संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 318 में से
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२९४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ५० स्थिता प्रायेण ते देवी सीता दुःखपरायणा। | प्रायः आपके ही वियोग-दुःखमें डूबी रहती हैं। इसलिये हितमेव च ते राजन्नुदधेर्लङ्घने क्षमम्॥ ९५ | राजन्! इस समय आपके हितकी ही बात बता रहा हूँ, वायुपुत्रं हनूमन्तं त्वमत्रादेष्टुमर्हसि। | आप इस कार्यके लिये वायुपुत्र हनूमान्जीको आज्ञा दें; क्योंकि ये ही समुद्र लाँघनेमें समर्थ हैं और सुग्रीव ! आपको त्वं चाप्यर्हसि सुग्रीव प्रेषितुं मारुतात्मजम्॥ ९६ | भी चाहिये कि पवनकुमार हनूमान्जीको ही वहाँ भेजें; तमृते सागरं गन्तुं वानराणां न विद्यते। | क्योंकि वानरोंमें उनके अतिरिक्त कोई भी ऐसा नहीं है, जो बलं कस्यापि वा वीर इति मे मनसि स्थितम्॥ ९७ | समुद्रके पार जा सके तथा हे वीर! इनके बराबर किसीका बल भी नहीं है। बस, मेरे मनमें यही विचार है। मेरे क्रियतां मद्द्वचः क्षिप्रं हितं पथ्यं च नः सदा। | कथनका शीघ्र पालन किया जाय; क्योंकि यह हमारे लिये उक्ते जाम्बवतैवं तु नीतिस्वल्पाक्षरान्विते॥ ९८ | सदा ही हितकर और लाभकारी होगा' ॥ ८६–९७१/२ ॥ वाक्ये वानरराजोऽसौ शीघ्रमुत्थाय चासनात्। | जाम्बवान्के इस प्रकार थोड़े अक्षरोंमें नीतियुक्त वचन कहनेपर वानरराज सुग्रीव शीघ्र ही अपने आसनसे वायुपुत्रसमीपं तु तं गत्वा वाक्यमब्रवीत्॥ ९९ | उठे और वायुनन्दन हनूमान्जीके निकट जाकर उनसे बोले- ॥ ९८-९९ ॥ शृणु मद्द्वचनं वीर हनूमन्मारुतात्मज। | "पवनकुमार वीर हनूमान्जी ! तुम मेरी बात सुनो। अयमिक्ष्वाकुतिलको राजा रामः प्रतापवान्॥ १०० | ये प्रतापी राजा श्रीरामचन्द्रजी इक्ष्वाकुवंशके भूषण हैं। पितुरादेशमादाय भ्रातृभार्यासमन्वितः। | ये अपने पिताकी आज्ञा मानकर भाई और पत्नीके सहित प्रविष्टो दण्डकारण्यं साक्षाद्धर्मपरायणः॥ १०१ | दण्डकारण्यमें चले आये थे। सदैव धर्ममें तत्पर रहनेवाले सर्वात्मा सर्वलोकेशो विष्णुर्मानुषरूपवान्। | ये श्रीराम समस्त लोकोंके ईश्वर और सबके आत्मा अस्य भार्या हृता तेन दुष्टेनापि दुरात्मना॥ १०२ | साक्षात् भगवान् विष्णु ही हैं। इस समय मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए हैं। इनकी धर्मपत्नी सीताको दुष्ट दुरात्मा तद्वियोगजदुःखार्तो विचिन्वंस्तां वने वने। | रावणने हर लिया है। ये प्रतापी वीर राजा उन्हींके त्वया दृष्टो नृपः पूर्वमयं वीरः प्रतापवान्॥ १०३ | वियोगजन्य दुःखसे पीड़ित हो वन-वनमें उन्हींकी खोज करते हुए आ रहे थे, जबकि तुमने इन्हें पहले-पहल एतेन सह संगम्य समयं चापि कारितम्। | देखा था। इनके साथ मिलकर हमने प्रतिज्ञा भी की थी। अनेन निहतः शत्रुमम वालिर्महाबलः॥ १०४ | इन्होंने मेरे शत्रु महाबली वालिका वध किया तथा कपे! अस्य प्रसादेन कपे राज्यं प्राप्तं मयाधुना। | इन्हींकी कृपासे मैंने इस समय अपना राज्य प्राप्त किया मया च तत्प्रतिज्ञातमस्य साहाय्यकर्मणि॥ १०५ | है और मैंने भी इनकी सहायताके लिये प्रतिज्ञा की है। तत्सत्यं कर्तुमिच्छामि त्वद्बलान्मारुतात्मज। | पवननन्दन ! मैं अपनी उस प्रतिज्ञाको तुम्हारे ही बलपर उत्तीर्य सागरं वीर दृष्ट्वा सीतामनिन्दिताम्॥ १०६ | पूर्ण करना चाहता हूँ। वीर! समुद्रके पार जा पतिव्रता सीताको देखकर पुनः समुद्रके इस पार लौट आनेकी भूयस्तर्तुं बलं नास्ति वानराणां त्वया विना। | सामर्थ्य तुम्हारे सिवा वानरोंमेंसे किसीमें भी नहीं है। अतस्त्वमेव जानासि स्वामिकार्यं महामते॥ १०७ | अतः महामते ! तुम्हीं अपने स्वामीके कार्यको ठीक- बलवान्नीतिमांश्चैव दक्षस्त्वं दौत्यकर्मणि। | ठीक जान सकते हो; क्योंकि तुम बलवान्, नीतिज्ञ और दूतकर्ममें दक्ष हो" ॥ १००–१०७१/२ ॥ तेनैवमुक्तो हनुमान् सुग्रीवेण महात्मना॥ १०८ | महात्मा सुग्रीवके यों कहनेपर हनूमान्जी बोले- स्वामिनोऽर्थं न किं कुर्यामीदृशं किं नु भाषसे। | 'आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? भला, अपने स्वामी इत्युक्तो वायुपुत्रेण रामस्तं पुरतः स्थितम्॥ १०९ | भगवान् श्रीरामका कार्य क्या मैं नहीं करूँगा?' वायुनन्दनके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth