संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६२ ] श्रीविष्णुपूजनके वैदिक मन्त्र और स्थान २६९
[बायाँ स्तम्भ]
श्रीमार्कण्डेय उवाच अर्चनं सम्प्रवक्ष्यामि विष्णोरमिततेजसः। यत्कृत्वा मुनयः सर्वे परं निर्वाणमाप्नुयुः॥ ४ अग्नौ क्रियावतां देवो हृदि देवो मनीषिणाम्। प्रतिमास्वल्पबुद्धीनां योगिनां हृदये हरिः॥ ५ अतोऽग्नौ हृदये सूर्ये स्थण्डिले प्रतिमासु च। एतेषु च हरेः सम्यगर्चनं मुनिभिः स्मृतम्॥ ६ तस्य सर्वमयत्वाच्च स्थण्डिले प्रतिमासु च। आनुष्टुभस्य सूक्तस्य विष्णुस्तस्य च देवता॥ ७ पुरुषो यो जगद्बीजं ऋषिर्नारायणः स्मृतः। दद्यात्पुरुषसूक्तेन यः पुष्पाण्यप एव च॥ ८ अर्चितं स्याज्जगत्सर्वं तेन वै सचराचरम्। आद्ययाऽऽवाहयेद्देवमृचा तु पुरुषोत्तमम्॥ ९ द्वितीययाऽऽसनं दद्यात्पाद्यं दद्यात्तृतीयया। चतुर्थ्यार्घ्यः प्रदातव्यः पञ्चम्याऽऽचमनीयकम्॥ १० षष्ठ्या स्नानं प्रकुर्वीत सप्तम्या वस्त्रमेव च। यज्ञोपवीतमष्टम्या नवम्या गन्धमेव च॥ ११ दशम्या पुष्पदानं स्यादेकादश्या च धूपकम्। द्वादश्या च तथा दीपं त्रयोदश्यार्चनं तथा॥ १२ चतुर्दश्या स्तुतिं कृत्वा पञ्चदश्या प्रदक्षिणम्। षोडश्योद्वासनं कुर्याच्छेषकर्माणि पूर्ववत्॥ १३ स्नानं वस्त्रं च नैवेद्यं दद्यादाचमनीयकम्। षण्मासात्सिद्धिमाप्नोति देवदेवं समर्चयन्॥ १४ संवत्सरेण तेनैव सायुज्यमधिगच्छति। हविषाग्नौ जले पुष्पैर्ध्यानेन हृदये हरिम्॥ १५
[दायाँ स्तम्भ]
**श्रीमार्कण्डेयजीने कहा—**अच्छा, मैं अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके पूजनकी विधि बता रहा हूँ, जिसके अनुसार पूजन करके सभी मुनिगण परम निर्वाण (मोक्ष) पदको प्राप्त हुए हैं। अग्निमें हवन करनेवालेके लिये भगवान्का वास अग्निमें है। ज्ञानियों और योगियोंके लिये अपने-अपने हृदयमें ही भगवान्की स्थिति है तथा जो थोड़ी बुद्धिवाले हैं, उनके लिये प्रतिमामें भगवान्का निवास है। इसलिये अग्नि, सूर्य, हृदय, स्थण्डिल (वेदी) और प्रतिमा—इन सभी आधारोंमें भगवान्का विधिपूर्वक पूजन मुनियोंद्वारा बताया गया है। भगवान् सर्वमय हैं, अतः स्थण्डिल और प्रतिमाओंमें भी भगवत्पूजन उत्तम है॥ ४-६१/२॥ अब पूजनका मन्त्र बताते हैं। शुक्ल यजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायीमें जो पुरुषसूक्त है, उसका उच्चारण करते हुए भगवान्का पूजन करना चाहिये। पुरुषसूक्तका अनुष्टुप् छन्द है, जगत्के कारणभूत परम पुरुष भगवान् विष्णु देवता हैं, नारायण ऋषि हैं और भगवत्पूजनमें उसका विनियोग है। जो पुरुषसूक्तसे भगवान्को फूल और जल अर्पण करता है, उसके द्वारा सम्पूर्ण चराचर जगत् पूजित हो जाता है। पुरुषसूक्तकी पहली ऋचासे भगवान् पुरुषोत्तमका आवाहन करना चाहिये। दूसरी ऋचासे आसन और तीसरीसे पाद्य अर्पण करे। चौथी ऋचासे अर्घ्य और पाँचवींसे आचमनीय निवेदित करे। छठी ऋचासे स्नान कराये और सातवींसे वस्त्र अर्पण करे। आठवींसे यज्ञोपवीत और नवमी ऋचासे गन्ध निवेदन करे। दसवींसे फूल चढ़ाये और ग्यारहवीं ऋचासे धूप दे। बारहवींसे दीप और तेरहवीं ऋचासे नैवेद्य, फल, दक्षिणा आदि अन्य पूजन-सामग्री निवेदित करे। चौदहवीं ऋचासे स्तुति करके पंद्रहवींसे प्रदक्षिणा करे। अन्तमें सोलहवीं ऋचासे विसर्जन करे। पूजनके बाद शेष कर्म पहले बताये अनुसार ही पूर्ण करे। भगवान्के लिये स्नान, वस्त्र, नैवेद्य और आचमनीय आदि निवेदन करे। इस प्रकार देवदेव परमात्माका पूजन करनेवाला पुरुष छः महीनेमें सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इसी क्रमसे यदि एक वर्षतक पूजन करे तो वह भक्त सायुज्य मोक्षका अधिकारी हो जाता है॥ ७-१४१/२॥ विद्वान् पुरुष अग्निमें आहुतिके द्वारा, जलमें पुष्पके
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