह सब जानकर शीघ्र लौट आओ'॥ ७८–८५१/२॥

अपने चाचा महात्मा सुग्रीवके इस प्रकार आदेश देनेपर अङ्गदने तुरंत उठकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। सुग्रीवकी पूर्वोक्त आज्ञा सुनकर नीतिज्ञ जाम्बवान्ने सब वानरोंको कुछ दूर खड़ा कर दिया और श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव तथा हनुमान्जीको एक जगह करके उनसे यह नीतियुक्त बात कही—'नृपनन्दन श्रीरामचन्द्रजी ! सीताका अन्वेषण करनेके विषयमें इस समय आप मेरी एक बात सुनें और सुननेके बाद यदि वह अच्छी लगे तो उसे स्वीकार करें। जटायुने तपस्विनी सीताको जनस्थानसे रावणद्वारा ले जायी जाती हुई देखा था तथा उन्होंने उसके साथ यथाशक्ति युद्ध भी किया था। साथ ही, सीताजीने उस समय अपने आभूषण उतार फेंके थे, जिनको जटायुने और हम लोगोंने भी देखा था। उन आभूषणोंको हमने सुग्रीवको अर्पित कर दिया है। इस कारण राजेन्द्र ! जटायुके कथनानुसार आप इस बातको सत्य समझें कि सीताजीको वही दुष्ट राक्षस रावण ले गया है और महाबाहो ! वे इस समय लङ्कामें ही हैं। वहाँ रहकर भी वे आपके ही दुःखसे अत्यन्त दुःखी हो निरन्तर आपका ही स्मरण किया करती हैं। जनकनन्दिनी सीता लङ्कामें रहकर भी अपने सदाचारकी यत्नपूर्वक रक्षा कर रही हैं। वे सुमुखी सीतादेवी आपके ही ध्यानसे अपने प्राणोंको धारण करती हुई


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